#BareillyBNews: बरेली की हर दौर में रही ऐतिहासिक भूमिका डॉ. तुलाई सिंह गंगवार | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
बरेली. देश प्रदेश की राजधानी दिल्ली लखनऊ के बीच बसा बरेली महानगर अब स्मार्ट सिटी का दर्जा प्राप्त कर चुका है। आज के इस स्मार्ट सिटी बरेली की हर दौर में रही ऐतिहासिक भूमिका रही। बरेली का महाभारत काल में भी यहां के पांचाल एवम आंवला के द्रोपदी के किले के अवशेष आज भी है। भारत ने लगभग 700 वर्षों के विदेशी शासन में जागरूकता से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रयास नहीं किया किन्तु इसकी प्राप्ति की इच्छा इसके मस्तिष्कों में सदैव सुलगती रही और अन्ततः सन् 1857 ई. में वह घड़ी आ ही गई जब इनके धैर्य का बांध टूट गया और भारत के लोगो ने स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रथम प्रयास किया।
भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास अपने आप में एक पूर्ण युग है। भारतीय स्वतंत्रता की प्राप्ति में भारत का प्रत्येक व्यक्ति और भारत का प्रत्येक भू भाग किसी न किसी रूप में अवश्य ही जुड़ा रहा है। जनपद बरेली स्वतंत्रता के निपत्ति काल से अर्थात 1857 ई. के विद्रोह से पूर्व ही प्रकाश में आ गया।अतः देश के स्वतंत्रता की प्राप्ति के पश्चात इस प्रकार के अभाव की अनुभूति हुई कि बरेली जनपद के स्वतंत्रता संग्राम में स्वर्णिम योगदान का नकारा नहीं जा सकता। जनपद बरेली उत्तर प्रदेश की कमिश्नरी रोहेलखण्ड का एक प्रमुख जनपद एवं मुख्यालय है। यह पूर्व पश्चिम लगभग 60 मील तथा उत्तर-दक्षिण में 47 मील तक फैला हुआ है। जिला अभिलेख के अनुसार इसका क्षेत्रफल लगभग 1578 वर्ग मील है जो यहां की प्रसिद्ध नदी रामगंगा के कटाव के साथ साथ परिवर्तित होता रहा है। यह प्रदेश के कुल 6 जनपदों से घिरा हुआ है। इसके पूर्व में शाहजहांपुर, पूर्व उत्तर में पीलीभीत, उत्तर में नैनीताल, पश्चिम में रामपुर दक्षिण में मुरादाबाद व बदायूं जनपद स्थित है। ऐतिहासिक दृष्टि से बरेली जनपद उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण जनपद है। बरेली जनपद की स्थापना के विषय में विभिन्न इतिहासकारों तथा शिक्षाविदों के भिन्न-भिन्न मत है। प्रथम मतानुसार इस क्षेत्रपर सन् 1500 ई. में कठेरिया राजपूत राजा जगत सिंह का शासन था। राजा जगत सिंह ने सर्वप्रथम जगतपुर नामक एक छोटे से ग्राम की स्थापना की जो आज भी बरेली नगर का एक प्रसिद्ध मोहल्ला है। इनके पश्चात इनहीं के दो पुत्र बासुदेव और बरलदेव ने सन् 1537 ई. में बास बरेली नामक एक मोहल्ला स्थापित किया तथा एक किले का भी शिलान्यास कराया। यह मोहल्ला आज भी बरेली नगर में पुराना शहर के नाम से जाना जाता है जिसमें किले के अवशेष दिखाई देते हैं। द्वितीय मतानुसार राजा जगत सिंह एक बरहेला राजपूत था जिसके आसुदेव और नागदेव दो पुत्र थे। वासुदेव एक योग्य व्यक्ति था जिसने 1550 ई. में बास बरेली नामक किला अपने पिता जगतसिंह द्वारा स्थापित जगतपुर ग्राम में बनवाया। इसे आज भी मुहल्ला कोट के नाम से पुकारते हैं।
मुगल सम्राट अकबर के शासन काल 1556 ई. से 1605 ई. में कठेरिया राजपूत वासुदेव और बरलदेव ने मुगल साम्राज्य के विरुद्ध संगठित होकर विद्रोह कर दिया। अकबर ने अलमास अली खां के नेतृत्व में एक विशाल सेना राजपूतों से युद्ध करने बरेली क्षेत्र में भेजी। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। परिणामस्वरूप युद्ध में राजपूत योद्धा वासुदेव वीरगति को प्राप्त हुए और बरेली पर मुगलों का अधिकार हो गया। सन् 1568 ई. में बरेली को बदायूँ प्रांत में मिला दिया गया। कुछ वर्षों के पश्चात बरेली को एक स्वतंत्र कमिश्नरी घोषित कर दिया गया।
