मोक्ष की बुनियाद! | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
मोक्ष की बुनियाद!
तूने काटा है जो दरख़्त वो परिन्दों का आशियाना था,
मगर जो लगाए थे उन बागों को वो भी एक जमाना था।
खुदकुशी कर रही तहजीब आजकल तुम्हारी चाल से,
देखो, मोक्ष की बुनियाद पे तब कितनों का घराना था।
क्या लेके आए हो,क्या लेके जाओगे,कहा है गीता ने,
हम बुराइयों से कैसे बचें,कृष्ण को यही समझाना था।
आज खण्डहर में वो बदल गई हसीन तराशी देह,
गुजर गया वो दौर उसका सुर्ख होंठ मयखाना था।
इश्क़ के हाथों कितने तबाह हुए, उनका वो जुनून था,
धुआँ बन के वो उड़ गए मिजाज उनका आशिक़ाना था।
जाने वाले तो जा रहे हैं, किसी को कुछ भी पता नहीं,
हर दिल को मिले चैन रूह को सुकूँ,ये मेरे दिल का अंदरूनी खजाना था।
वो खुदा जाने उन आँसुओं पे क्या गुजरी होगी,
बाहुबलियों को किसी की जमीं,किसी का आसमाँ मिटाना था।
आज तुम्हारे पास ताकत है, कल नहीं रहोगे जहां में,
है किसी और की ये दुनिया, मकसद मेरा बताना था।
उन्माद का हाथ खींच लो अभी, ऐ! मेरे अजीज दोस्त,
मत पालो आस्तीनों में सांपों को, बस तुझे जगाना था।
अपने सौंदर्य का अपमान न करो, औरों की खातिर करो दुवा,
अदब, लिहाज से बढ़ो आगे, फरेब से तुम्हें बचाना था।
रामकेश एम. यादव, मुंबई
(रॉयल्टी प्राप्त कवि व लेखक)
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