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    विश्व शरणार्थी दिवस 20 जून 2022 पर विशेष| #NayaSaberaNetwork

    नया सबेरा नेटवर्क
    • प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं युद्ध आतंक उत्पीड़न से विस्थापित व्यक्ति शरणार्थी हैं
    • शरणार्थियों के उत्पीड़न भय हिंसा के खतरे की मूल भावना को समझ कर सहानुभूति पूर्वक आश्रय देना माननीय धर्म हैं - एड किशन भावनानी
    गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत की अनेकों प्रतिष्ठित प्राकृतिक और गॉड गिफ्टेड विशेषताएं रही है जिसके कारण दुनिया भर के देशों की नजरें भारत पर आश्चर्यचकित रूप से लगी रहती है कि कब कैसी बड़ी उपलब्धि को प्राप्त कर ले!! अनेक विशेषताओं में से एक,भारत आरंभ से ही शांति व अहिंसा का पुजारी रहा है। दया, करुणा, मैत्री और वात्सल्य का भाव यहां के लोगों की रग-रग में बसा हुआ है। यही वजह है कि भारत ने सदैव दूसरें देशों से आए शरणार्थियों को गले लगाया है और महानता का परिचय दिया है। शरणार्थियों को रोटी, कपडा, मकान, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। 
    साथियों बात अगर हम शरणार्थी की करें तो, एक शरणार्थी वह व्यक्ति होता है जो संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अपनी जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह की सदस्यता, या राजनीतिक राय के कारण उत्पीड़न के एक अच्छी तरह से स्थापित भय के कारण अपने घर और देश से भाग गया हो। 1951 शरणार्थी सम्मेलन। प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं के प्रभाव से बचने के लिए कई शरणार्थी निर्वासन में रहता है।साथियों बात अगर हम शरणार्थी दिवस मनाने की करेंतो दुनिया भर में एक बड़ी संख्या में शरणार्थी रहते हैं। इनके साथ आए दिन प्रताड़ना, संघर्ष और हिंसा जैसी कई चुनौतियों के कारण इनको अपना देश छोड़कर बाहर भागने को मजबूर होना पड़ता है। जिसके बाद इन सभी को कईं देशों में पनाह मिल जाती है। वहीं, कई देशों से इनको निकाल भी दिया जाता है। बेशक इन्हें पनाह मिल जाए, लेकिन वो सम्मान और अधिकार नहीं मिल पाते। 
    साथियों हर साल वर्ल्ड रिफ्यूजी डे मनाने का मुख्य उद्देश्य शरणार्थी के साहस, शक्ति और संकल्प के प्रति सम्मान व्यक्त करना है। इसके साथ ही इस दिन को मनाये जाने का एक अन्य उद्देश्य शरणार्थियों की बुरी दुर्दशा की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना और उनकी समस्याओं का हल करना है। बताते चले कि म्यांमार, लीबिया, सीरिया, अफगानिस्तान, मलेशिया, यूनान और अधिकांश अफ़्रीकी देशों के लाखों नागरिक हर साल दूसरे देशों में शरणार्थी के रूप में शरण लेते हैं। जिसमें संयुक्त राष्ट्र की संस्था युएनएचसीआर रिफ्यूजी लोगों की सहायता करती है। 
    साथियों बात अगर हम संयुक्त राष्ट्र 1951 शरणार्थी सम्मेलन और इसके प्रोटोकाल की करें तो हालांकि भारत ने इसपर साक्षर नहीं किए हैं परंतु इसके अनुसार शरणार्थी सम्मेलन और इसका 1967 प्रोटोकॉल अत्यंत महत्वपूर्ण है शरणार्थी दुनिया के सबसे कमजोर लोगों में से हैं। यह सम्मेलन और प्रोटोकॉल उनकी सुरक्षा में मदद करता है। वे एकमात्र वैश्विक कानूनी साधन हैं जो स्पष्ट रूप से एक शरणार्थी के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं को कवर करते हैं। उनके प्रावधानों के अनुसार, शरणार्थी, कम से कम, किसी दिए गए देश में अन्य विदेशी नागरिकों के साथ व्यवहार के समान मानकों के पात्र हैं और, कई मामलों में, नागरिकों के समान व्यवहार। 1951 के कन्वेंशन में कई अधिकार शामिल हैं और यह अपने मेजबान देश के प्रति शरणार्थियों के दायित्वों पर भी प्रकाश डालता है। 