यदि बांस बरेली क्षेत्र के पूर्व इतिहास पर दृष्टिपात किया जाये तो इस क्षेत्र एक रोचक इतिहास प्राप्त होता है। बरेली क्षेत्र महाभारत काल में पांचाल के नाम से जाना जाता था। जो महाराजा दु्रपद की राजधानी थी। यह क्षेत्र हिमाचल पर्वत से चम्बल की घाटी तक फैला हुआ था। रामगंगा नदी ने पांचाल क्षेत्र को दो भागों में विभक्त कर दिया जिन्हें उत्तरी पांचाल और दक्षिणी पांचाल की राजधानी अहिचक्षेत्र से अलग हो गया।
सैकड़ो वर्षों के उपरान्त रामंगा नदी के उत्तरी तथा अवध के पश्चिमी क्षेत्र को कटेहर नाम से जाना जाने लगा जो सन् 1750 ई. तक इसी कटेहर नाम से पुकारा जाता रहा। कुछ समय के बाद इसी क्षेत्र को रूहेलखण्ड का नाम दे दिया गया और बरेली इस क्षेत्र का मुख्यालय बना दिया गया। प्राचीन युग के बौद्धकाल में संपूर्ण पांचाल क्षेत्र बौद्ध सम्राट अच्युत के अधिकार में आ गया और तब से इस क्षेत्र की राजधानी अहिचक्षेत्र बन गई।
सम्राट अच्युत के पश्चात इस क्षेत्र पर गुप्त, बर्धन आदि वंशों के शासन रहे और सन् 1004 ई. में अहिचक्षेत्र पर कठेरिया राजपूतों का अधिकार हो गया इन राजपूत राजाओं ने काबर नामक स्थान पर एक किले का निर्माण कराया जो आज बरेली की तहसील बहेड़ी में गैर आबाद खण्डहरों का एक स्थान है। राजा बेन इस क्षेत्र का बड़ा प्रभावशाली एवं प्रतापी राजा रहा है जिसने अपनी रानी सुंदरी के लिए काबर के किले में एक सुंदर तालाब रानी ताल और केतपी नामक फुब्बारा भी बनवाया। राजा मोरध्वज जो जैन धर्म का अनुयायी था, ने इसी काबर को इस क्षेत्र की राजधानी बनाया।
कठेरिया राजपूतों ने इस क्षेत्र का नाम कठेर रख दिया जो कालान्तर में कटहर और कटेहर आदि नामों से पुकारा गया। गुलाम वंश के शासकों ने भी जब बदायूं पर अधिकार किया था तो उन्होंने भी बरेली क्षेत्र को बदायूं साम्राज्य में मिला लिया। जब इस क्षेत्र पर बलवन का शासन था यहां के कठेरिया राजपूतों ने बलवन के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। वलवन ने इन राजपूतों का निर्ममतापूर्वक दमन कर दिया। जो राजपूत शेष बचे वे भयभीत होकर इस क्षेत्र को छोड़कर नैनीताल की ओर भागने पर विवश हो गये।
कुछ समय पश्चात जब राजपूतों को अपनी मातृभूमि का ध्यान आया तो नैनीताल के समीपस्थ छिपे राजपूतों ने पुनः संगठित होकर मुस्लिम शासन के विरू( विद्रोह करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। राजपूतों ने आक्रमण करके अपने क्षेत्र बरेली को अधिकृत करके अभूतपूर्व शौर्य का परिचय दिया और सन् 1379 ई. तक राजपूत कटेहर राज्य पर शासन करते रहे। इसी समय कठेरिया राजपूत राजा खड़गसिंह ने शक्ति एकत्र करके बदायूं के तत्कालीन गवर्नर सैय्यद मुहम्मद पर भी आक्रमण कर दिया और उसे परास्त करके बदायूं पर भी अधिकार कर कर लिया। यही नहीं, वीर खड़ग सिंह ने गवर्नर सैय्यद मुहम्मद एवं उनके भाई का बध भी कर दिया। इसके पश्चात राजपूत राजा खड़ग सिंह ने अपनी राजधानी काबर से स्थान्तरित करके आंवला बनाई।
तुगलक वंश के फीरोजशाह तुगलक ने अपने शासनकाल में अपनी विशाल सेना के साथ आक्रमण करके इस पूरे क्षेत्र का विध्वंस कर दिया। इस क्षेत्र के लाखों व्यक्ति या तो मौत के घाट उतार दिये गये या फीरोज तुगलक की गुलाम नीति के शिकार बन गये क्योंकि शरणाथियो को गुलाम बनाना फिरोज तुगलक की व्यक्तिगत रूचि थी। शेष राजपूत पुनः तराई के क्षेत्र की ओर पुनः पलायन कर गए। इसी समय फीरोज ने आंवला के समीप रामनगर में एक किला बनवाया। कठेरिया राजपूत खड़ग सिंह ने पुनः तराई के क्षेत्र में राजपूत सैनिकोें को संगठित करके मुस्लिम शासन पर आक्रमण करने की योजना बनाई। भारत पर तैमूरलंग के आक्रमण ;1598द्ध का लाभ उठाकर राजपूत खड़ग सिंह ने आक्रमण करके पुनः कठेर पर अधिकार कर लिया तथा अपने परिवार एवं सेना को सुरक्षा प्रदान करने के लिए आंवला के समीप ग्राम अतरछेड़ी में एक किला बनबाया।
