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Bareilly News: भारत 10.25 मिलियन टन वार्षिक मांस उत्पादन के साथ वैश्विक स्तर पर अभी भी पाँचवें स्थान पर


निर्भय सक्सेना @ नया सवेरा 

बरेली। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आई वी आर आई), इज़तनगर में भारतीय मीट विज्ञान संघ का 13वाँ राष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय संगोष्ठी में कहा गया कि भारत के पशु उत्पाद एवं मीट सेक्टर के लिए स्मार्ट मीट सिस्टम, ट्रैसेबिलिटी, फ्रंटियर टेक्नोलॉजी और वैश्विक प्रोटीन क्रांति महत्वपूर्ण अवसर लेकर आई है। भारत आज 10.25 मिलियन टन वार्षिक मांस उत्पादन के साथ वैश्विक स्तर पर अभी  पाँचवें स्थान पर है। आईवीआरआई में तीन दिवसीय भारतीय मीट विज्ञान संघ का 13वाँ राष्ट्रीय सम्मेलन का केंद्रीय विषय “मीट सेक्टर में अग्रणी तकनीकों का उपयोग: विकसित भारत के लिए प्रोटीन सुरक्षा की दिशा में” रहा, जिसमें उद्घाटन के प्रथम दिवस को शोध, नवाचार, नीति संवाद और उद्योग–अकादमिक सहभागिता से समृद्ध बना दिया। आईवीआरआई के पशुधन उत्पाद प्रौद्योगिकी (एलपीटी) डिवीजन के 50 वर्ष पूर्ण होने पर स्वर्ण जयंती एलुमनी मीट में देशभर के संस्थान के पूर्व विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। मुख्य अतिथि डॉ मुख्य अतिथि डॉ. संजय कुमार, चेयरमैन, कृषि वैज्ञानिक चयन बोर्ड  ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के पशु उत्पाद एवं मीट सेक्टर के लिए स्मार्ट मीट सिस्टम, ट्रैसेबिलिटी, फ्रंटियर टेक्नोलॉजी और वैश्विक प्रोटीन क्रांति महत्वपूर्ण अवसर लेकर आई है। 


उन्होंने कहा कि विकसित देशों की तरह भारत को भी ट्रेसेबिलिटी, बायो–इकोनॉमी, सेल–बेस्ड मीट, वैकल्पिक प्रोटीन, ब्लॉकचेन और एआई–आधारित प्रसंस्करण अपनाकर विश्व बाजार में अपनी पहचान बनानी होगी। संस्थान निदेशक एवं कुलपति ने डॉ त्रिवेणी  दत्त ने संस्थान के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आईवीआरआई का राष्ट्रीय भूमिका में महत्वपूर्ण  योगदान है । संस्थान ने अपनी स्थापना सन 1889 से  लेकर आज तक पशु रोगो हेतु कई शोध किए तथा टीके एवं नेदानिक सिकसित किए। संस्थान ने देश से 4 महत्वपूर्ण बीमारियों के उन्मूलन में अहम भूमिका निभाई है। संस्थान 100 से अधिक टीके एवं निदान किट विकसित कर चुका है तथा 13 प्रमुख जैविक उत्पादों की आपूर्ति पूरे देश में करता है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोग निदान एवं प्रबंधन का केंद्र है इसके साथ ही साथ वन्यजीव स्वास्थ्य में राष्ट्रीय संदर्भ प्रयोगशाला की भूमिका निभाता है। संस्थान 14 देशी नस्लों के जर्मप्लाज्म को संरक्षित करता है। आईवीआरआई द्वारा दो नई नस्लें विकसित कर चुका है जिन्हें हाल ही में एन बी ए जी आर द्वारा मान्यता मिली। आई वी आर आई के पूर्व छात्र, देश के 12 आई सी ए आर संस्थानों के निदेशक पदों पर कार्यरत हैं। यह संस्थान की गुणवत्ता और योगदान का बड़ा प्रमाण है।  संस्थान ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप प्रगति की है। अब आई वी आर आई अब एक बहुविषयक विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हो रहा है। सस्थान ने हाल ही में बी. टेक (डेयरी टेक्नोलॉजी), एम.बी.ए., मास्टर इन एनाटॉमी जैसे पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। अगले वर्ष मास्टर इन वन हेल्थ, मास्टर इन वाइल्डलाइफ हेल्थ जैसे राष्ट्रीय महत्व के कोर्स आरम्भ किए जाएंगे। उद्घाटन सत्र में संयुक्त निदेशक (शैक्षणिक) डॉ. एस. के. मेंदिरत्ता ने कहा कि आज का दिन एक महत्वपूर्ण यात्रा की शुरुआत है एक ऐसी यात्रा जिसकी दिशा मांस क्षेत्र में उभरती अत्याधुनिक तकनीकों को आगे बढ़ाना और भारत को प्रोटीन सुरक्षा की ओर मजबूत कदमों से आगे ले जाना है।  उन्होंने बताया कि भारत ने मांस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश आज 10.25 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन के साथ वैश्विक स्तर पर पाँचवें स्थान पर है। फिर भी प्रति व्यक्ति उपलब्ध पशु प्रोटीन अनुशंसित पोषण स्तर से कम है। डॉ. मेंदिरत्ता ने कहा कि इस चुनौती को दूर करने के लिए उत्पादकता में वृद्धि, वहनीयता, उपलब्धता, आधारभूत ढाँचे का सुदृढ़ीकरण, तकनीक का समावेशन, स्टार्टअप और नवाचार जैसे कारकों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन इन सभी मुद्दों पर सार्थक विमर्श करेगा तथा भविष्य के लिए व्यावहारिक और उपयोगी सिफारिशें प्रस्तुत करेगा। इंडियन मीट साइंस एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. पी. के. मंडल ने अपने संबोधन में कहा कि वे इस महत्वपूर्ण अवसर पर आई एम एस ए का प्रतिनिधित्व करते हुए अत्यंत गौरवान्वित और प्रसन्न हैं। डॉ. मंडल ने कहा कि आई एम एस ए की स्थापना राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ वेटरनरी एजुकेशन एंड रिसर्च, पुदुच्चेरी में हुई थी। आज इसके 800 से अधिक आजीवन सदस्य हैं, जो मांस क्षेत्र में शोध, प्रशिक्षण, सहयोग और नीतिगत समर्थन को सशक्त बनाते हैं। उन्होंने बताया कि ‘जर्नल ऑफ मीट साइंस’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है और पूरी तरह ऑनलाइन प्रकाशित होता है, जिससे शोध निष्कर्षों का तीव्र प्रसार संभव हो पाता है। आईएमएसए द्वारा उत्कृष्ट वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने हेतु कई पुरस्कार आरंभ किए गए हैं, और हर वर्ष इसका दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है।

