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मनुष्यता एवं अधिकारों की गहरी जड़ें तलाशती कविताएं | #NayaSaveraNetwork

पुस्तक समीक्षा

कृति – प्रेम में पेड़ होना (कविता संग्रह)

कवयित्री –जसिंता केरकेट्टा

प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली ( 2024)

मूल्य – 160 रूपये

 

आदिवासी हक़ के लिए लिखने और बोलने वालों में जसिंता केरकेट्टा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इस साल राजकमल प्रकाशन से उनका नया काव्य संग्रह ‘प्रेम में पेड़ होना’ प्रकाशित हुआ। पिछले संग्रह ‘ईश्वर और बाज़ार’ में जहाँ उन्होंने ईश्वर की सत्ता को लगातार प्रश्नांकित किया, वहीं यह संग्रह प्रेम का एक अलग स्वर तलाशने की कोशिश करता है। वह ख़ुद इसे प्रेम कविताओं का संकलन मानती हैं।

सबसे ज्यादा कविताएं प्रेम पर लिखी गईं। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो अपने प्रेम से भरे और अच्छे होने का दावा न करता हो। यदि हर तरफ़ इतना प्रेम है तो दुनिया हिंसा से क्यों भरी हुई है? कौन लोग हैं जो नफ़रत फैला रहे हैं? दुनिया की तमाम हिंसा के केंद्र में सत्ता है। प्रेम में इस सत्ता का प्रवेश वर्चस्व स्थापित करने लगा। विवाह की संस्था ऐसे ही समय उपजी। किताब की भूमिका में जसिंता लिखती हैं, “वर्चस्ववादी समाज की नींव स्त्रियों की सेक्सुअलिटी के नियंत्रण पर ही टिकी हुई है। विवाह की संस्था ऐसे ही समाज को मजबूती देता है। इसलिये प्रेम के नाम पर अधिकार स्थापित करना, क़ब्ज़ा जमाना, नियंत्रण करना महत्वपूर्ण होता चला गया।”

प्रेम करना और निभाना इसे आदिवासी जीवन दर्शन से सीखा जा सकता है। भूमिका में कवयित्री लिखती हैं “आदिवासी जीवन दर्शन में प्रेम में होने और उसे जीने का एक सहज रास्ता मिल सकता है, जो इनसान को इनसान के साथ सब जीवों के प्रेम में होते हुए, पूरी प्रकृति से प्रेम करना सिखा सकता है।“

प्रेम मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार होना चाहिए, लेकिन  समाज में  अंतरजातीय  विवाह करने पर हत्या तक कर दी जाती है, इस तरफ भी कवयित्री ध्यान दिलाना चाहती हैं।  समाज को धर्म, जाति के नाम बटवारा कर दिया गया है। यहां तक प्रेम करना भी समाज में गुनाह समझा जाता हो। कवयित्री लिखती हैं –

मैं जब किसी के प्रेम में होता हूँ/ उसकी जाति, धर्म, नस्ल भूल जाता हूँ/बस इसी बात पर /हर बार मारा जाता हूँ ( मैं क्यों मारा जाता हूं)

समाज ने स्त्रियों के मेहनत को कभी मेहनत नहीं समझा, उनके काम को काम नहीं समझा जाता है। उन्हें अपना अधिकार पता नहीं होता और वे जीवन भर किसी की मजदूरी करने में अपना समय व्यतीत कर देती है। कवयित्री ने इध विषय पर भी ध्यान आकर्षित किया है –

स्त्रियाँ धान रोपती हैं/ धान काटती हैं /धान ढोती हैं.....उनका कोई खेत नहीं होता /वे इस धरती पर/ जीवन-भर/ किसी ना किसी के खेत की/ सिर्फ़ बंधुआ मज़दूर होती हैं।(धान काटतीं स्त्रियाँ)

पुरुष समाज स्त्री को हमेशा उपेक्षित नजर से देखते आ रहा है। पुरुष अपने को ज्यादा समझदार और स्त्री को मूर्ख ही मानता रहा है। पुरुष का जब मन किया स्त्री पर हाथ उठा देता है, जबकि हिंसा के लिए किसी भी सभ्य समाज में जगह नहीं होनी चाहिए। एक स्त्री अपने पति से जो घर और समाज में सभ्य माना जाता है लेकिन उसे पीटता है, स्त्री उससे सवाल करती है। यह सवाल किसी व्यक्तिगत स्त्री का न होकर समाज के लाखों महिलाओं का यह दर्द है, जो हमेशा अपने पति के द्वारा शारीरिक और मानसिक हिंसा झेलती हैं। कविता इस तरह हैं –

 

तुम माँ के सामने सिर झुकाए रहते हो /बड़ी बहन के सामने भी/ कहते हो/ तुम उनका सम्मान करते हो/ फिर सिर्फ मुझ पर ही क्यों हाथ उठाते हो?

