#Article: लोकसभा चुनाव 2024 घोषणा पत्र-संकल्पपत्र बनाम न्यायपत्र | #NayaSaveraNetwork

  • राजनीतिक पार्टियों को चुनावी घोषणा पत्र बनाते समय सुप्रीम कोर्ट व चुनाव आयोग की गाइडलाइंस का स्वतःसंज्ञान लेना समय की मांग 
  • चुनावी घोषणा पत्र में मुफ्त रेवड़ियां बांटने की घोषणाओं से मतदाताओं की,स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ हिलाने से इनकार नहीं किया जा सकता- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया 

नया सवेरा नेटवर्क

गोंदिया - विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी महापर्व लोकसभा चुनाव 2024 के प्रथम चरण 19 अप्रैल 2024 जिसमें 102 सीटों का चुनाव होना है इसके ठीक चार दिन पूर्वसत्ताधारी पार्टी ने बाबासाहेब अंबेडकर जयंती 14 अप्रैल 2024 को अपना घोषणा पत्र,संकल्प पत्र जारी कर दिया है। बता दें कि इसके पूर्व 10 अप्रैल को समाजवादी पार्टी और पिछली 5 अप्रैल को कांग्रेस पार्टी ने भी अपना चुनावी घोषणा पत्र, न्याय पत्र जारी कर दिया था।बता दें कि 

घोषणा पत्र बड़े पैमाने पर जनता के लिए एक बेंचमार्क के रूप में काम करता है जिसमें संबंधित राजनीतिक दल की विचारधारा और जनता के लिए उसकी नीतियों और कार्यक्रमों का ब्योरा होता है। दलों के मेनिफेस्टो की तुलना करके मतदाता फैसला ले पाते हैं कि उन्हें किस पार्टी को वोट देना है। ऐसा देखा गया है कि कई पार्टियां मेनिफेस्टो में तो बड़े-बड़े ऐलान करती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद वो किए हुए वादों को निभाने में 100 प्रतिशत सफल नहीं हो पाती। क्या वो अपने वादों को निभाने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य हैं?, नहीं! किसी भी चुनाव में वोटर ही सर्वेसर्वा होता है और वही अंतिम निर्णायक भी होता है। इसी वजह से चुनाव से पहले सभी पार्टियां अपना घोषणा पत्र लेकर आती हैं, जिसमें यह बताया जाता है कि उनका एजेंडा क्या है। ये पार्टियां अपने घोषणापत्र में यह बताती हैं कि चुनकर आने पर वे जनता के हित में क्या-क्या काम करेंगी, कैसे सरकार चलाएंगी और जनता को क्या फायदा होगा।चूंकि अभी करीब क़रीब सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने अपने घोषणा पत्र जारी कर दिए हैं और राजनीतिक पार्टियों को चुनावी घोषणा पत्र बनाते समय सुप्रीम कोर्ट व चुनाव आयोग की गाइडलाइंस का स्वतःसंज्ञान लेना समय की मांग है,इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से इस आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे लोकसभा चुनाव 2024 घोषणापत्र, संकल्प पत्र बनाम न्याय पत्र और चुनावी घोषणा पत्र में मुफ्त रेवड़ियां बांटने की घोषणाओं से मतदाताओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ हिलाने से इनकार नहीं किया जा सकता।

साथियों बात अगर हम दो मुख्य पार्टियों द्वारा 10 और 14 अप्रैल 2024 को जारी घोषणा पत्र की करें तो,कांग्रेस ने 5 अप्रैल को अपना घोषणा पत्र जारी किया था। उन्होंने इसे न्याय पत्र नाम दिया। पार्टी ने इसमें 5 न्याय के साथ 25 गारंटियां दी हैं। इसमें गरीब महिलाओं को हर साल 1 लाख रुपए, 400 रुपए मजदूरी, फसलों की एमएसपी पर कानून, जाति जनगणना करवाने और अग्निवीर योजना बंद करने का वादा शामिल है। दूसरी ओर भाजपा के घोषणा पत्र का विषय सांस्कृतिक राष्ट्रवादके साथ मोदी की गारंटी:विकसित भारत 2047 पर फोकस है। पार्टी संकल्प पत्र में केवल उन्हीं वादों को शामिल किया, जो पूरे किए जा सकें। घोषणा पत्र विकास,समृद्ध भारत, महिलाओं  युवाओं, गरीबों और किसानों पर केंद्रित। बता दें पीएम ने चुनावी मेनिफेस्टो के लिए 25 जनवरी 2024 को जनता से सुझाव मांगे थे। पार्टी को 15 लाख से ज्यादा सुझाव मिले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नमो ऐप के माध्यम से 4 लाख और वीडियो के माध्यम से 11 लाख सुझाव मिले। पार्टी ने 30 मार्च को लोकसभा चुनाव 2024 के लिए मेनिफेस्टो कमेटी का ऐलान किया था। कमेटी में कुल 27 मेंबर थे। 