1951 के कन्वेंशन की आधारशिला गैर-रिफाउलमेंट का सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, एक शरणार्थी को उस देश में नहीं लौटाया जाना चाहिए जहां उसे अपने जीवन या स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। शरणार्थियों द्वारा इस सुरक्षा का दावा नहीं किया जा सकता है, जिन्हें देश की सुरक्षा के लिए उचित रूप से खतरा माना जाता है, या विशेष रूप से गंभीर अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है, उन्हें समुदाय के लिए खतरा माना जाता है। 
    साथियों बात अगर हम वर्तमान में रूस यूक्रेन युद्ध में शरणार्थियों की करें तो, रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध ने दुनिया में नया शरणार्थी संकट पैदा कर दिया है। अभी हम सीरिया, अफगानिस्तान और अफ्रीकी देशों के शरणार्थी संकट से निकले भी नहीं हैं कि एक नए शरणार्थी संकट ने पूरी दुनिया को चिंता में ला दिया है, जो लोग यूक्रेन से भाग रहे हैं, उन्हें पनाह कौन देगा? कितने दिनों तक देगा? उनके रहने और खाने-पीने का खर्च कौन उठाएगा? और सबसे बड़ी बात, उन्हें वापस अपने देश कब और कैसे भेजेंगे? जाहिर है इस वक्त इनका जवाब देना किसी के भी बस की बात नहीं है? 
    साथियों बात अगर हम वर्तमान रूस यूक्रेन युद्ध में भारत पर शरणार्थी लेने की सिफारिश की करें तो, मान लीजिए अगर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने भारत से भी शरणार्थियों को शरण देने की गुजारिश की तो क्या भारत उन्हें शरण देने की स्थिति में है? ध्यान रहे कि हमारे यहां बांग्लादेश, म्यांनमार, पाकिस्तान, चीन समेत कई पड़ोसी देशोंसे आए शरणार्थियों का मुद्दा पहले ही काफी संवेदनशील है। दरअसल शरणार्थी भारत ही नहीं किसी भी देश के लिये एक समस्या बन जाते हैं क्योंकि इससे देश के संसाधनों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है, साथ ही लंबी अवधि में जनसांख्यिकीय परिवर्तन  में बढ़ोतरी कर सकता है. इसके अतिरिक्त सुरक्षा जोखिम भी पैदा हो सकता है। वैसे भारत में ज्यादातर बहस शरणार्थियों के बजाय अवैध प्रवासियों को लेकर होती है. दिसचस्प है कि हमारे यहां सार्वजनिक विमर्श के दौरान दोनों में खास फर्क नहीं किया जाता। 
    साथियों बात अगर हम भारत की शरणार्थी संबंधी नीति की करें तो भारत में शरणार्थियों की समस्या के समाधान के लिए विशेष कानूनों का अभावहै जिसके कारण शरणार्थियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 में केवल हिंदू, इसाई, जैन, पारसी, सिख, बांग्लादेशी, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान से बौद्ध प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करता है परंतु एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय को बाहर रखा गया है। विदेशी अधिनियम 1946 शरणार्थियों से संबंधित एकीकृत समस्या के समाधान करने में विफल रहा है। भारत 1951 के शरणार्थी सम्मेलन और शरणार्थी प्रोटोकॉल 1967 का पक्षधर नहीं है। भारत के संविधान में मनुष्य के जीवन स्वतंत्रता और गरिमा का प्रावधान है। 
    अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि शरणार्थी- विश्व शरणार्थी दिवस 20 जून 2022 पर विशेष है। प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं युद्ध, आतंक, उत्पीड़न से विस्थापित व्यक्ति शरणार्थी है। शरणार्थियों के उत्पीड़न भय हिंसा के खतरे की मूल भावना को समझ कर सहानुभूति पूर्वक आश्रय देना माननीय धर्म है।

    -संकलनकर्ता लेखक - कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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