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    याद न जाए.... प्रसिद्ध कलाकार एम एफ हुसैन और बद्री नाथ आर्या की | #NayaSaberaNetwork



    नया सबेरा नेटवर्क
    एम एफ हुसैन की पेंटिंग्स और नाम पर कल भी लोग फिदा थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे
    बद्रीनाथ आर्य ने अपने वाश चित्रों में अद्भुत प्रयोग किया है
    लखनऊ। आज का दिन बहुत ही ख़ास है क्योंकि आज के दिन दो महान चित्रकारों को याद किया जा रहा है , दोनों कलाकारों ने अपने अपने सृजन प्रक्रिया के नाते प्रसिद्ध हैं । ये दो चित्रकारों में एक मकबूल फिदा हुसैन और दूसरे वाश चित्रकार बद्री नाथ आर्या । आज के दिन मे एक अंतर है की मकबूल फिदा हुसैन का जन्मदिवस है और बद्री नाथ आर्या का पुण्यतिथि। इस अवसर पर भूपेंद्र अस्थाना ने बताया की सप्रेम संस्थान द्वारा इन दोनों कलाकारों को याद किया और बी एन आर्य का डिजिटल और एम एफ हुसैन के पेंसिल स्केच निरंकार रस्तोगी द्वारा, स्केच अश्वनी प्रजापति, जल रंग में फौजदार कुमार और स्केच सिद्धार्थ देव युवा कलाकारों ने इनके व्यक्तिचित्र बनाए और अपनी संवेदना एवं श्रद्धांजलि अर्पित की । 
    श्री अस्थाना ने कहा की चर्चित कलाकार मक़बूल फिदा हुसैन (17 सितंबर 1915 - 9 जून 2011) को भले ही इस दुनिया से विदा हुए आज 11 वर्ष हो रहे हैं। लेकिन  कभी भी ऐसा महसूस नही होता कि हुसैन हमारे बीच नहीं हैं। उनका कलात्मक प्रभाव, उनका व्यक्तित्व उनके चित्र आज भी उनके होने का एहसास कराती हैं। वैसे भी कलाकार कभी मरते नहीं वे हमेशा अपने कला के माध्यम से जीवित रहते हैं। हुसैन कला के क्षेत्र में मेंरे आदर्श रहे हैं। मैं अखबारों में उनसे जुड़ी छपे चित्र, खबर खूब इकट्ठा किया करता था। आज भी मेरे पास है। मिलने की बड़ी ख़्वाहिश थी जो पूरी नहीं हो सकी। लेकिन उनके कला से बराबर मिलना और बात करना आज भी होता है। हुसैन के चित्रों की एक अलग पहचान है। लोग इनपर हमेशा फिदा रहेंगे। 
    एम.एफ. हुसैन का जन्म 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ था और 1940 के दशक में वह एक प्रसिद्ध कलाकार बन गए। 1947 में वह फ्रांसिस न्यूटन सूजा द्वारा स्थापित किए गए ‘द प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’, में शामिल हो गए। इस समूह में युवा कलाकारों को शामिल किया गया था, जो बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी परंपराओं को तोड़ना चाहते थे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीयों को प्रोत्साहित करना चाहते थे। एम.एफ. हुसैन निश्चित रूप से दुनिया के सबसे प्रशंसित चित्रकारों में से एक रहे हैं और कला और पेंटिंग के क्षेत्र में दुनिया के नक्शे पर भारत को एक अलग पहचान दिलाने में कामयाब रहे। हुसैन को  'पद्मश्री' (1955), 'पद्मभूषण' (1973), 'पद्म विभूषण' (1991) से भी सम्मानित किया गया था।