सन् 1411 ई. में जब कठेर क्षेत्र पर पुनः मुस्लिम आक्रमण हुआ तो उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। सन् 1413 ई. में राजा खड़ग सिंह के भाई हरि सिंह ने दिल्ली के सुल्तान दौलत खां लोदी को अपना शासक मान लिया परन्तु दौलत खां के उत्तराधिकारी खिज्र खां के काल में 1415 ई. में राय हरि सिंह ने विद्रोह कर दिया, जिस पर राय हरि सिंह को कठेर क्षेत्र से भागना पड़ा क्योंकि हरि सिंह की तुलना में खिज्र खां कहीं अधिक शक्तिशाली था। हरि सिंह अपने अनुयायियो सहित तराई क्षेत्र में भ्रमण करते रहे और भिन्न भिन्न योजनायें बनाते रहे। हरि सिंह ने अवसर पाकर 20 हजार सेना संगठित करके पुनः कठेर क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया।
सन् 1526 ई. में जब मुगल सम्राट बावर ने पानीपत के प्रथम यु( में भारतीय सेना को पराजित किया तो उसी समय कठेरिया राजपूतों ने भी कठेर क्षेत्र को स्वतंत्र घोषित कर दिया। परन्तु 1540 ई. में शेरशाह ने हुमायंू को पराजित किया तो कठेर क्षेत्र की कठेरिया राजपूतों के अधिकार से अलग हो गया और नासिर खां नामक एक अफगान सरदार नेे इस क्षेत्र पर अपना अधिकर कर लिया। इसके उपरान्त यह क्षेत्र ईसा खां के सीधे अधिकार में आ गया। जब इस क्षेत्र पर शेरशाह ने स्वतंत्र सरदारों के अधिपत्य की सूचना सुनी तो उसने स्वयं इस क्षेत्र पर अधिकार करके कावर के किले पर अपनी ध्वज पताका फहरा दी।
सन् 1556 ई. में हुमायूं की मृत्यु के पश्चात जब अकबर गद्दी पर बैठा तो अवसर का लाभ उठाते हुए बरेली के कठेरिया राजपूतों ने मुगलों के विरू( विद्राह कर दिया जिसे मुगल सेना के जनरल अलमास अली खां ने प्रतिरोध करके दबा दिया। इसी युद्ध में बरेली के संस्थापक जगत सिंह के बड़े पुत्र वासुदेव वीरगति को प्राप्त हुए। बरेली क्षेत्र पर पूर्णतया मुगलों का अधिकार हो गया। इसके पश्चात बरेली क्षेत्र स्थाई रूप से बदायूं प्रांत में सम्मिलित कर दिया गया।
सन् 1577 ई. में बरेली को सम्भल के हाकिम आइन उल मलिक के अधिकार में दे दिया गया। आइन उल मलिक के पश्चात बरेली पर अकबर के संरक्षक बहराम खां;बैरम खांद्ध का सीधा नियंत्रण रहा और बरेली को दिल्ली शासन के अधीन एक प्रान्त बना दिया गया जिसमें बदायूं और सम्भल भी सम्मिलित कर दिये गये। अकबर के पश्चात जहांगीर के शासन काल में नवाब फरीद खां को बरेली प्रांत का गवर्नर बनाया गया। नवाब फरीद खां अपने नाम पर बरेली से 14 मीर दूर पूर्व दिशा में फरीदपुर नामक एक स्थान की स्थापना कराई जो आज कस्बे के रूप में बरेली जनपद की एक तहसील है।
मुगल सम्राट शाहजहां के शासनकाल ;1628-58द्ध ई. में सर्वप्रथम सुल्तान अली खां को बरेली प्रांत का सूबेदार बनाया गया और शाहजहांपुर को स्थापित करके बरेली प्रान्त में सम्मिलित कर दिया गया। इसी समय बरेली के कठेरिया राजपूतों ने मुगल शासन के विरू( विद्रोह कर दिया तथा इस क्षेत्र के एक बड़े भाग पर अपना अधिकार भी कर लिया। शाहजहां ने इस विद्रोह से निपटने तथा बरेली क्षेत्र को अधिकृत करके शांति स्थापित करने के उत्त् से अपने विश्वासपात्र हिन्दू सरदार राजा मकरन्द राय को बरेली प्रान्त का गवर्नर बना दिया। राजा मकरन्द राय ने शक्ति का प्रयोग करके दवाब पूर्वक विद्रोह को तत्काल तो शान्त कर दिया परन्तु कठेरिया राजपूत पूरी तरह दबाये न जा सके। आधुनिक कैन्टोनमेन्ट के स्थान पर मकरन्द राय के नेतृत्व वाली मुगल