बहुत कम बोलने वाले/ सौम्य कहे जाने वाले/ नई सोच के समझे जाने वाल/ मेरे पति ने इतना ही कहा /क्योंकि तुम पत्नी हो। ( पत्नी)

 

 

अक्सर सत्ता और समाज कमजोरों, वंचितों, आदिवासियों को अधिकार देने की बात करता है। वे कहते हैं कि वंचितों को भी बराबरी का हक मिलना चाहिए, लेकिन अगर अधिकार की बात वंचित वर्ग का व्यक्ति कर दे तो वे भड़क जाते हैं। कविता की पंक्तियां देखिए –

 

अ से अनार लिखा /उन्होंने कहा/ आह! कितना सुन्दर/ आ से आम लिखा /उन्होंने आम के गुण गाए/ जब अ से अधिकार लिखा /वे भड़क गए।( अधिकार)

माना जाता है कि आदिवासी महुआ का शराब पीता है। वह शराब पीकर अपनी मस्ती में मस्त रहता है। वह अपने हर खुशी और दुख के उत्सव पर शराब पीता है, लेकिन वह किसी का नुकसान नहीं करता। लेकिन समाज में धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह महुआ के शराब से भी खतरनाक है। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण है जहां धर्म के उन्माद पर देश का विनाश हो जाता है। कवयित्री ने इस तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए लिखती हैं –

 

हम महुआ के नशे में थे /और वे धर्म के/हम नशे में नाचने लगे /और वे हत्या करने लगे।( नशा)

सपने देखने और उसे पूरा करने का अधिकार हर व्यक्ति के पास होना चाहिए। उसे वह सारी जरूरी सुविधाएं मिले जिससे वह अपने सपने को हकीकत में बदल सके। हम अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहें परंतु हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि हम किसी दूसरे का हक ना मार लें। हर इंसान अपनी सीमा के भीतर एक खूबसूरत दुनिया बनाने का प्रयास करें –

 

एक ऐसी दुनिया के सपने देखती हूँ /जहाँ किसी तरह की सीमा ना हो/ पर हर आदमी जाने/ कि उसकी सीमा क्या है।( सपने)

आदिवासियों की व्याख्या हमेशा जल, जंगल और जमीन से की जाती है। परंतु वर्तमान समय में जमीन से आदिवासी बेदखल हो रहा है। जंगलों का भी अत्यधिक दोहन हो रहा है। आदिवासियों की जमीनों पर फैक्ट्रियां लगाई जा रही हैं जिससे वह विस्थापित होने को मजबूर हो रहा है। अक्सर देखा गया है कि सरकार का जो आदिवासी प्रेम है वह केवल दिखावा मात्र है। वह आदिवासी प्रेम की बात तो करती है परंतु उन्हें उनके जमीन से बेदखल करने में जरा भी संकोच नहीं करती है। इसी मुद्दे को उठाते हुए कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं –

 

उन्होंने हमारे ऊपर/ कालजयी किताबें लिखीं/ सबने सराहा, दुख भी जताया /फिर अद्भुत कहते हुए/ उन्हें पुरस्कृत किया/ पर ज़मीन पर/ लोगों को न्याय कभी नहीं मिला/इस देश में/ पुरस्कृत हो जाना आसान है/ न्याय पाना बहुत मुश्किल ।( न्याय)

लेखिका ने भले इसे प्रेम कविताएं कहा हो, परंतु यह केवल प्रेम कविताएं नहीं हैं। इसमें प्रकृति, मनुष्य, प्रेम, सत्ता, अधिकार, प्रतिरोध, जीवन दर्शन सबका वर्णन दिखाई देता है। आदिवासी जीवन की सच्चाई, उन्हें किस तरह उनके हक से दूर किया जाता है इसको भी बखूबी दिखाया है। प्रेम करने की स्वतंत्रता का ना होना, धर्म के नाम पर फैले उन्माद इत्यादि का भी कवयित्री ने बहुत सुंदर तरीके से वर्णन किया है। इस कविता संग्रह को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है जैसे वर्तमान समय की कठिन सच्चाई और वंचितों के शोषण को हथियार बनाकर इसे लिखा गया हो।

 

अखिलेश कुमार मौर्य

शोधार्थी, हिंदी विभाग

एम.एम. एच. कॉलेज, ग़ाज़ियाबाद

संपर्क- 7318497241

मेल – akhileshutsav298@gmail.com

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