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    सावन स्पेशल : मिलिए महादेव के भक्त जौनपुर शहर के मोहल्ला नखास निवासी 'विकास घुमक्कड़ी' से, अब तक कर चुके हैं 16-17 प्रदेशों की यात्राएं | #NayaSaberaNetwork

    • कम बजट में यात्रा करना कोई इनसे सीखें
    • यात्रा के दौरान कई चीजों की मिलती है जानकारी : विकास
    • कहीं पर जाने के लिए आप घुमक्कड़ी बनिए, पर्यटक नहीं
    • मध्यम परिवार से हैं विकास का नाता
    • ज्यादातर धार्मिक यात्राएं करते हैं विकास
    अंकित जायसवाल
    जौनपुर। 'सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ, ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ...' जी हां! यह पंक्तियां जौनपुर शहर के मोहल्ला नखास निवासी विकास घुमक्कड़ी उर्फ विकास निषाद पर बिल्कुल सटीक बैठती है. 12 वर्ष की आयु में पहली बार बनारस जाने वाले विकास को शायद यह बात बिल्कुल पता नहीं था कि वह 29 वर्ष की आयु में आते-आते देश के लगभग 16-17 प्रदेशों में घूम लेंगे. यही वजह है कि उन्हें अब देश के किसी कोने में आने-जाने में डर नहीं लगता. इसके लिए वह आजमगढ़ के मूल निवासी महापंडित राहुल सांकृत्यायन को अपना प्रेरणास्रोत बताते हैं. जिन्होंने यात्रा वृतांत/यात्रा साहित्य तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में अहम साहित्यिक योगदान दिया है. वह हिंदी यात्रासाहित्य के पितामह कहे जाते हैं. विकास अक्सर 'अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा' की चर्चा करते रहते हैं.


    घुमक्कड़ी बनने में फायदा ही फायदा
    विकास बताते हैं कि आज भागती दौड़ती इस जिंदगी में किसी के पास टाइम नहीं है लेकिन जिंदगी तो एक बार ही मिलती है उसमें भी अगर अपने लिए समय न निकाल पाओ तो बेकार ही है. मैं जब भी कहीं घूमने के लिए निकलता हूं तो मैं घुमक्कड़ी बन जाता हूं पर्यटक नहीं. जब इसके पीछे उनसे कारण पूछा गया तो कहते हैं कि घुमक्कड़ी बनने में फायदा ही फायदा है जबकि अगर आप पर्यटक बनेंगे तो आपको सारी सुख सुविधाएं चाहिए. अच्छा होटल चाहिए, अच्छा खाना चाहिए लेकिन हम कहते हैं कि अगर कहीं घूमने के उद्देश्य से जा रहे हैं तो आप घुमक्कड़ी बन जाइए और भारत के किसी कोने में जा रहे हैं तो एक बार उसका अध्ययन अवश्य कर लें. फिर इसके बाद ट्रेन से यात्रा करें.


    स्लीपर क्लास में यात्रा का अलग आनंद
    उनकी यात्रा के बारे में जब उनसे पूछा गया तो वह कहते हैं कि मैं तो ट्रेन की स्लीपर क्लास में यात्रा करता हूं इसके पीछे कारण यह है कि हम यात्रा का तो आनंद लेते हैं इसके साथ ही यात्रियों से भी कई चीजों की जानकारी मिलती है. कहां पर कौन-कौन सी चीजें अच्छी हैं कहां पर कैसी व्यवस्था है, कहां पर अच्छा खाना मिलता है. इसके बाद गंतव्य को पहुंचने पर हम उस जगह पर रुकने की बजाय किसी फेमस मंदिर या ऐतिहासिक इमारत से लगभग एक से दो किमी की दूरी पर ठहरते हैं क्योंकि वहीं पर ठहरने से सबकुछ महंगा रहता है और खाने-पीने की चीजें भी महंगी रहती हैं, ऐसे में हम थोड़ा दूर रुकते हैं तो चीजें सस्ती और अच्छी रहती हैं. कहने का मतलब यह है कि घूमने के लिए पैसा नहीं समय लगता है और अगर आपके पास समय ही नहीं है तो आप जीवन का आनंद नहीं ले पा रहे हैं. 


    14 साल की उम्र में अकेले चले गए थे बाबा बैजनाथ धाम
    विकास मध्यम परिवार से हैं उनसे पूछा गया कि क्या आपको आपके माता-पिता ने कभी घूमने से रोका तो विकास तपाक से कहते हैं कि वो बहुत ही अच्छे मां-बाप हैं जिन्होंने कभी रोक-टोक नहीं लगाई. आज मैं देश के लगभग 16-17 प्रदेशों में घूम चुका हूं. 14 साल के उम्र में पहली बार बाबा बैजनाथ धाम झारखण्ड गया. अब तक असम, बंगाल, सिक्किम, बिहार, झारखण्ड, उत्तर बंगाल, अमृतसर पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, कोलकाता, दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा समेत उत्तर भारत के सभी दर्शनीय स्थल पर हम जा चुके हैं. इनमें से मुंबई, झारखंड, बिहार, कोलकाता तो कई बार जा चुके हैं. 



    स्थानीय भाषा, संस्कृति सीखने की करता हूं कोशिश
    विकास ने बताया कि स्थानीय लोगों से मिलकर वहां का भोजन, भाषा, संस्कृति के बारे में समझने की कोशिश करता हूं. अधिकतर मैं धार्मिक यात्राएं करता हूं. इन यात्राओं में बहुत कुछ सीखने को मिलता हैं. आज मुझे देश के किसी भी कोने में छोड़ दिया जाए तो मुझे डर नहीं लगेगा और वहां घूम-घूमकर वहां की जानकारी एकत्र कर लेता हूं. उसकी अलग ही अनुभूति होती है. थोड़ा बहुत बातचीत करने की कला है. किसी से बात करने में मुझे हिचक नहीं होती है. 


    किसी से बात करने में नहीं रहती झिझक
    कश्मीर की यात्रा के दौरान उन्होंने बताया कि वहां के स्थानीय लोगों खासकर मुस्लिम लोगों से मैं बेझिझक बातचीत करता हूं. इसके साथ ही सेब के बागान के बारे में भी जानकारी लिया कि कहां के सेब अच्छे होते हैं और कहां के सेब थोड़ा कम अच्छे होते हैं. कहीं पर जाने पर मेरी कुछ न कुछ जाने की उत्सकुतता बनी रहती है. यही वजह है कि हम कहीं पर घूमने के लिए हमेशा लालायित होते हैं. उन्होंने एक खास बात शेयर करते हुए कहा कि परिवार को लेकर अगर कहीं कोई घूमने जा रहा है तो उसे थोड़ा दिक्कत होती है क्योंकि अकेले और दोस्तों के साथ घूमने का मजा ही कुछ अलग है और होटल ढूढ़ने में दो तीन जगह पूछना चाहिए और खासकर उस जगह पर जहां आप किसी मंदिर या ऐतिहासिक इमारत के पास है उससे दूर ही होटल लीजिए इससे आपको होटल सस्ता मिलेगा. 














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