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Varanasi News: कवि श्रीप्रकाश शुक्ल भाषा के मकड़जाल में आलोचना को उलझाते नहीं हैं : प्रो. ओमप्रकाश सिंह

Varanasi News: कवि श्रीप्रकाश शुक्ल भाषा के मकड़जाल में आलोचना को उलझाते नहीं हैं : प्रो. ओमप्रकाश सिंह

रोशनी धीरा

Varanasi News: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सभागार, हिन्दी विभाग, बीएचयू और सर्वभाषा ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में तथा सहायक आचार्य डॉ. विंध्याचल यादव के संयोजन में शब्द कोशकार प्रो. कमलेश वर्मा द्वारा संपादित पुस्तक ‘श्रीप्रकाश शुक्ल : चुनी हुई रचनाएँ’ संग्रह पर लोकार्पण सह परिचर्चा का आयोजन किया गया।भारतरत्न महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण के पश्चात् संगीत कला संकाय के आदित्य शंकर ठाकुर और हिन्दी विभाग की अपराजिता श्री ने कुलगीत की प्रस्तुति सुमधुर वाणी में की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहें हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ‘अनूप’ ने कहा कि यह मंच समृद्ध रहा क्योंकि यहाँ केवल अच्छा लगने वाले ढंग से ही बातें नहीं की गई है बल्कि सम्यक विवेक से सम्यक विवेचन किया गया है। इस तरह के चयन लेखन के आरंभिक दौर से लेकर परिपक्वता तक की यात्रा को समझने में बहुत सहायता करते हैं। इनके लेखन में एक बड़ा गुण है कि यह एक साथ कई विधाओं में लिख लेते हैं। वे मुझे वह अपने गद्य में ज़्यादा अच्छे लगते हैं। वहां वे बहुत सफगोई से लिखते हैं। ख़ासकर संस्मरण लेखन में यह बातें साफ़ दिखाई देती हैं। आज एक लेख देख रहा था कबीर, ग़ालिब और बाजारवाद। यह एक भारी भरकम लेख जैसा लगता है लेकिन है संस्मरणात्मक। यह समय क्रूर अर्थकेंद्रित हुआ है। 

Varanasi News: कवि श्रीप्रकाश शुक्ल भाषा के मकड़जाल में आलोचना को उलझाते नहीं हैं : प्रो. ओमप्रकाश सिंह

स्वागत वक्तव्य देते हुए आदिवासी साहित्य चिन्तक डॉ. राजकुमार मीणा सभा में उपस्थित अतिथि विद्वतजनों का स्वागत और अभिनंदन किया। सर की कविता उनकी वसीयत है जो उनके आस पास के समाज से, उनके आस पास के लोगों से बनी हैं। इनकी कविताओं का लोकवृत्त विस्तृत है। ओरहन से लेकर रेत में आकृतियाँ तक, शहर के देखने का नज़रिया विशिष्ट है। गाज़ीपुर, बनारस से लेकर इलाहाबाद तक के शहरों को देखा परखा है।कोई भी शहर इतना छोटा नहीं होना चाहिए/कि वहाँ पर खड़े होकर चाय भी न पी सकें।

कितना अजीब लगता है कि  छोटे शहर में पत्नी के साथ खड़े होकर चाट खाना। अर्थात् छोटे शहरों में टोका टोकी बहुत है, प्रश्न भी बहुत हैं।यह एक ऐसा शहर है जहाँ मुझे /कुछ फूल मिलें थे… इस शहर में गोलियों के बीच भी/कविताएं और कहानियाँ रची जी हैं/लाल सलामियों के बीच। यह एक संवेदनशील कवि की अनुभूति है। 