साथियों बात अगर हम घोषणा पत्र के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 जुलाई 2013 को अपने फैसले/आदेश में अन्य बातों के साथ प्रेक्षण व निर्देश की करें तो, उच्‍चतम न्‍यायालय के प्रेक्षण एवं निदेश माननीय उच्‍चतमन्‍यायालय ने एसएलपी (सी) संख्‍या 2008 का 21455 में अपने 5 जुलाई, 2013 के फैसले/आदेश में अन्‍य बातों के साथ-साथ भारत निर्वाचन आयोग को निदेश दिया कि वह आदर्श आचार संहिता के भाग के रूप में सम्मिलित किए जाने के लिए निर्वाचन घोषणा पत्रों के बारे में दिशानिर्देश तैयार करे। उच्‍चतम न्‍यायालय ने निदेश प्रेक्षण किया है और निदेश दिया है कि :उच्‍चतम न्‍यायालय के फैसले का पैरा (77) : 77)यद्यपि  विधि स्‍पष्‍ट है कि निर्वाचन घोषणा-पत्रों में वादों को लोक प्रतिनिधित्‍व अधिनियम की धारा 123 के अधीन भ्रष्‍ट आचरण नहीं माना जा सकता है, यथार्थ को नकारा नहीं जा सकता है कि किसी भी प्रकार की मुफ्त वस्‍तुओं (फ्रीबीज) के वितरण से नि:संदेह सभी लोग प्रभावित होते हैं। यह स्‍वतंत्र एवं निर्वाचनों की जड़ को काफी झकझोर देता है। निर्वाचन आयोग ने भी अपने वकील के माध्‍यम से शपथ-पत्र और तर्क दोनों में इस भावना को प्रदर्शित किया कि सरकारी लागत पर ऐसी मुफ्त वस्‍तुओं (फ्रीबीज) के वचन से एक समान अवसर की व्‍यवस्‍था बाधित होती है और निर्वाचन प्रक्रिया दूषित होती है तथा इस प्रकार इस संबंध में इस न्‍यायालय के किन्‍हीं निदेशों या निर्णय को कार्यान्वित करने की इच्‍छा व्‍यक्त की। पैरा (78):78) जैसा कि निर्णय के पूर्व भाग में देखा गया, इस न्‍यायालय की, किसी विशेष मुद्दों पर विधान बनाने के लिए विधानमंडल को निदेश जारी करने की शक्ति सीमित है। तथापि, निर्वाचन आयोग, निर्वाचनों में निर्वाचन लड़ रहे दलों और अभ्‍यर्थियों के बीच समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए और यह भी सुनिश्चित करने के लिए कि निर्वाचन प्रक्रिया विगत की तरह दूषित न हो, आदर्श आचार संहिता के अधीन अनुदेश जारी करता रहा है। इन शक्तियों, जिनके अधीन आयोग ये आदेश जारी करते हैं, का प्रमुख स्रोत संविधान का अनुच्‍छेद 324 है जिसमें आयोग को अधिदेश दिया गया है कि वह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन आयोजित करे। यह स्‍वीकार करना समान रूप से अवश्‍यक है कि निर्वाचन आयोग ऐसे आदेश जारी नहीं कर सकते हैं, यदि आयोग के आदेश की विषय-वस्‍तु विधायी उपाय द्वारा कवर हो।पैरा (79):79) इसलिए, यह विचार करते हुए कि ऐसा कोई अधिनियम नहीं है जो प्रत्‍यक्ष रूप से निर्वाचन घोषणा पत्रों को शासित करता है, हम एतद्द्वारा निर्वाचन आयोग को निदेश देते हैं कि वह अभ्‍यर्थियों के साधारण आचरण, सभाओं, जुलूसों, मतदान दिवस, सत्तासीन दल आदि के लिए दिशानिर्देश बनाते समय सभी मान्‍यताप्राप्‍त राजनैतिक दलों के परामर्श से घोषणा-पत्रों के लिए दिशानिर्देश बनाए। इसी प्रकार, राजनैतिक दल द्वारा जारी निर्वाचन घोषणा पत्रों के लिए दिशानिर्देश हेतु एक पृथक शीर्ष को राजनैतिक दलों और अभ्‍यर्थियों के मार्गदर्शन के लिए आदर्श आचार संहिता में भी सम्मिलित किया जा सकता है। हमारे ध्‍यान में यह तथ्‍य है कि साधारणतया राजनैतिक दल निर्वाचन की तारीख की उद्घोषणा से पूर्व अपने निर्वाचन घोषणा पत्रों को जारी करते हैं, उस स्थिति में, निश्चित रूप से निर्वाचन आयोग को तारीख की उद्घोषणा से पूर्व किए गए किसी कृत्‍य को विनियमित करने का प्राधिकार नहीं होगा। तथापि, इस संबंध में एक अपवाद बनाया जा सकता है क्‍योंकि निर्वाचन घोषणा पत्र का उपयोग निर्वाचन प्रक्रिया से सीधा जुड़ा हुआ है। पैरा (80):80) हम एतद्द्वारा निर्वाचन आयोग को निदेश देते हैं कि वह इस कार्य के अत्‍यधिक महत्‍व के कारण यथाशीघ्र इस कार्य को शुरू करे। हम अपने लोकतांत्रिक समाज में राजनैतिक दलों को शासित करने के लिए इस संबंध में विधानमंडल द्वारा पारित किए जाने के लिए एक पृथक विधान की जरूरत को भी दर्ज करें। 

