Poetry: होली के रंग | Naya Savera Network
नया सवेरा नेटवर्क
होली के रंग
आया होली का त्योहार,
लाया रंगों की बहार।
टेसू और पलाश के संग
चमन में छा गये रंग
हरा लाल पीला केसरिया
भांति भांति के रंग।
क्यों न मैं भी बिखेर दूँ
अबीर गुलाल और रंग
तन भी भीगे, मन भी भीगे
भीगे सारे अंग ।
प्रेम रंग में रंग जाएँ सब
ऐसी हो हुड़दंग
कान्हा की बस मुरली बाजे
नाचैं गोपी राधा संग ।
किस रंग से होली खेलूँ?
रंगों के भी मज़हब हो गए
किस रंग को अपना कह दूँ
रंगों के भी सरहद हो गए।
केसरिया हो गया हिन्दुओं का
हरा हुआ इस्लाम का
नीले पे कब्ज़ा अम्बेडकर का
लाल काॅमरेड के शान का।
घृणा का रंग हो गया काला
हर रंग का अपना बोलबाला।
मैने तो देखा था हरदम
केसरिया रंग प्रगति का
हरा रंग प्रकृति का,
नीला रंग आकाश का
लाल रंग गुलाब का।
सफ़ेद रंग है प्रतीक आज भी
शांति का ,सद्भाव का
मानवता के मूल्यों का
समन्वय का विकास का ।
मैने सबको लगा दिया फिर
सफ़ेद रंग का टीका,
जिसके आगे हर मज़हब का
रंग है फ़ीका फ़ीका।
आशा है कि सब रंग मिलकर
रंगों के सरहद मिला देंगे
एक रंग में रंग जाएँगे
प्रेम की होली मना लेंगे।
सन्तोष कुमार झा,सीएमडी कोंकण रेलवे