कवि कहता है कि हमारे समय में गाय को धर्मसत्ता और राजसत्ता ने साधन बनाया लिया है। कवि के भीतर करुणा है। सत्ता के द्वारा इन प्रतीकों को अलग तरह से इस्तेमाल किया जाता है। इन प्रतीकों को हथियार बना जनता को भीड़ में तब्दील कर उसे हिंसा की तरफ़ उन्मुख करती है। बुरे दिनों के ख्वाब कविता अपने समय को बहुत अच्छे ढंग से अभिव्यक्त करती है।यह दुबों के हरे होने का समय है/लेकिन आज पेड़ दरक रहे हैं।

Varanasi News: कवि श्रीप्रकाश शुक्ल भाषा के मकड़जाल में आलोचना को उलझाते नहीं हैं : प्रो. ओमप्रकाश सिंह

आत्मवक्तव्य देते हुए सुप्रसिद्ध कवि एवं आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं इस संग्रह का रेशा रेशा उधेड़ा गया, अर्थात् एक मुकम्मल बातचीत हुई है। पुस्तक प्रकाशित होने के पश्चात् ही मैंने देखा इसे। राग विराग की कविताओं का संकलन रामविलास शर्मा ने किया था और तारापथ का सम्पादन दूधनाथ से ने किया था लेखक के हिस्से में तो यश आ गए लेकिन संपादक के हिस्से में अपयश। आज कुछ कुछ कमलेश जी के साथ भी यही घटित हो रहा था। मैं ख़ुद को अपूर्णता का कवि कहना चाहूंगा क्योंकि साहित्य में संपूर्णता जैसा कुछ नहीं होता। अभी बहुत कुछ रचना बाकी है। यह संचयन नहीं है यह चयन है। संचयन में आस्था होती और और चयन में विवेक होता है। संचयन ज़्यादातर लेखक के अवसान के समय होता है। चयन में संपादक का अपना विवेक है। कमलेश वर्मा के आलोचक का यह श्रेय होता है कि इनके पांव आलोचना में जहां झुक गए भूगोल वहां मुड़ गया है। मेरे स्वभाव के जो दो हिस्से हैं एक नवाचारिता और दूसरा प्रश्नाकुलता जो मेरी रचनाओं में है यदि यह गुण है तो भाषा तो आपकी अनुगामिनी होगी ही होगी।


संपादकीय वक्तव्य के तहत प्रसिद्ध कोशकार प्रो. कमलेश वर्मा ने बताया कि मनुष्य जीवन के साठ का वर्ष जीव वैज्ञानिक ढंग से भी महत्वपूर्ण है जहाँ पहुंचकर ऊर्जा घटने लगती हैं लेकिन श्रीप्रकाश जी की ऊर्जा उठान पर है। अभी कम से कम 15 वर्षों पश्चात् इनकी पूरी रचनावली आएगी। मैनेजर पाण्डेय जी ने कहा था 75 के समय में कि मैं जीते जी रचनावली लाकर अपना श्राद्ध नहीं कराना चाहता। लेकिन सेल्फ को विकसित करना ख़राब बात नहीं है। नौकरियों में भी सेल्फ डिप्लेज़र की बात आती है कि बताइए आपने क्या क्या किया। इस कितबा में गद्य और कविता दोनों को मिलाकर कुछ शीर्षक मैंने रखें हैं। लोकधर्मी आलोचना से लेकर लोकवृत्त तक। जागतिक आचार्य के नाम से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर लिखा है श्रीप्रकाश जी ने। इसके माध्यम से श्रीप्रकाश जी आचार्यत्व की ओर बढ़ते दिखते हैं। रैदास, तुलसी से लेकर मदन कश्यप तक की महामारी पर लिखी कविता का अध्ययन किया है कवि हैं। कवि की ‘महामारी और कविता’ संग्रह महत्वपूर्ण है। कविता पर कमलेश जी का ज़्यादा ध्यान रहा है। महानगर श्रीप्रकाश जी की कविताओं में है ही नहीं। बनारस, इलाहाबाद, गाज़ीपुर से लेकर गाँव तक का भूगोल इनकी कविता में है। विमर्श की भाषा इनकी कविता में नहीं दिखती लेकिन उसकी चेतना जरूर दिखती है। वे मूर्तिकला, संगीतकला, चित्रकला से सामंजस्य स्थापित कर वे कविता का विधान करते हैं जिनमें से ‘रेत में आकृतियाँ’ मुख्य है।

