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    भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला करता वंशवाद | #NayaSaberaNetwork

    नया सबेरा नेटवर्क
    डॉ. रवि रमेशचंद्र
    (असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति शास्त्र, मुंबई)
    व्यक्ति पूजा भारतीय जनमानस को लगा हुआ कीड़ा है। जो यहां को लोकतांत्रिक व्यस्था को लगातार वंशवाद के नाम पर खोखला करता जा रहा है। श्रीलंका की घटना ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में वंशवादी राजनीति के दुष्परिणामों की तरफ सारी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया है।
    अब्राहम लिंकन ने कहा था, लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए सरकार है। लेकिन वंशवाद की राजनीति ने लोकतंत्र को जनता से दूर, जनता के वोट खरीद कर और जनता की आवाज दबाकर चलने वाली सरकार में बदल दिया है। इससे लोकतंत्र के व्यवहारिक पक्ष में गुणात्मक बदलाव आए हैं। जो बुरे हैं। वंशवाद की राजनीति सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। यह एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, संयुक्त राज्य अमेरिका समेत संपूर्ण लोकतांत्रिक विश्व में व्याप्त है। जहां अमेरिका और यूरोप में वंशवाद काबिलियत से समझौता नहीं करता, वहीं एशिया में यह काबिलियत को दरकिनार करता हुआ दिखता है। भारत के पड़ोसी देशों में भी वंशवाद गहराई से व्याप्त है। 
    12 जनवरी 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "राजनीतिक वंशवाद लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु, सिर्फ सरनेम के सहारे चुनाव जीतने वालों के दिन लदे। प्रधानमंत्री ने कहा कि राजनीति में ‘‘वंशवाद का रोग’’ अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और अब भी ऐसे लोग हैं जिनका लक्ष्य अपने परिवार की राजनीति और राजनीति में अपने परिवार को बचाना है।" उनके संबोधन ने भारत की राजनीति में एक जोरदार बहस को जन्म दिया। क्योंकि भारतीय लोकतंत्र और उसके मूल्य आंशिक रूप से मध्य युगीन सामंतवाद पर, तो बाकी का यूरोपियन संविधानवाद के मॉडल पर आधारित है। इसमें प्राचीन भारत के गणराज्यों वाले नैतिक मूल्य बहुत अल्प मात्रा में हैं। इसलिए वंशवाद हर एक वाद पर हावी है। इसकी प्रमुख वजह है राजनीति में नैतिकता की जगह पॉवर और धन संग्रह मुख्य लक्ष्य बन गया है। इसलिए वंशवादी राजनीति भी शहरी नक्सलवाद, बौद्धिक आतंकवाद और भ्रष्टाचार की तरह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है। लोकतांत्रिक सामंतवाद और वंशवाद का बीजारोपण:
    लोकतंत्र के मकबरे पर वंशवाद का राजनीतिक महल खड़ा हो गया है।  यह मध्य युगीन सामंतवादी व्यवस्था का एक संशोधित संस्करण भर रह गया है। पूर्व शासक वर्ग अभी तक उस राजतंत्र की खुमारी से उबर नहीं सका है। अभी भी तमाम निर्वाचित सांसद, विधायक और राजकीय व्यक्ति बड़ी शान से अपने नाम के साथ राजा, महाराजा, छत्रपति, राजकुमार, राजकुमारी इत्यादि अलोकतांत्रिक शब्द प्रयोग करते हैं । ये संविधान के अनुच्छेद 18 (उपाधियों का अंत) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का स्पष्ट अपमान है। 