साथियों बात अगर हम चुनावी घोषणा पत्र संबंधी चुनाव आयोग की गाइडलाइंस की करें तो, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने मामले पर चर्चा के लिए मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य राजनीतिक दलों के साथ एक बैठक की। इसके बाद सभी दलों की सहमति से चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता के तहत घोषणा पत्र को लेकर दिशा निर्देश तय किए थे, जिसका संसद या राज्य के किसी भी चुनावके लिए चुनावघोषणापत्र जारीकरते समयराजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को पालन करना आवश्यक है। आयोग की गाइडलाइन कुछ इस प्रकार हैं:-चुनावी घोषणापत्र में संविधान में निहित आदर्शों और सिद्धांतों के प्रतिकूल कुछ भी नहीं होगा और यह आदर्श आचार संहिता के अन्य प्रावधानों की भावना के अनुरूप होगा।संविधान में निहित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत राज्यों को नागरिकों के लिए विभिन्न कल्याणकारी उपाय करने के आदेश हैं,इसलिए चुनावी घोषणापत्रों में ऐसे कल्याणकारी उपायों के वादे पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। हालांकि, राजनीतिक दलों को ऐसे वादे करने से बचना चाहिए, जिनसे चुनाव प्रक्रिया की शुचिता प्रभावित हो या मतदाताओं पर उनके मताधिकार का प्रयोग करने में अनुचित प्रभाव पड़ने की संभावना हो। घोषणापत्र में पारदर्शिता, समान अवसर और वादों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह अपेक्षा की जाती है कि घोषणापत्र में किए गए वादे स्पष्ट हों और इसे पूरा करने के लिए वित्तीय संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे, इसकी भी जानकारी हो। मतदाताओं का भरोसा उन्हीं वादों पर हासिल करना चाहिए, जिन्हें पूरा किया जाना संभव हो।चुनावों के दौरान निषेधात्मक अवधि (मतदान शुरू होने से 48 घंटे पहले) के दौरान कोई भी घोषणापत्र जारी नहीं किया जा सकेगा। 

साथियों बात अगर हम दो मुख्य पार्टियों द्वारा चुनावी घोषणा पत्र में किया किस वर्ष का वादा किस वर्ष में निभाया यह जानने की करें तो, बीजेपी चुनावी घोषणा पत्र में 1984 में क‍िया वादा 2019 में न‍िभाया,आदर्श स्‍थ‍ित‍ि यह है क‍ि घोषणापत्र में पांच साल में पूरे क‍िए जाने लायक वादे ही होना चाह‍िए, क्‍योंक‍ि पांच साल बाद फ‍िर से चुनाव होने हैं। लेक‍िन, ऐसा होता नहीं है। नीचे द‍िए गए चार्ट से यह स्‍पष्‍ट है। बीजेपी ने 1984 के अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर जम्मू और कश्मीर से धारा 370 को समाप्त करेगी, लेक‍िन साल 2019 में उसने अपने इस वादे को पूरा किया। कब किया वादा,(बीजेपी) क्या था वादा, कब हुआ पूरा,1984 धारा 370 की समाप्ति 2019, 1996 ईडब्ल्यूएस आरक्षण 2019,1989 यूसीसी 2024 (उत्तराखंड में),1991 राममंदिर निर्माण2024,2019 सीएए 2024, इसी तरह कांग्रेस ने साल 2004 के घोषणा पत्र में इस बात का वादा किया था कि वह राइट टूएजुकेशन का अधिकार देगी और उसनेसाल 2009 में यूपीए की सरकार के दौरान अपने इस वादे को पूरा किया। कब किया वादा,(कांग्रेस)क्या था वादा, कब हुआ पूरा, 2004 मनरेगा एक्ट 2005, 2004 राइट टू एजुकेशन एक्ट 2009 नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट 2013 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि लोकसभा चुनाव 2024 घोषणा पत्र-संकल्पपत्र बनाम न्यायपत्र।राजनीतिक पार्टियों को चुनावी घोषणा पत्र बनाते समय सुप्रीम कोर्ट व चुनाव आयोग की गाइडलाइंस का स्वतःसंज्ञान लेना समय की मांग।चुनावी घोषणा पत्र में मुफ्त रेवड़ियां बांटने की घोषणाओं से मतदाताओं की,स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ हिलाने से इनकार नहीं किया जा सकता।


-संकलनकर्ता लेखक - कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


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