मुख्य अतिथि प्रो. सुरेन्द्र प्रताप जी कहते हैं कि श्रीप्रकाश जी रेस के कवि हैं। बनारस में हर चीज़ धीरे धीरे चलता है। बसन्त भी यहाँ धीरे-धीरे उतरता है। बनारस रेस में इसलिए भी है कि हर दो तीन महीने में बनारस पर किताबें आ रही हैं। पेंगुइन से आ रही हैं। अंग्रेजी और हिन्दी में आ रही हैं। यदि व्यक्ति को काव्यशास्त्र की समझ हो, परम्परा की समझ हो तो वह बेहतर कविता लिखेगा। जो बात हम कविता में कह सकते हैं वह उपन्यास या कहानी में, आलोचना में नहीं कर सकते हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं में देशी लोक है। हड़परौली कविता इस सन्दर्भ में देखने लायक है। इस शहर से मैं कई बार गुजरा हूं,/ कहीं ओस की तरह,/ कहीं बसंत की तरह। यहाँ की रातें रात की तरह नहीं होती है। श्रीप्रकाश जी का केदारनाथ सिंह जी से बहुत आत्मीय लगाव रहा था। नागार्जुन की भी व्यंग्यात्मक कविता है बनारस पर। श्रीप्रकाश जी ने काशी में 350 मकानों और मन्दिरों के ध्वंस को अपनी आँखों से देखा। टी एस इलियट ने द वेस्टलैंड में लन्दन के ध्वंस को लिखा श्रीप्रकाश जी ने काशी के ध्वंस को लिखा। श्रीप्रकाश की कविता का एस्थेटिक लोक में है। वे कविता और जनता का संवाद बनाते हैं। वे संवाद के कवि हैं। वे कविता के माध्यम से एक बेहतर संसार रचने की कोशिश करते हैं।


मुख्य वक्ता प्रो. ओमप्रकाश सिंह कहते हैं कि इस कार्यक्रम में दूल्हे के रूप में श्रीप्रकाश शुक्ल जी और सोबल्ले के रूप में कमलेश जी हैं। लेखन एक चीज़ होती है, सम्पादन दूसरी चीज़ होती है और संकलन दूसरी चीज़ होती है। यह पुस्तक संकलन हैं, सम्पादन नहीं। लिखना एक बहुत बड़ा हुनर है और लिखने को संपादित कर पाना उससे भी बड़ा हुनर है। बड़े बड़े संपादकों ने रचनाकार को बड़ा रचनाकार बनाया है। जिस कथ्य और भाव की तरफ़ रचनाकार का ध्यान नहीं जाता वहां संपादक की दृष्टि पहुंच जाती है। किसी रचनाकार को खड़ा करना हो तो सीधे खड़ा करो, टेढ़ा नहीं। कमलेश जी ने समय के क्रम से रख दिया है रचना को। इस क्रम में रचना की परिपक्वता पीछे छूट गई है। श्रीप्रकाश शुक्ल भाषा के मकड़जाल में आलोचना को उलझाते नहीं हैं। लेखक की मृत्यु के बाद जब लेखक रॉयल्टी फ्री होने लगे, पाठक की दृष्टि भी उस रचनाकार को लेकर स्पष्ट हो जाए तभी रचनावली संपादित करनी चाहिए। साठोत्तरी कविता में लोकधर्म श्रीप्रकाश शुक्ल जी का शोध प्रबंध है। जैसा लोक साठोत्तरी कविता में है वैसा ही आदिकाल, भक्तिकाल में नहीं है। आदिकाल के पृथ्वीराजरासो में लोकधर्म खोजा जा रहा है, भक्तिकाल के लोकधर्म का वितान कितना बड़ा है इस पर बात की जा रही है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को जागतिक आचार्य कहते हैं क्या वे जगत को जानने वाले हैं, यह जाग्रत आचार्य हैं, कहना क्या चाहता है आलोचक। संग्रह त्याग की वृत्ति आलोचक, संपादक और संचयनकर्ता तीनों में ही होनी चाहिए। इनकी कविताएँ मिथकीय संदर्भों से जुड़ती है जिसमें मिथक के साथ आधुनकि सन्दर्भों को खोजा गया है। कोरोजीवी कविता। युद्धों के समय में जिस देश में कविताएं लिखी गईं हैं वह देखेंगे तो श्रेष्ठ हैं।