सेना और राजपूत सेनाओं के मध्य भीषण यु( हुआ था जिसमें राजपूतों के हजारों सैनिकों सहित राजपूत वासुदेव के लगभग सभी परिवारजन वीरगति को प्राप्त हुए। जो सैनिक जीवित बच रहे वे बरेली क्षेत्र से बाहर भाग गये। यु( से निबटने के पश्चात् गवर्नर राजा मकरन्द राय ने विजय स्मरण हेतु मकरन्दपुर नामक मोहल्ला स्थापित किया। इसके पश्चात् 1657 ई. तक नगर के पास बिहारीपुर मोहल्ला स्थापित किया। इसके पश्चात् 1657 ई. तक नगर के पास बिहारीपुर मलूकपुर नामक मोहल्ले बसाये। उसी समय बरेली की जामा मस्जिद, मिरताई मस्जिद आदि मस्जिदों का निर्माण करवाकर इस्लाम धर्म के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रदर्शित की।
शाहजहां के पश्चात् औरंगजेब ने भी अपने शासनकाल के प्रारम्भ में अपने विश्वासपात्र हिन्दू राजा मकरन्द राय के कार्यों से प्रसन्न होकर पुनः बरेली का गर्वनर उन्हीं को बनाये रखा। औरंगजेब के प्रति भक्ति प्रदर्शित करके उद्देश्य से राजा मकरन्द राय ने सर्वप्रथम आमगीर औरंगजेब के नाम पर बरेली में आलमगीरीगंज नामक मुहल्ले की स्थापना की।
जब कुछ राजपूतों ने यह अनुमान लगा लिया कि राजा मकरन्द राय हिन्दुओं का आंशिक समर्थन करेगा तो इसी आशा के साथ फरीदपुर के राजपूत सरदार कल्यान सिंह ने अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषणा कर दी और मुगलों का विरोध करने लगा। परन्तु सरदार कल्यान सिंह की मृत्यु के पश्चात उसका भतीजा भयभीत होकर औरंगजेब का विश्वासपात्र ही नहीं बना बल्कि उसने हिन्दू धर्म त्यागकर इस्लाम धर्म भी स्वीकार कर लिया। जब कल्यान सिंह का अल्प वयस्क पुत्र ध्यान सिंह वयस्क हुआ तो उसने इस्लाम धर्म स्वीकार करने वाले राजपूतों तथा राजपूतों के विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया। मकरन्द राय ने ध्यान सिंह के विरू( किसी प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की। जब यह समाचार दिल्ली दरबार में सम्राट औरंगजेब के पास पहुंचा, उसने तत्काल ही बरेली के हिन्दू गवर्नर राजा मकरंद राय को कैद करने का आदेश दे दिया।तत्पश्चात अग्रिम आदेशानुसार राजा मकरन्द राय की उंगलिया भी काट ली गयी।
परिणामतद्यःऔरंगजेब ने अनुमान लगा लिया कि बरेली में मुस्लिम गवर्नर रखना ही हितकर रहेगा, इसलिये सन् 1679 ई. में उसने मुहम्मद रफी को बरेली प्रांत का गवर्नर बना कर भेजा। मुहम्मद रफी ने फरीदपुर के राजपूतों को दबाने का भरसक प्रयत्न किया परन्तु वह असफल रहा। अन्त में उसने राजपूतों का पूर्णतया दमन करने के उद्देश्य से दिल्ली से एक विशाल सेना बुलवाई। उसकी सेना तथा फरीदपुर की राजपूत सेना के मध्य दियोरिया;आज बीसलपुर‘पीलीभीत’ के पासद्ध मैदान में भयंकर यु( हुआ। अनतः यु( में साधनहीन राजपूत सेना पराजित हो गई और इस क्षेत्र पर मुगलों का पूर्णतया अधिकार हो गया।
सन् 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् बरेली के ग्रामीण क्षेत्रों में राजपूतों ने विद्राह कर दिया तथा अनेक क्षेत्रों में राजपूतों ने विद्रोह भी कर दिया। इसके पश्चात इस क्षेत्र पर कई बार पठानों और रूहेलों के आक्रमण होते रहे। अन्त में रूहेला सरदार दाऊद खां ने सिरौली पर अधिकार कर लिया, जिससे सन् 1773 ई. तक बरेली में रूहेला सरदारों की तूती बोलती रही। सन् 1707 ई. से 1725 ई. तक दाऊद खां, सन् 1726 ई से 1748 ई. तक अली मुहम्मद और तत्पश्चात 1772 ई. तक हाफिज रहमत खां आदि वीर रूहेला सरदारों के बरेली पर अधिकार रहा। विभिन्न कालोें में विभिन्न यु( करके बरेली खंड ;क्षेत्रद्ध को रूहेलखण्ड के नाम से प्रसि( किया जो कालान्तर में रूहेलखण्ड के नाम से विख्यात हो गया।