    आजादी की लड़ाई में भी एक ही परिवार के कई सदस्य हिस्सा लिए, कष्ट सहे, कुर्बानी दी। चाहे वे मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू हों, वीर सावरकर और उनके भाई, सरदार पटेल और उनके भाई, भगवती भाई और दुर्गाभाभी, चाफेकर बंधु, सरदार भगत सिंह का परिवार जैसे अनगिनत नाम हैं। किंतु उस वक्त के क्रांतिकारी किसी पद, सत्ता, धन या स्वार्थ से प्रेरित नहीं थे। अपना सर्वस्व आजादी की बलिवेदी पर निछावर कर दिया। उन्होंने और उनके परिवार ने अपार कष्ट सहे। इन्हे सत्ता और पार्टी प्रमुख का पद सिर्फ रक्तसंबंध होने भर से मिल जाता है। वहीं पार्टी में योग्यतम व्यक्ति भी नंबर वन कभी नहीं बन पाता। पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमन्त्री और कांग्रेस अध्यक्ष दोनो पदों पर थे। अपने जीवनकाल में ही उन्होंने 1959 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी का महासचिव बना दिया। ऐसा करने वाले वे भले इकलौते नेता नहीं थे, लेकिन सबसे बड़े नेता जरूर थे। अतः स्वतंत्र भारत में वंशवाद के सबसे बड़े प्रणेता नेहरू ही हुए। लोकतंत्र के सबसे बड़े पैरोकार ने एक ऐसी नेता गढ़ा जिसने आगे चलकर पार्टी तोड़ना, सरकार का मनमाना प्रयोग और इमरजेंसी लगाकर देश में लोकतंत्र की बैंड बजा दिया था।  
    राज्यसभा सांसद विनय सह्रबुद्धे कहते हैं, " जब हम वंशवादी राजनीति की बात करते हैं तो हमें, वंशवादी पार्टियों और पार्टी में वंशवाद के महीन अंतर को समझना चाहिए। जब किसी पार्टी में सबसे बड़ा पद किसी परिवार विशेष के लिए आरक्षित रहे और सरकार आने पर प्रमुख मंत्रालय और पद उस परिवार को मिले उसे हम वंशवादी राजनीतिक दल कहते हैं। दूसरी ओर जब किसी लोकतांत्रिक तरीके से चलने वाली पार्टी में यदि टिकट और पद किसी नेता के संबंधी को दिया जाय उसे वंशवादी राजनीति कहते हैं।" भारत में कुल 2856 राजनीतिक दल चुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत हैं। 
    इनमें से सिर्फ 58 दल ही सक्रिय रूप से राजनीति कर रहे हैं। इसमें से भी सिर्फ 8 दल हैं जो किसी परिवार की निजी संपत्ती जैसे नहीं हैं. भाजपा, जनता दल युनाटेड, AIADMK, असोम गण परिषद, CPI, CPM का नाम लिया जा सकता हैं।  1970 के बाद सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले कांग्रेस के अंदर और बाहर समता के बड़े बड़े पैरोकार नेता हुए। उन्होंने अपनी पार्टियां बनाई। ताउम्र उस पार्टी के मुखिया रहे। अपने बाद अपने बेटे, बेटी या किसी रक्तसंबंधी को बिठाते गए। इसलिए हमें वंशवादी पार्टियों और पार्टी के भीतर वंशवाद के अंतर को भी समझ लेना चाहिए। जन प्रतिनिधी एक्ट 1951 की खानापूर्ति करते हुए 3 साल में या 5 साल में अध्यक्ष और कार्यकारिणी का चुनाव भी होता है। 
    लेकिन कांग्रेस में सोनिया गांधी 1998 से अध्यक्ष हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस की 1999 में स्थापना हुई, तब से शरद पवार राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। DMK में करुणानिधि, अकाली दल में प्रकाश सिंह बादल, शिव सेना के बाल ठाकरे 50 सालों से अधिक अपनी पार्टी के अध्यक्ष रहे। उनके बाद अब उनके बेटे और पोते पार्टी चला रहे हैं। इसी प्रकार 90 प्रतिशत पार्टियां हैं। यह लोकतंत्र का सामन्तिकरण है। इससे भारत के चुनावी लोकतंत्र समेत, भविष्य में सामाजिक न्याय को भी गंभीर खतरा है। इसके लिए जहां एक ओर नेताओं की स्वार्थी और संकुचित सोच है तो दूसरी ओर भारत में राजनीतिक संस्कृति भी वंशवाद की राजनीति के लिए अनुकूल है। यहां समाजीकरण और राजनीतीकरण की संस्थाएं ज्यादातर जाति, धर्म, भाषा या प्रांत हितों को प्रतिनिधत्व देने वाले समूह हैं।
