Jaunpur News: रामलीला में आपसी सौहार्द की मिलती है झलक
108 वर्ष पुराना है केराकत की रामलीला का इतिहास
अब्दुल हक अंसारी @ नया सवेरा
केराकत, जौनपुर। केराकत नगर की रामलीला का इतिहास 108 वर्ष पुराना है। यहां की रामलीला में आपसी सौहार्द की अद्वितीय झलक देखने को मिलता है। देखा जाय तो वर्ष 1917 में स्व. रामनाथ आर्य ने राय परिवार के स्व. बाबू कृपा शंकर व स्व. हरिशंकर के सहयोग से रामलीला की स्थापना किया था जो आज भी अनवरत प्रत्येक वर्ष बड़े ही जोशो-खरोश व श्रद्धा से रामलीला का आयोजन किया जाता है।
बताते हैं कि रामलीला के संस्थापक स्व. रामनाथ आर्य जो आर्य समाजी थे। वे मूर्ति पूजक विरोधी होने के बावजूद भी नगर के नालापार मोहल्ला निवासी राय परिवार की जमीन में उनके सहयोग से रामलीला की शुरुआत कराया। इस रामलीला की विशेषता यह है कि ब्यास गद्दी जहां रामायण पाठ होता है, वहां कभी सुब्बी मियां व मन्ना भाई विराजमान रहते रहे। अपने जीवन काल तक स्व. नान्हक भाई व स्व. कलीम भाई विराजमान होते रहे।
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यहां की रामलीला की विशेषता यह है कि नगर के युवक-युवतियां ही अभिनय करते हैं, मुस्लिम शुरू से ही अपनी भागीदारी करते चले आ रहें हैं। यहां तक कि रामलीला के लिए नगर के मुस्लिम बंधु दिल खोलकर आर्थिक सहयोग देने से किसी से पीछे नहीं रहते हैं। इस राम लीला मंचन में स्व. मास्टर कलीम वासुरी वादक, स्व. मन्नान अहमद टूम पेस्ट व कैकेई का रोल अदा करने वाले परवेज आलम सहित कई मुस्लिम युवकों का महत्वपूर्ण योगदान उल्लेखनीय रहा है। मंच निर्देशक की महत्वपूर्ण भूमिका का बखूबी निर्वहन करने वालों में धनंजय गुप्ता, श्रवण पटवा, गौरव जायसवाल व आदर्श गुप्ता का नाम बड़े ही फक्र के साथ लिया जाता है।
पटकथा के सूत्रधार रहे स्व. शिव प्रसाद शास्त्री, स्व. राम नाथ व डा. राजेन्द्र प्रसाद गुप्त उर्फ डीके नये कलेवर के साथ की प्रस्तुति हमेशा लोगों के दिलों दिमाग पर एक अलग ही छाप बनी हुई है। प्रबंधकीय मंडल में सुशील कुमार पटवा, सूर्य प्रकाश सेठ व आर्थिक सहयोग की कमान कोषाध्यक्ष के रूप राजकुमार सेठ उर्फ छोटू संभाले रहते हैं। राम लीला समिति के अध्यक्ष मुकेश कुमार श्रीवास्तव एवं वीरेंद्र कुमार उर्फ बीरू मास्टर कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप का दायित्व बखूबी निर्वहन करते रहते हैं।
शिक्षक धनंजय गुप्ता व संतोष प्रजापति का निर्देशक के रूप में किया जा रहा योगदान उल्लेखनीय रहता है। रामलीला को सफलता की अंतिम मंजिल तक पहुंचाने में पूर्व प्रवक्ता भौतिक विज्ञान वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव के योगदान की जितनी भी सराहना की जाय कम ही होगी।
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