जब सन् 1772 ई. में मराठों ने रूहेलखण्ड पर आक्रमण किया तो रूहेला सरदार हाफिज रहमत खां ने नवाब वजीर से पारस्परिक सुरक्षा हेतु एक संधि की जिसके बदलें 40 लाख रूपये देना निश्चित हुआ। यह सन्धि अंग्रेज सेनापति सर राबर्ट वार्कर के सम्मुख हुई थी। सन् 1773 ई. में पुनः मराठों ने रूहेलखण्ड पर आक्रमण किव्योजना बनाई। परंत किसी कारण मराठे बिना आक्रमण किये वापस लौट गये। संधि के अनुसार नवाब बजीर ने हाफिज रहमत खा से 40 लाख रूपया मांगा जिसे रहमत खां ने देने में आनाकानी की, परिणामस्वरूप नवाब शुजा उद्दौला और बरेली के के हाफिज रहमत खां के मध्य तीव्र मतभेद गये। इसी अंतर में नवाब शुजाउद्दौला वारेन हेस्टिग्स में सन्धि हो गई जिससे क्र( होकर 23 अप्रैल 1774 ई. को मीरानपुर कटरा;शाजहांपुरद्ध के मैदान में हाफिज रहमत खां की सेना को गर्वर जनरल वारेन हेस्टिग्स नवाब शुजाउद्दौला की संयुक्त सेना से यु( करना पड़ा। यु( में हाफिज रहमत खां पराजित होकर वीरगति को प्राप्त हुये और बरेली पर अंग्रेजी कम्पनी का अधिकार हो गया।
लगभग 25 वर्षों तक रूहेला सेना और कम्पनी सेना के मध्य छुट पुट यु( होते रहे। अन्त में सन् 1801 ई. में बरेली पर ब्रिटिश कंपनी का पूर्णतया अधिकार हो गया।
1857 ई. से पूर्व स्वतंत्रता आन्दोलन और बरेली अवध के नवाब सआदत अली खां ने बरेली को सन् 1801 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में दे दिया और कम्पनी के शासन काल में इसे रूहेलखण्ड की राजधानी बना दिया गया, साथ में इसे बंगाल महाप्रांत के अधीन कर दिया। बरेली के राजपूतों के सफल निर्देशन और नेतृत्व में यहां का जनमानस अंग्रेजी ; ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के द्ध साम्राज्य के विरू( सन् 1801 ई. से 1812 ई. तक विद्रोह तो करता रहा परन्तु साधनोें के अभाव और अंग्रेज अधिकारियों की कूटनीति के कारण सफलता नहीं मिल सकी। सन् 1813 ई. में नेपाल नरेश की गोरखा सेना और अंग्रेज सेनापति मेजर हर्सी के नेतृत्व में नेपाल नरेश की गोरखा सेना और अंग्रेज सेनापति मेजर हर्सी को कैद कर लिया। परिणामतः बरेली के तत्कालीन मुस्लिम नेता मुफ्ती मुहम्मद एवज ने यह अनुभव किया कि वे भी अंग्रेजी साम्राज्य के विरू( विद्रोह करके उसे पराजित कर सकते हैं। मुफ्ती मुहम्मद एवज के हजारों अनुयायी बरेली के हुसैन बाग में एकत्र हुये तथा तलवारें और बन्दूकें लेकर अंग्रेजी सेना पर टूट पड़े। उस समय अंग्रेजी सेना में कुल 150 देशी सैनिक थे। परिणामस्वरूप यु( में बरेली के मुफ्ती मुहम्मद एवज को अंग्रेजी सेना के विरू( प्रथम विजयश्री प्राप्त हुई।
कम्पनी की सेना की पराजय के पश्चात् अंग्रेज अधिकारियों ने मुरादाबाद से मेजर कर्निघम के नेतृत्व में सेना की एक विशाल टुकड़ी मांगा ली परन्तु यह भी बरेली के मुफ्ती सैनिकों पर विजय प्राप्त न कर सकी। तत्कालीन यु( में अंग्रेजी सेना के 21 और मुफ्ती सेना के 20 सैनिक हताहत हुए तथा दोनों ओर के सैकड़ों सैनिक घायल हुए। अन्त में कम्पनी के अधिकारियों के कूटनीतिक हस्तक्षेप के कारण संधि करने का निर्णय किया गया। अगले दिन संधि पर हस्ताक्षर होने वाले ही थे कि किसी व्यक्ति ने बरेली के तत्कालीन न्यायाधीश मिस्टर सैसिस्टर के पुत्र को गोली मार दी। इस दुर्घटना का समाचार प्राप्त होते ही मुरादाबाद का सेनापति मेजर कर्निघम बहुत दुखी और क्रोधित हुआ और उसने बरेली की जनता को लूटने, प्रताड़ित करने और यातनायें देने के उद्देश्य से मुरादाबाद की बड़ी सेना की तेरहवीं टुकड़ी बुला ली। सेना ने अंधाधुंध गोला-बारी की जिससे बरेली में त्राहि-त्राहि मच गई। इसमें लगभग 500 व्यक्तियों को तत्काल ही मौत के घाट उतार दिया गया तथा हजारों की संख्या मे जनमानस घायल हो गया।
