Poetry: जाति
नया सवेरा नेटवर्क
जाति
किस जाति के हो ?
भइया मानव जाति के
अबे यह कौन-सी जाति है?
भइया मनुष्य,इनसान।
अबे मूरख समझ रखा है !
इतना तो मैं भी जानता हूँ
पर जाति क्या है तुम्हारी ?
वही तो बता रहा हूँ
पर आप समझ नही रहे।
अबे जब हनुमान जी
दलित,मुस्लिम हो सकते है
तो तू किस खेत की मूली है ?
अपनी जाति बता
बाभन ठाकुर लाला बनिया
किस जाति में पैदा हुए ?
पैदा तो माँ के गर्भ से हुआ,
वहाँ जाति नहीं बताई गई ।
पहले दूध धाय माँ ने पिलाई,
उस हिसाब से दलित समझ लें।
दूर हट बे! तू दलित है !
मैं अपनी गन्दगी खुद धोता हूँ,
तो लगता है मैं धोबी हूँ ।
उदर भरने के लिए कमाता हूँ,
तो समझिए मैं बनिया हूँ।
कोई मारता है,
तो खुद को बचता हूँ ,
इसलिए क्षत्रीय हूँ।
जीवन जीने की कला सीखता
सिखाता हूँ तो बाभन हूँ।
यही मेरी जाति है।
आप चाहे जिस जाति का माने।
जब जाति प्रमाण पत्र नही दोगे
तो आरक्षण कैसे पाओगे ?
मैं तो रक्षण की याचना करता हूँ,
हर व्यक्ति में भगवान देखता हूँ,
समत्व भाव का पुजारी हूँ,
हर जाति का अधिकारी हूँ,
फिर कोई एक जाति कैसे बता दूँ ?
तू बहुत चालाक निकला
हम नेताओं से सीख लिया क्या?
नही साहब! आप से सीखता
तो जाति जरूर बताता
तब मानवता न जानता
मैं तो चाहता हूँ
आप भी मुझसे सीखें
जाति छोड़ मानव बने
सिरफ़ एक जाति एक धरम
मानव और मानव का करम।।
-डॉक्टर रामजी तिवारी
शिक्षक,सेंटजॉन्स स्कूल,जौनपुर।