विशिष्ट वक्ता युवा आलोचक डॉ. प्रभात कुमार मिश्र बताते हैं कि झुकना किसी को रोपना है यह बात ही रही है लेकिन आजकल जैसा माहौल वहाँ झुकना किसी को उखाड़ना भी हो सकता है। उखाड़ेंगे नहीं तो रोपेंगे कहाँ। कमलेश जी ने केवल चुना नहीं है बल्कि सबरी की तरह चुना है। वह सब कुछ जो उन्हें मीठा लगा चख चख कर चुना है। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने। यह एक बड़ा विवेक है कि हमें किसे छोड़ना है।श्रीप्रकाश जी ने एक जगह कहा है कि कविता की तो सुबह होती है कवि की तो केवल शाम होती है। तीन कवि मुझे याद आ रहे हैं। ‘क्या कहूं आज जो नहीं कही’ निराला ने कहा था। ‘है अभी कुछ और जिसे कहा नहीं गया’ अज्ञेय कहते हैं। हर बात का एक वक्त होता है/ आँखें मत चुराओ वक्त से , ऐसा भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं। नागार्जुन की चयनित कविताएं हिन्दी में सबसे अच्छा माना जाता है। अलग अलग भाषा में, अलग अलग शिल्प में, अलग अलग भाव में अर्थात् उस कवि की विविधवर्णी कविताओं को एक स्थान पर ऐसे संकलित की जाय कि उनके काव्य का विविधवर्णी आस्वाद पाठक तक पहुंच जाए। श्रीप्रकाश जी के यहां गद्य में भी विविध विधाएं हैं, कविता में भी अनेकरूपता भी है। कुछ लंबी कविताएं है कुछ छोटी और कुछ आकार में मध्यमवर्णी। डायरी छपवाना नहीं होता है तो छिपाना भी नहीं होता है। श्रीप्रकाश शुक्ल द्वारा लिखी यात्रा वृत्तांत की विशेषता यह है कि उसमें कविता लहराती चलती है। श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं कि आदिकालीन कविता संस्कृतविरोधी है। ये मुनिमानस और लोकमानस दो रूपों में आदिकालीन कवियों को बांटा है। उनका मानना है कि संस्कृत साहित्य में लोकमानस नहीं है और इसके पक्ष में तर्क देते हैं। रचनाकार अपनी रचना के एकतानता का संपादक को एहसास करवाता है, यहाँ यह भाव नहीं होता है कि मैंने तुम्हें चुन लिया तू भी मुझे चुन।

विशिष्ट वक्ता युवा आलोचक डॉ. महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा बताते हैं कि इस संग्रह के माध्यम से कमलेश जी ने कवि श्रीप्रकाश शुक्ल जी के रचना व्यक्तित्व के वृत्त को निर्मित करने की कोशिश की है। हालांकि उन्होंने इसकी भूमिका में लिखा है कि यह वृत्त अभी भी अधूरा है इसे और भी सुघड़ करने की कोशिश की जाएगी। श्रीप्रकाश जी मूलतः कवि हैं। उनके प्राण कविता के बसते हैं। वे कविता के नए स्वर है, कविता के प्रस्तुति के नए तेवर हैं उनके यहाँ। देस देस परदेस यात्रा वृतांत यह बताता है कि कविता की कोई एक पंक्ति कैसे कवि को यात्रा के लिए प्रेरित कर सकती है। ‘चित्रकूट की शिला पर’ उनके गद्य का सबसे सुंदरतम रूप इस वृत्तांत में है। यह वृत्तांत पूरी की पूरी साहित्यिक यात्रा वृत्तांत हैं। इनका गद्य हंसमुख गद्य है। व्यंग्य के क्रम में वो ख़ुद को भी नहीं छोड़ते।जो भी आज तना है/किसी के झुकने से बना है/(झुकना किसी को रोपना है) कविता में यह दिखाया गया है कि किसी की सफलता के पीछे किसी का झुकना अर्थात् कोई है जो आपको झुककर रोपता है। जो कुछ भी आज खड़ा है उसके पीछे झुककर किसी के रोपने का भाव है।