डॉ. मंडल ने कहा कि भारत में वर्तमान मांस उत्पादन लगभग 10.2 मिलियन टन है, जिसे अगले 10–15 वर्षों में दोगुना करना आवश्यक होगा, ताकि देश की पोषण संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। उन्होंने यह भी बताया कि आई वी आर आई के एलपीटी डिवीजन से अब तक 200 से अधिक स्नातकोत्तर, जिनमें 86 पीएचडी शामिल हैं, देश और विदेश में शिक्षा, अनुसंधान, उद्योग एवं नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। अंत में उन्होंने आह्वान किया—“स्वर्ण जयंती के इस अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि भारत के मांस क्षेत्र को तकनीक आधारित, टिकाऊ, सुरक्षित, और वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देंगे, ताकि देश में प्रोटीन सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि सुनिश्चित हो सके।”

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कार्यक्रम का संचालन पशुधन उत्पाद प्रोद्योगिकी की डॉ नेहा ठाकुर द्वारा किया गया जबकि धन्यवाद ज्ञापन पशुधन उत्पाद प्रोद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ ए आर सेन द्वारा दिया गया ।  इस अवसर पर विभिन्न राज्यों से आए निदेशक पूर्व निदेशक एवं वैज्ञानिक अधिकारी शामिल रहे ।                         राष्ट्रीय मांस सम्मेलन के दूसरे दिन विभिन्न सत्रो में वैज्ञानिकों ने अपने शोध पत्र एवं पोस्टर प्रस्तुत किए। राष्ट्रीय संगोष्ठ के विभिन्न सत्रों के बारे में जानकारी देते हुए पशुधन उत्पाद प्रोद्योगिकी विभाग के डॉ एआरसेन ने बताया कि दूसरे दिन कुल 4 सत्र मे 40 शोध पत्र पढ़े  गए एवं 30 पोस्टर प्रस्तुत किए गए। तकनीकी प्रथम सत्र की अध्यक्षता  डॉ बी डी  शर्मा, पूर्व विभागाध्यक्ष पशुधन उत्पाद प्रोद्योगिकी विभाग ने कि जिसमें  उन्नत जीनोमिक तकनीक, ऑर्गेनिक पशुपालन, हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग, तथा हिमालयी क्षेत्रों में मटन-पोल्ट्री उत्पादन की रणनीतियों पर महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ हुईं। तकनीकी द्वितीय सत्र की अध्यक्षता  डॉ बी एम नवीन, प्रधान वैज्ञानिक एनएमआरआई, हेदरबाद ने की  जिसमें मीट निरीक्षण, पैकेजिंग टेक्नोलॉजी, स्लॉटर चेन की गुणवत्ता, ट्रेसबिलिटी सिस्टम, शेल्फ-लाइफ एन्हांसमेंट और इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज़ पर व्यापक चर्चा हुई। इसमें 13 मौखिक व 15 पोस्टर प्रस्तुतियाँ दी गई। तकनीकी तीसरे सत्र की अध्यक्षता  डॉ डॉ एन कोंडया  ने की  जिसमें  शून्य- अपशिष्ट पोल्ट्री प्रोसेसिंग, क्लीन लेबल उत्पाद, आवश्यक तेलों की भूमिका, तथा सूअर मांस प्रसंस्करण पर देश भर के विशेषज्ञों ने व्याख्यान दिए। इसमें 19 मौखिक और 18 पोस्टर प्रस्तुतियाँ आयोजित हुईं। तकनीकी चौथे सत्र एकीकृत वन- हेल्थ दृष्टिकोण के तहत किया गया था जिसकी अध्यक्षता  एन आर सी मिथुन के निदेशक डॉ गिरीश पाटिल ने जिसमें स्लॉटरहाउस वेस्ट- मैनेजमेंट, एंटीबायोटिक/पेस्टिसाइड अवशेष विश्लेषण, नैनो-फिल्म आधारित पैकेजिंग, मीट एडुल्टरेशन की जांच, कोल्ड प्लाज़्मा तकनीक, पर गहन चर्चा की गई। इसमें  17 मौखिक और 10 पोस्टर प्रस्तुतियाँ शामिल रहीं। आईवीआरआई के पूर्व विद्यार्थियों का अलुम्नी मिलन एवं रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

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