कवि गिरीश के कुछ मुक्तक | #NayaSaveraNetwork
माना कि तेरे प्यार का मै मुस्तह़क नहीं।।
दीदार कर लूँ क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं।।
तु ग़ैर सही फिर भी मुझे तुम से प्यार है-
हालांकि कि जिसको चाहा मिला आज तक नहीं।।
समस्या आने से पहले ही हल मिला मुझको,।।
तुम्हारे आने से साहस ओ बल मिला मुझको।।
तुम्हारा आना बहारों का आना जीवन में-
बड़े ही भाग्य से खुशियों का पल मिला मुझको।।
कोई सम्बन्ध नहीं हाल-चाल लेते हैं।।
गिरने से पहले ही अक्सर सम्हाल लेते हैं।।
दर्द अहसास मेरा जानेमन नहीं करते-
रूठ कर जान मेरी क्यों निकाल लेते हैं।।
दान में कौन और है समर्थ , देते हैं !
भाव देते हैं ,शब्द और अर्थ देते हैं !
अपने हिस्से से अधिक चाहते हैं जो अक्सर ,
दोष क़िस्मत को वही लोग व्यर्थ देते हैं !
सत्ता के लिए धर्म और ईमान बेच कर।।
जीते जी मर गए वो आन बान बेच कर।।
अपमान कर रहे हैं श्री राम का जो लोग-
सम्मान चाहते हैं वो सम्मान बेच कर।।
नेह निर्मल अपार पाता हूँ।।
सारे ग़म दर्द भूल जाता हूँ।।
दिल को मेरे सुकूँन मिलता है-
जीत कर भी मैं हार जाता हूँ।।
दुखों से दूर खुशियों का सुखद पल याद आता है।।
न जाने क्यों मुझे बीता हुआ कल याद आता है।।
मेरी अम्मा मेरे बाबू का स्नेहिल प्यार संरक्षण-
भला कैसे भुला दू़ं, नेह निर्मल याद आता है।।
यकिनन बन्द दरवाजों को पल में खोल देते हैं।।
सूना है देखा है आंखों से पत्थर बोल देते हैं।।
प्रभु श्री राम सुख सागर हैं,गुन आगर हैं अविनाशी-
नहीं है मोल कोई मोतियां अनमोल देते हैं।।
धरा आकाश सूरज चाँद ये बादल नहीं होता।।
कहीं सागर नहीं होता कहीं मरुथल नहीं होता।।
न कोई संस्कृति होती, न कोई सभ्यता होती-
अगर श्री राम न होते तो जग मंगल नहीं होता।।
अनचाहे बादल को विकल बरसना पड़ता है।।
मन के ढ़ीले तारों को भी कसना पड़ता है।।
खुशी मिले अपनों को ग़म में भी मुस्काता हूँ-
बोझिल आंखे घनी उदासी हंसना पड़ता है।।
खुश्बू को दिशाओं में बिखरने नहीं देगें।।
फूलों को बहारों में संवरने नहीं देगें।।
पूरी न हो कभी जो वो जिद कर रहे हैं क्यूँ-
बादल को है औकात बरसने नहीं देगें।।
दीवानगी की हद है, मुहब्बत का असर है।।
मिल जाती नज़र से नज़र बैचैन नज़र है।।
जीना हराम कर दिया बेचैन हैं हमदम-
मिलने की अभी मन में मेरे कोर कसर है।।
विचलित न हो कभी भी आधार आप का।।
सुरभित रहे सुगन्ध से संसार आप का।।
हम आपके गुलाम हैं सदके हजार बार-
मेरे लिए संजिवनी है प्यार आप का।।
कवि— गिरीश, जौनपुर।
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