संविधान पर जूतों की धमक: जस्टिस शेखर यादव का बयान लोकतंत्र के लिये खतरा | Naya Savera Network
आनन्द देव यादव
भारत के न्यायिक इतिहास में ऐसे वक्तव्य बार-बार नहीं आते, जब एक न्यायाधीश अपने शब्दों से लोकतंत्र, संविधान और भाईचारे की बुनियाद को हिलाने की कोशिश करता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर कुमार यादव का हालिया बयान न केवल संविधान की मर्यादा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि क्या ऐसी सोच रखने वाला व्यक्ति न्याय की कुर्सी पर बैठने के योग्य है। विश्व हिंदू परिषद के मंच पर दिए गए उनके बयान ने लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा कि "देश का कानून बहुसंख्यकों के हिसाब से चलना चाहिए।" यह बयान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 की मूल भावना को रौंदने जैसा है। क्या जस्टिस शेखर यादव भूल गए कि भारतीय संविधान हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो?
क्या यह नफरत न्याय की कुर्सी तक पहुंच चुकी है?
यह सवाल उठता है कि यदि ऐसी मानसिकता रखने वाला व्यक्ति न्याय की कुर्सी पर बैठा है तो वह मुसलमान या अन्य अल्पसंख्यकों के मामलों में कितना निष्पक्ष हो सकता है? क्या उसके फैसले पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होंगे? जस्टिस यादव के बयान को अगर ध्यान से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने मुसलमानों के प्रति अपनी घृणा को सार्वजनिक रूप से जाहिर किया। उनकी टिप्पणी कि "अगर हम अभी से सचेत नहीं हुए तो हमारा देश तालिबान हो जाएगा," केवल एक समुदाय को बदनाम करने का प्रयास है। यह बयान इस सवाल को जन्म देता है कि क्या न्यायाधीश को किसी राजनीतिक या धार्मिक संगठन के मंच पर जाकर इस प्रकार की बयानबाजी करनी चाहिए? संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाले एक न्यायाधीश का इस प्रकार का व्यवहार क्या उसकी जिम्मेदारी और निष्पक्षता पर सवाल नहीं खड़ा करता?
संविधान के खिलाफ जंग
जस्टिस शेखर यादव का यह बयान न केवल भारतीय संविधान के खिलाफ जंग छेड़ने जैसा है, बल्कि यह लोकतंत्र की उस आत्मा के खिलाफ भी है जिसने इस देश को विविधता में एकता की नींव पर खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि "यूनिफॉर्म सिविल कोड आकर रहेगा।" यह बयान स्पष्ट करता है कि वह अपने न्यायिक दायित्व को एकपक्षीय राजनीतिक सोच के तहत चला रहे हैं। संविधान ने हर नागरिक को उसके धर्म, भाषा, संस्कृति और पहचान के साथ जीने का अधिकार दिया है। यह केवल एक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह भारतीयता का प्रतीक है। जब एक न्यायाधीश कहता है कि कानून बहुसंख्यकों के हिसाब से चलना चाहिये तो वह संविधान की आत्मा को कुचलने का काम करता है।
न्याय पालिका की निष्पक्षता पर सवाल
जस्टिस शेखर यादव का यह बयान उस वक्त आया है जब देश पहले ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के खतरे से जूझ रहा है। उनकी टिप्पणियां न केवल न्याय पालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाती हैं, बल्कि यह भी संकेत देती हैं कि हमारी न्याय पालिका में ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो संविधान की भावना के खिलाफ काम कर रहे हैं। यह जरूरी है कि जस्टिस यादव के इस बयान की समीक्षा की जाए। उनके अब तक दिए गए फैसलों को दोबारा परखा जाए। यह जांच होनी चाहिए कि क्या उनके फैसले उनके पूर्वाग्रह का नतीजा थे। इसके अलावा न्याय पालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यायाधीश किसी भी प्रकार के राजनीतिक, धार्मिक, या सांप्रदायिक मंच से दूर रहें।
लोकतंत्र का भविष्य और हमारी जिम्मेदारी
जस्टिस यादव जैसे लोग केवल एक व्यक्ति नहीं हैं। यह मानसिकता एक प्रणालीगत समस्या की ओर इशारा करती है जो लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है। आज यह आवश्यक है कि हम संविधान, लोकतंत्र और भाईचारे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करें।
अच्छी बात यह है कि इस देश के नागरिक आज भी संविधान और लोकतंत्र पर विश्वास रखते हैं। वह जानते हैं कि यह देश किसी एक धर्म, जाति, या वर्ग का नहीं है। यह देश हर उस व्यक्ति का है जो इसके संविधान को मानता है और इसके आदर्शों का पालन करता है। जस्टिस शेखर यादव के बयान ने न केवल न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाई है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि नफरत और पक्षपात की सोच लोकतंत्र के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे विचार हमारे लोकतंत्र और संविधान की जड़ों को कमजोर न करें। आज यह जरूरी है कि संविधान के पक्ष में खड़े होकर हम ऐसी मानसिकता का विरोध करें और यह स्पष्ट करें कि यह देश संविधान से चलेगा न कि किसी बहुसंख्यकवादी सोच से।
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| आनन्द देव यादव |