इस दुर्घटना के परिणाम स्वरूप बरेली का जनमानस उद्वेलित हो उठा और अपने कंधे से ब्रिटिश सत्ता का जुआं उतार फेंकने को उतावला गया । स्वतंत्रता के लिए प्रतिक्षण आन्दोलनकारी कदम उठाने की तैयारी करने लगा।
जहां एक ओर ब्रिटिश साम्राज्य के विरू( उत्तेजित वातावरण बन रहा था वहीं दूसरी ओर सन् 1814 ई. में ब्रिटिश कम्पनी के अधिकारियों ने रूष्ट होकर बरेली की जनता को यातनाएं देने के उद्देश्स से भवन कर का आदेश प्रसारित कर दिया जिसके विरू( जन आन्दोलन ही एक विकल्प था। इस आदेश के विरोध में बरेली नगर में बड़ी हड़ताल हुई जिसमे बरेली के हजारों नागरिक एकत्र होकर अपना विरोध प्रदर्शित करने कलेक्ट्रेट गये और तत्कालीन जिलाधिकारी मि. डम्बयलटन को एक विरोध पत्र दिया। इस आन्दोलनकारी प्रदर्शन का नेतृत्व मुफ्ती मुहम्मद एवज कर रहे थे क्योंकि उस समय के वह ही एक मात्र प्रसि( नेता थे। इस प्रकार के प्रदर्शन से जिलाधिकारी मि. डम्बलटन बहुत क्रोधित हुआ और उसने अवैधानिक रूप से प्रदर्शनकारी भीड़ को हटाने तथा नगर में शांति स्थापित करने के आदेश दिये। उग्र भीड़ नारेबाजी भी करने लगी। इससे जिलाधिकारी और अधिक चिढ़ गया तथा उसने लाठी चार्ज करने जैसे घृणित आदेश देने में भी हिचक नहीं की। नगर कोतवाल ने आदेश का पालन किया जिस से सैकड़ों नागरिक बुरी तरह घायल हो गये और भयभीत होकर अपने अपने घर लौट गये।
इस प्रकार बरेली के जनमानस को अंग्रेजी शासन विरोधी छोटी छोटी गतिविधियों में कठोर से कठोर दण्ड दिया जाने लगा, जिससे जनता में अन्दर ही अन्दर कम्पनी के शासन के विरू( विद्रोह की भावनायें और अधिक उग्र रूप धारण करने लगीं। इसका परिणाम यह हुआ कि 16 अपै्रल सन् 1816 ई. को बरेली की जनता ने अंग्रेजी शासन के विरू( आन्दोलन प्रारंभ कर दिया। वास्तव में यह आन्दोलन शासन के अत्याचारों के विरोध में किया गया था। बरेली के हिन्दू और मुस्लिम समाज ने एकता का परिचय दिया जिसके कारण नगर का संपूर्ण यातायात अवरू( रहा। जब इसकी सूचना जिलाधिकारी मि. डम्बलटन को प्राप्त हुई तो वह क्रोध से आग बबूला हो गया। उसने सन् 1814 ई. के आदेश की भांति पुनः आन्दोलनकारियों से प्रतिशोध लेने हेतु नगर कोतवाल को आदेश दिया कि वह घुड़सवार पुलिस के द्वारा संपूर्ण नगर में गश्त का प्रबन्ध करें तथा पूर्णतया शान्ति स्थापित करें। साथ उन व्यक्तियों से कठोर व्यवहार करने का भी आदेश दिया जो आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। आदेश का पालन करने के लिए अंग्रेजों की घुडसवार पुलिस सर्पप्रथम आन्दोलन के नेता मुफ्ती मुहम्म्द एवज के निवास ;मोहल्ला नौमहलाद्ध पर पहुंची और फायरिंग की। अंग्रेज सैनिकों द्वारा किये फायरिंग को सुनकर नौमहला मोहल्ले के निवासी उत्तेजत हो उठे और उन्होंने सैनिकों को ;सामना करने के लिए द्ध ललकारा। दोनों पक्षें में मुठभेड़ हुई। इसमें नौमहला मुहल्ला के दो वीर सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए और अनेक घायल हुये। अंग्रेजी सेना के भी दो सिपाही हताहत हो गये। यह मुठभेड़ 5 घंटे तक चलती रही थी।
मुठभेड़ के पश्चात बरेली के नेता मुफ्ती मुहम्मद एवज हुसैनबाग में स्थित अपने निवास को चले गये परन्तु कई व्यक्तियों को कम्पनी के सैनिकों ने कैद कर लिया और इस आशय से कारागार भेज दिया कि जिससे शेष जनमानस को भय बना रहे कि कंपनी के शासन के विरू( प्रदर्शन किये गये विद्रोह से ऐसा दण्ड मिलता है। परन्तु इस कुकृत्य का आम जनमानस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और कम्पनी के शासन के विरू( प्रदर्शन होते रहे। तत्कालीन प्रदर्शनों की सबसे बड़ी विशेषता और गौरव की बात यह थी कि सन् 1834 ई. तक जितनी बार भी विद्रोह या प्रदर्शन हुये, सभी में हिन्दू और मुसलमानों ने कन्धे से कन्धा मिलाकर सौहाद्रतापूर्वक कार्य किया, जिससे कम्पनी का शासन उन्हें भयभीत न कर सका।
