दहेज प्रथा एक घातक बीमारी | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
दहेज मूल रूप से शादी के दौरान दुल्हन के परिवार द्वारा दूल्हे के परिवार को दिए नकदी, आभूषण, फर्नीचर, संपत्ति और अन्य कीमती वस्तुओं आदि की इस प्रणाली को दहेज प्रणाली कहा जाता है। यह सदियों से भारत में प्रचलित है। दहेज प्रणाली समाज में प्रचलित बुराइयों में से एक है। यह मानव सभ्यता पुरानी है और यह दुनिया भर में कई हिस्सों में फैली हुई है।
दहेज़ एक सामाजिक अपराध हैं जब भी इस कारण किसी लड़की को जान गँवानी पड़ती हैं तो तरस आता हैं उस नौजवान पर कि अपने आपको मर्द कहने वाला असल में कायर हैं उसके कन्धों में इतना बल नहीं कि एक परिवार बना सके .जब दम नहीं तो स्वीकार करों यूँ औरत के जीवन का फैसला करने का कोई हक़ नहीं हैं . बेटी के माता पिता को उसे पढ़ाकर अपने पैरों पर खड़ा करने का काम करना चाहिए ना कि कुछ चंद रुपये देकर उसे किसी के हवाले क्यूंकि आपका यह सोचना कि इस सबके बाद आपकी बेटी खुश हैं या आपके कन्धों पर उसका कोई बोझ नहीं, तो आप गलत हैं . ना बेटी खुश हैं और उसके दुःख का भार, आप पर जिंदगीभर हैं.
अरमानो का मोल लगाना बंद करो
दहेज़ के लिए लड़का बेचना बंद करों ।।
सरेआम नीलामी की मौहर लगती हैं लड़के के माथे पर
और सीना तान इज्ज़त पाने खड़े हैं लड़की के द्वारे पर ।।
दहेज प्रथा हमारे समाज में नारी शक्ति का अपमान करने वाली कुरीतियों में से एक है. आए दिन न जाने कितनी मासूम युवतियों को जलाकर या अन्य तरीकों से मार दिया जाता है. दहेजलोभियों को अपने जिन्दगी की सम्पन्नता की खातिर की नारी को दिन रात सताने के जुर्म का जिम्मेदार हमारा समाज और इस तरह की बुराई रीती का समर्थन करने वाले लोग है, जो आज कन्यादान के रूप में दहेज की पैरवी करते है. यह सच है एक समय था जब यह एक पवित्र दान था, जो बेटी की विदाई पर पिता के द्वारा दिया जाता था. मगर इसी कन्यादान के रूप को दहेजलोभियों ने दहेज का दानव बना दिया है.
दरअसल यह भी देखा जाता है कि आज समाज के कुछ ऐसे लोग भी हैं जो ऐसे कुरीतियों को अपना बड़प्पन समझते हैं कहीं न कहीं इसमें लड़की पक्ष का भी बहुतायत योगदान है जो ऐसे कार्यों को करने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं। लेकिन वही दूसरी तरफ समाज में अधिकांश लोग ऐसे भी हैं जो उनकी करनी का दंड भोगते हैं। मैं आशीष मिश्र उर्वर इसकी कड़ी निन्दा करता हूं।
लेखक: आशीष मिश्र उर्वर
कादीपुर, सुल्तानपुर।