यह पेड़ जिसकी हर शाखा में/किसी न किसी का झुकना बसा है

धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग के आचार्य, दलित साहित्य चिन्तक डॉ. रविशंकर सोनकर ने किया। उन्होंने कहा कि इतनी समृद्ध बातचीत हमें इस पुस्तक को देखने का नया नजरिया देती है।

रिपोर्ट लेखन हिन्दी विभाग बीएचयू की शोध छात्रा कु. रोशनी धीरा ने की। 

संचालन कर रहें डॉ. विंध्याचल यादव बताते हैं कि इस संग्रह में न केवल कविताएँ अपितु 1995 से 2024 के बीच लिखे डायरी के कुछ अंश, संस्मरण के अंश भी हैं। इनकी कविताएँ चुप्पियों के खिलाफ़ हैं। मुकता के विरुद्ध कूकता के कवि हैं श्रीप्रकाश शुक्ल।

इस अवसर पर प्रो. शशिकला त्रिपाठी, प्रो. कृष्णमोहन, प्रो. नीरज खरे, डॉ. विवेक सिंह, डॉ. धीरेन्द्रनाथ चौबे, डॉ. हरीश कुमार यादव, डॉ. अमित कुमार पाण्डेय,  डॉ. सुनीता सहित विद्यार्थियों और शोधार्थियों की उपस्थिति रही।

एस.आर.एस. हॉस्पिटल एण्ड ट्रामा सेन्टर  📍 तेज डायग्नोस्टिक सेन्टर के सामने (पेट्रोल पम्प के बगल में), नईगंज तिराहा, जौनपुर   ☎️ 7355 358194, 05452-356555      🏥🏥🏥  👨🏻‍⚕️ डा. अभय प्रताप सिंह  MBBS (KGMU), DNB(Ortho), MS (Ortho) UCN, FIJR (Germany), MNAMS आर्थोस्कोपिक एण्ड ज्वाइंट रिप्लेसमेन्ट आर्थोपेडिक सर्जन हड्डी रोग विशेषज्ञ ओ.पी.डी. प्रतिदिन  👨🏻‍⚕️ डा. आनन्द त्रिपाठी  MBBS, MD, DM (Neuro) न्यूरो फिजिसियन ओ.पी.डी. प्रतिदिन  👨🏻‍⚕️ डा. राजेश त्रिपाठी  MBBS, MD (Anesthisia) एनेस्थिसिया रोग विशेषज्ञ ओ.पी.डी. प्रतिदिन  👩🏻‍⚕️ डा. नेदा सलाम  CGO स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ ओ.पी.डी. प्रतिदिन  👨🏻‍⚕️ डा. एस. के. मिश्र  MBBS, MS (General Surgeon) जनरल सर्जरी विजिटिंग ऑन काल  👩🏻‍⚕️  डा. चंचला मिश्रा  MBBS, MS (Obs & Gyn.) स्त्री रोग विशेषज्ञ विजिटिंग ऑन काल  👨🏻‍⚕️ डा. अरविन्द कुमार अग्रहरि  MBBS, MS, MCH (Neuro) न्यूरो सर्जन विजिटिंग ऑन काल
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