सन् 1837 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेजी सेना की रक्षा हेतु बरेली छावनी ;कैंटद्ध में एक अस्थाई किला की स्थापना की, क्योंकि अब अंगेज अधिकारियो को यह आभास होने लगा था कि बरेली का जनमानस आन्दोलनकारी प्रवृत्ति का है और इसमें बिना साम्प्रदायिकतावादी नीति का सूत्रपात किये सफलता प्राप्ति बहुत दूर है। फलस्वरूप शासन के अधिकारियों ने फूट डालो और शासन करो की नीति अपनाना प्रारंभ की, क्योंकि वे समझ रहे थे कि इसी नीति से हिन्दू और मुसलमानों में पारस्परिक वैमनस्य उत्पन्न किया जा सकता है और तभी अंग्रेजी कम्पनी की स्थाई सरकार स्थापित हो सकती है।
संयोगवश सन् 1837 ई. में हिन्दू त्योहार होली और मुस्लिम त्योहार मुहर्रम एक ही तिथि में पड़े। पूर्व से ही नगर में दोनों धर्मों के जुलूस निकला करते थे। बरेली के तत्कालीन जिलाधिकारी मि. क्लार्क ने अवसर का लाभ उठाना चाहा और उसने हिन्दू और मुसलमान समाज में वैमनस्य उत्पन्न कराने के उद्देश्य से दोनों धर्म के प्रमुख नेताओं का जुलूस निकलने से एक दिन पूर्व ही बरेली कलेक्ट्रेट में आमंत्रित किया जिससे दोनों धर्म के नेताओं के मध्य शांति बनाये रखने के सम्बंध में वार्ता हो सके। इस बैठक में दोनों धर्मों के नेताओं से शान्ति बनाये रखने की अपील की गई।
दोनों धर्मों के समाज ने सूझ-बूझ का परिचय दिया और अंग्रेजी शासन को यह दिखा दिया वे एक हैं, इसलिये पहले से किसी प्रकार का पारस्परिक वैमनस्य नहीं मिला। अतः दोनों जुलूस शान्ति और अमन के वातावरण में गुजरे।
जब अंग्रेजों की आशा के विरू( जुलूस के अनुयायियों के मध्य सौहाद्रपूर्ण वातावरण बना रहा तो अंग्रेज अधिकारियों ने बरेली के मुस्लिम जगत को हिन्दू समाज के विरू( प्रेरित करना प्रारम्भ कर दिया, इसकी पुष्टि इस उदाहरण से स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाती है कि बरेली के एक मुसलमान भाई वासिल मियां उर्फ पहलवान साहब को हिन्दू विरोधी गतिविधियों के तहत फुसलाकर हिन्दू समाज के विरू( प्रेरित किया। यद्यपि पहलवान वासिल मिया राष्ट्रीय विचारधारा वाले एक ऐसे व्यक्ति थे जिन पर साम्प्रदायिकतावादी विचारों का कोई प्रभाव पड़ना दुष्कर था परन्तु अंग्रेजों की नीति ने उन्हें भी फांस लिया जिससे वे भी साम्प्रदायिक विचारों में लिप्त हो गये उन्हें बताया किया कि चौधरी बसन्त राय, बरेली के हिन्दू समाज के ऐसे एकमात्र हिन्दू नेता हैं जो केवल बरेली के हिन्दुओं की ही दशा में सुधार चाहते हैं और सदैव ही मुस्लिम जगत की प्रतिष्ठा को गिराना चाहते हैं तथा वे कुछ समय में ही बरेली के चमकते मुसलमानों का वध करके शहर से बाहर फेंक देंगे। फिर क्या था? वासिल मियां की राष्ट्रीय विचारधारायें साम्प्रादयिकता से परिपूर्ण हो गयीं और वे चौधरी बसंत राय के शत्रु बन गये तथा चौधरी बसंतराय का वध करने की युक्तियां सोचने लगे।
सन् 1838 ई. चौधरी बसंत राय का वध करने की योजना से वासिल मियां ने दरियां और कालीनें बेचने का वयापार प्रारंभ किया तथा शहर की सड़को एवं संकरी गलियों में कालीन विक्रय कार्य प्रारंभ किया। जब उन्होंने चौधी बसंतराय के घर के पास जाकर दरी लो दरी की कड़कती हुई ध्वनि उच चारित की तो चौधरी साहब ने अपने नौकर को भेज वासिल मियां को बुला लिया। उन्हें क्या पता था कि उनका अंतिम समय आ चुका है। भवन की दूसरी मंजिल पर दरी विक्रेता को पहुंचा चौधरी साहब का नौकर चला गया। वासिल मियां चौधरी बसंत राय की दरियां दिखाने लगे। जैसे ही पलंग पर बैठे चोधरी बसंत राय ने झुककर दरी देखने के लिए उस पर हाथ लगाया, कि दरी विक्रेता वासिल मियां ने अति शीघ्रता से अवसर का लाभ उठाकर दरी की तह में छुपा तेज धार वाला छुरा चौधरी साहब के पेट में घोंप दिया। जहां एक ओर पहलवान वासिल मियां दरिया छोड़ तेजी से भागे, वहीं दूसरी ओर चौधरी साहब बचाओ बचाओ कहते हुये भूमि पर गिर पड़े।
