#Poetry: बदरा से बुनिया गिरइ जो हमरे तनवां पे | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
बदरा से बुनिया गिरइ जो हमरे तनवां पे,
जियरा में लागइ चिनगारी रे विदेसिया।
मघा जइसन बरसेला अंखिया से अंसुवा हो
एक पल जुग जस गुजारी रे विदेसिया।
पतिया लिखी त कपटी कजरा ढरकि जाए,
मतिया बहकि जाए,हियरा दहकि जाए,
असिया न छुटे मोरा, पोर-पोर टुटे मोरा
जाने कवन लगल बा बिमारी रे विदेसिया।
देखलीं सपनवां,सवनवां मा अइले,
पिया मोरे बगिया में झुलवा झुलइले,
अंखिया खुलल तउ सपन सगरा टूटि गइला
अंसुवा से भीगि गइली सारी रे विदेसिया।
राति-राति सिसकी हम,दिनवां म रोई हो,
काटि खाए सेजिया बलम कइसे सोई हो,
खोई-खोई रही रोटी पोइ नाही पावत बानी
सासू अम्मा देइं सउ-सउ गारी रे विदेशिया।
तोहरा खबर नाहीं,कइसे छटपटाई हो,
डागडर बोलाइ गइला,देइ न दवाई हो,
देहिया जरत बाटइ,संसिया चलत बाटइ,
समझ में न आवइ बिमारी रे विदेसिया।
पियरानी देहिया बा,अंखियां म झाईं हो,
दिल कइ कहानियां हम केकरा बताई हो,
हमरा करेजा फाटइ,पिया निरमोही बाटइ,
जरी जइसे भाड़ में जवारी रे विदेशिया।
देहियां पताइ मोरा, घेरे कमजोरिया,
जाने कहिया छूटि जाई,संसिया क डोरिया
कुछ भी होइ जाए हमके,आगि के लगाए राजा
सोचि,जिया लगे भारी-भारी रे विदेसिया।
सुरेश मिश्र