    राजनीतिक समाजिकरण या समाज का राजनीतीकरण लोकतंत्र के लिए प्राणवायु है। इसकी कोई औपचारिक या अनौपचारिक व्यस्था नहीं होने से समाज में लोग राजनीति के प्रति उदासीन होकर उसे हीन भावना से देखते हैं। भारत में रामभाऊ महालगी प्रबोधिनी को छोड़कर और कोई संस्था नहीं तो इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण पाठ्यक्रम शुरू किए हैं।  गैब्रियल आलमंड और सिडनी वर्बा ने राजनीतिक संस्कृति का 1956 से विस्तृत अध्ययन किया। इसके बाद तीन प्रमुख और तीन उपराजनीतिक संस्कृतियों को पहचाना गया। जिसे परंपरावादी, विषयगत और सहभागिता वाली राजनीतिक संस्कृतियां हैं। 
    भारत में उपरोक्त तीनों में से कोई भी राजनीतिक संस्कृति न तो पूरी तरह खारिज होती है। न ही पूरी तरह से लागू होती है। बल्कि यहां एक मिश्रित राजनीतिक संस्कृति है। जिसमें पारंपरिक रूढ़ियां, शिक्षित मतदाता, वंशवाद, चमत्कारी नेतृत्व, आम आदमी को भी शीर्ष तक जाने के अवसर सब मिलते हैं। इसीलिए यहां की राजनीतिक संस्कृति किसी एक रास्ते नहीं चल पाती। जनता बस राजनीतिक सम्मोहन में बंधी है। 
    वंशवाद का परिणाम:
    वंशवाद की राजनीति कई लोकतंत्र के विकास में कई बढ़ाएं खड़ी करती है। इसकी वजह से राजनीतिक दलों का घरानेशाही में परिवर्तन हो जाता है। कोई परिवार विशेष पार्टी के हर पद और निर्णय प्रक्रिया को डोमिनेट कर लेता है। इससे चुनावों में धनबल और बाहुबल की भूमिका मुख्य हो जाने से आम नागरिक चुनाव जीतने से वंचित हो जाते हैं। सबसे बड़ा दुष्प्रभाव राजनीतिक संस्कृति, नैतिकता और आदर्शों पर पड़ता है। विचारधारा की राजनीति को भूल कर अवसरवादी राजनीति प्रभावी हो जाती है। वंशवाद के कारण पार्टियों में लोग मुद्दों और जनता से ज्यादा नेता के नजदीक होने का प्रयास करते हैं। जो स्वस्थ लोकतंत्र और प्रशासन के लिए बहुत बड़ा धोखा है। 
    निष्कर्ष
    आप किसी भी व्यक्ति को राजनीति में भागीदारी से वंचित सिर्फ इसलिए नहीं कर सकते की वह किसी नेता की संतान या रिश्तेदार है। राजनीति में भागीदारी, चुनाव लडना, सरकारी पद ग्रहण करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है ।मानवाधिकारों की सार्वजनिक घोषणा (UDHR) भी इसकी पुष्टि करती है। इसलिए वंशवाद को रोकने के बजाय इसका दुरुपयोग रोका जाय। हाल में कांग्रेस पार्टी द्वारा इस बाबत की गई घोषणा महत्वपूर्ण है। एक परिवार में एक पद और एक टिकट की नीति लागू हो। चुनावी राजनीति में आने से पहले जनता के बीच काम से काम 5 साल मेहनत करें। सबसे ज्यादा जनता में जागरूकता, राजनीतिक सक्रियता और राजनीतिक नैतिकता का स्तर बहुत बड़ा और मजबूत करें। शायद लोकतांत्रिक राजनीति को वंश के दंश न झेलने पड़े।

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