#Poetry: धरती को सजायें | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
"धरती को सजायें"
अब ये बारिश की बूंदें जल्द ही कम होते होते बन्द होती जायेंगी।
कुछ ही और दिन शेष हैं ,
कि चलो कुछ और पौधे रोप आयें ।
चलो कुछ और हरियाली बिछायें,
ज़रा और धरती को सजायें।
कल फिर ये न पछतावा रहे
कि हमने कुछ कोशिश न की ।
हमने कुछ सोचा नहीं।
आज के ये पौध जब कल वृक्ष बन लहरायेंगे।
तब हम कहेंगे दांसता उन
लहलहाते बाग में।
चलो इक आखिरी कोशिश समझ के जोश खुद में डालदो।
उजड़ी हुई धरती को फिर से
गर्व से श्रृंगार दो।
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| डा० कंचन मिश्रा 'सुरवंदिता', प्रयागराज। |