जैसे ही चौधरी साहब की रूग्ण ध्वनि उनके कुत्तों ने सुनी, वे तेजी से झपटे और अपने मालिक चौधरी साहब को जमीन पर निस्चेत अवस्था में पड़ा देख सीढ़ियों पर तेजी से उतर रहे वासिल मियां पर झपट पड़े तथा सीढ़ियों के मध्य में ही मियां वासिल पहलवान को गिरा लिया। जब तक मियां साहब लुढ़कते हुये जीने की अंतिम सीढ़ी पर गिरे, कुत्ते नोंच नोंच कर उन्हें अधमरा कर चुके थे। अब तक चौधरी बसंत राय के लगभग सभी नौकर भी आ गये। उन्होंने रक्त रंजित दरी विक्रेता मियां साहब को किसी प्रकार कुत्तों से छुड़ाया और वासिल मियां को पुलिस के अधिकार में दे दिया। वासिल मियां पर काफी समय तक मुकदमा चलता रहा। अन्ततः चौधरी बसंत राय की हत्या के अभियोग में मियां वासिल को प्राण दण्ड दे दिया गया। बाद में उनकी निष्प्राण देह को उनके परिवार जनों को सौंप दिया गया। परिवारजनों ने उसे नगर के मध्य दफना दिया। बाद में शहीद मजार के रूप में व्यवस्थित कर दिया।
यद्यपि यह घटना केवल दो व्यक्तियों चौधरी बसंत राय और वासिल मियां के मध्य की थी, फिर भी अंग्रेज अधिकारियों ने इसे साम्प्रदायिकता का रूप दे दिया जिससे आगामी कुछ वर्षों तक बरेली के हिन्दू और मुस्लिम समाज के मध्य पारस्परिक वैमनस्य बना रहा जिससे अंग्रेजों को काफी सीमा तक लाभ मिलते रहे और अंग्रेज अधिकारी निश्चित होकर दोनों धर्मवलंबियों को समय समय पर यातनायें देते रहे। वास्तविकता यह थी कि अंग्रेजी सरकार से बरेली का कोई वर्ग, सम्प्रदाय अथवा व्यक्ति प्रसन्न नहीं था जिससे यहां के रूहेलों, राजपूतों और पठानों में अंग्रेजी शासन के विरू( विद्रोह की भावनायें आन्तरिक रूप से पनपने लगीं परन्तु वाह्य रूप से सामने आने में असमर्थ थे।
सन् 1854 ई. में रूहेला सरदार हाफिज रहमत खां के एक वजीर ;मंत्रीद्ध राव चम्पत सिंह ने बरेली में चंपतराय बाग लगवाया और उसमें हिन्दुओं की पूजा हेतु एक विशाल मन्दिर की भी स्थापना की। बरेली का जनमानस अंग्रेजी शासन से अप्रस€नन ही नहीं था बल्कि भयभीत भी था। इसका एक कारण यह भी था कि प्रत्येक ग्राम और नगर के प्रत्येक मुहल्ले में अंग्रेजों के कुछ मुखबिर पैदा हो गये जो सदैव जनता का शोषण करते रहते थे। ये हां हुजूर कहने वाले चाटुकार अंग्रेज अधिकारियों को कभी जनता की भावनाओं तथा उनकी यथा स्थिति को स्पष्ट रूप से समझने नहीं देते थे। बल्कि हर समय अपनी स्वार्थ सिद्ध तथा धन लूटने में ही व्यस्त रहते थे। जनता के हृदय में इन चापलूसों और ब्रिटिशा शासन के विरू( ज्वालामुखी धधक रही थी जिसका कम्पनी के अधिकारियों को लेशमात्र भी अभास नहीं था। अंग्रेज शासकों को ये चापलूस सदैव यह कहकर संतुष्ट करते रहते थे कि बरेली में पूर्णतया शान्ति है तथा बरेली के किसी वर्ग में कंपनी के शासन के विरू( आवाज उठाने का साहस नहीं है।
इस प्रकार लगभग 15 वर्षों के पश्चात जहां एक ओर बरेली की आम जनता अंग्रेजों के मुखविरों से ऊब चुकी थी, वहीं दूसरी ओर गर्वनर जनरल की हड़पनीति के कारण स्वाधीनता प्रेमियों ने अंततः ब्रिटिश सत्ता का जुआ उतार कर फेंकने का निश्चय किया और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांति करने का आव्हान किया।
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