    हुसैन की पहली एकल प्रदर्शनी ज्यूरिख में प्रदर्शित हुई और अगले कुछ वर्षों में उनकी चित्रकारी यूरोप और अमेरिका में बहुत लोकप्रिय हो गई। भारत सरकार ने हुसैन को 1955 में प्रतिष्ठित पदम श्री से सम्मानित किया और फोर्ब्स पत्रिका ने एम.एफ. हुसैन को “भारत का पिकासो” कहा है। चित्रकार होने के अलावा, हुसैन एक फिल्म निर्माता भी थे उन्होंने “मीनाक्षीः अ टेल ऑफ थ्री सिटीज” और थ्रू द आइस ऑफ ए पेंटर” जैसी कई प्रसंशित फिल्मों को भी बानाया है, इन फिल्मों ने इनको बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर अवार्ड का विजेता बना दिया। महंगी और समाज में संभ्रांत (एलीट) होने के बाद भी हुसैन की पेटिंग्स, स्केच्स (रेखाचित्र) और कला के लिए किये गये कार्य की काफी मांग रही।
    हुसैन को उनके समय के प्रगतिशील कलाकारों से जो चीज अलग साबित करती है वह है गहरी जड़ें जमाए 'भारतीयपन' और भारतीय जीवन तथा जनमानस का जश्न।उनके समवर्ती दूसरे चित्रकार जब अपने काम में बाइजेंटियम से लेकर और आगे के लोगों की यूरोपीय कला को समाहित करने में लगे थे, तो उस वक्त हुसैन मंदिरों के वास्तुशिल्प (मथुरा और खजुराहो), पहाड़ी लघुचित्रशैली और भारतीय लोककला से प्रेरणा ले रहे थे। विशेष योगदान उन्होंने रामायण, गीता, महाभारत आदि ग्रंथों में उल्लिखित सूक्ष्म पहलुओं को अपने चित्रों के माध्यम से जीवंत बनाया है। भारत के सबसे प्रसिद्ध आधुनिक चित्रकार एम.एफ. हुसैन का गुरुवार, 9 जून 2011 को लंदन में निधन हो गया। वह 95 वर्ष के थे। 
    इसी कड़ी में प्रदेश के रहे और देश विदेशों में प्रसिद्ध वाश चित्रकार बद्री नाथ आर्य (1936 - 2013 ) को भी उनकी 9वीं पुण्यतिथि पर चित्र बना कर याद किया गया। वाश तकनीकी भले ही जापान से होते हुए कोलकाता के बाद लखनऊ पहुँची और भारतीय चित्रों के रेखांकन अजंता से लेकर तमाम कलाकारों ने वाश विधा में काम किया लेकिन बद्रीनाथ आर्य ने अपने चित्रों में एक अद्भुत प्रयोग किया और अपने इसी प्रयोग के कारण आज दुनिया भर में जाने जा रहे हैं। महानतम वाश चित्रकार 'बद्री नाथ आर्य' का निधन 17 सितंबर 2013 को हो गया था। आज उनकी 9वीं पुण्यतिथि है। श्री आर्या का 1936 में पेशावर में उनका जन्म हुआ था। 1951 में उन्होंने कला एवं शिल्प महाविद्यालय लखनऊ में कला शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रवेश लिया और अध्ययनोपरांत वहीं शिक्षक हुए। बद्री नाथ आर्य 1994 - 1996 तक कला एवं शिल्प महाविद्यालय लखनऊ के प्राचार्य रहे और सेवामुक्त होकर फैजाबाद रोड स्थित अपने आवास रविन्द्रपल्ली, लखनऊ में सतत रचनारत रहे। उन्हें ललित कला अकादेमी फेलोशिप (कला रत्न) और राष्टीय पुरस्कार सहित देश - विदेश के अनेक कला संस्थानों और कला अकादमियों से पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुआ था। उनके शिष्यों की लम्बी सूची है जो लखनऊ वाश की सुगंध पूरी दुनिया में फैला रहे है। इनके चित्रों का संग्रह भी देश विदेशों के संस्थानों और अनेकों कला प्रेमियों के पास सुरक्षित है।

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