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    सार्वजनिक जीवन, बयानबाजी में गिरते मानकों पर चिंता! | #NayaSaberaNetwork

    सार्वजनिक जीवन, बयानबाजी में गिरते मानकों पर चिंता!   | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    सार्वजनिक जीवन, राजनीति, बयानबाजी में उच्च मानकों, मूल्यों, नैतिकता और शिष्टाचार को बनाए रखने की विशेष ज़रूरत 
    जनता की सेवा और भलाई में समर्पित मनीषियों को अपनी वाणी, व्यवहार और जीवनशैली में मधुरता की मिठास भरने को रेखांकित करना ज़रूरी - एडि किशन भावनानी
    गोंदिया - भारत संस्कृति, सभ्यता, शिष्टता, शिष्टाचार, नैतिक गुणों के मामले में आदि अनादि काल से ही विश्व में ऐसा देश है जहां यह सभी गुण कूट-कूट कर भरे हैं इन्हीं गुणों के बल पर ही मनुष्य वंदनीय बनता है। मानव का सभ्य आचरण ही शिष्टाचार कहलाता है। 
    साथियों बात अगर हम सार्वजनिक जीवन में बयानबाजी के गिरते मानकों की करें तो वर्तमान में चिंतन का विषय है। बढ़ती मानवीय बयानबाजी और शिष्टता के गिरते मानकों का क्रम पिछले कुछ अर्से से सामनेआ रहा है जो हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया, टीवी चैनलों के माध्यम से आए दिनों देखते सुनते रहते हैं कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले कुछ व्यक्तियों, कुछ राजनीतिक व्यक्तियों, पदाधिकारियों की बयानबाजी जिस तरह पिछले अरसे और वर्तमान में आ रही है खेदजनक व चिंतनीय है। यहां तक कि महिलाओं पर भी एक पूर्व स्पीकर द्वारा दिए बयान पर बवाल खड़ा हो गया था।
    साथियों बात अगर हम राजनीतिक बयान बाजी में उच्च मानकों, मूल्यों को बनाए रखने की करें तो हमें इस बात को रेखांकित करना है कि, हम इस क्षेत्र में जनता की सेवा और भलाई के लिए समर्पित मनीषियों को अपनी वाणी, व्यवहार और जीवनशैली में मधुरता की मिठास भरना है ताकि अपने साथीयों तो क्या विरोधियों को भी तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए। अपने बयानों के शब्दों को बाणों के रूप में नहीं बल्कि कन्वेंस, शालीनता से या समझाने के रूप में प्रयोग करके विरोधियों के मन को भी जीतने का भाव समाहित होना चाहिए। 
    साथियों बात अगर हम सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की करें तो, सारी दुनियामें नैतिकता की वजह से ही धन-दौलत, सुख और वैभव की नींव खड़ी होती है। नैतिकता ही सम्पूर्ण मानवता का श्रृंगार है। पुराणों का प्रसंग बताता है कि इन्द्र ने ब्राह्मण का रूप धारण करके प्रहलाद के पास जाकर पूछा कि आप को तीन लोकों का राज्य कैसे मिला? प्रहलाद ने इसका कारण नैतिकता को बतलाया। इन्द्र ने प्रहलाद से वरदान में नैतिकता को मांग लिया। शील के जाते ही धर्म, सत्य, सदाचार, बल, लक्ष्मी सभी चले गए। 
    साथियों बात अगर हम शिष्टाचार की करें तो हमने कई किताबों में पड़े हैं कि, अशिष्ट व्यक्ति पशु तुल्य होता है, जिसे दूसरों की मान प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान का कोई ध्यान नहीं होता। अशिष्ट व्यक्ति इस योग्य नहीं होता कि उसे सभ्य समाज में स्थान दिया जा सके। जिस व्यक्ति को दूसरों से बातें करने का शिष्टाचार नहीं आता, उससे कौन बोलना पसंद करेगा? जिसे दूसरों के व्यंग्य और मजाक उड़ाने, त्रुटियां निकालने, उपहास करने में ही आनंद आता है वह महाअज्ञानी है। 
    साथियों बात अगर हम परिपक्वता की करें तो, किसी भी विभाग या संगठन या संस्था या शासन के सर्वोच्च पद पर कोई अपरिपक्व और अदूरदर्शी व्यक्ति नहीं पहुँचना चाहिए क्योंकि सर्वोच्च पद स्वाभाविक रूप से बहुत अधिक अधिकार-सम्पन्न होता है और अविवेकी व्यक्ति के हाथ असीमित अधिकारों का लगना बंदर के हाथ उस्तरा लगने के सादृश्य ही होता है। 
    साथियों बात अगर हम हमारे देश की पहचान प्रतिष्ठा रुतबे की करें तो, हमारे देशकी पहचान सभ्यता और संस्कृति के कारण है। दूसरे देशोंके लोग यहां आकर आत्मिक शांति प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। ऋषि, मुनियों की इस धरती की तरफ सभी श्रद्धापूर्वक देखते हैं। सभी देवताओं की जन्मस्थली भी अपना भारत देश है। विभिन्न रंगों, रिवाजों के बावजूद एकता यहां की पहचान है। वर्तमान में युवा पीढ़ी का आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी विरासत से मोह भंग होने लगा है। गलत या अशिष्ट आचरण करना उनके स्वभाव में शामिल हो गया है। बुजुर्गो का अपमान करने में उन्हें हिचक महसूस नहीं होती है। इसलिए हमें चाहिए कि मानेंगे जीवन सब बच्चों के उच्च मानकों मूल्यों को बनाए रखें। 
    साथियों बात अगर हम माननीय उपराष्ट्रपति द्वारा दिनांक 18 अप्रैल 2022 को एक कार्यक्रम में संबोधन की करें तो पीआईबी के अनुसार उन्होंने भी, सार्वजनिक जीवन में गिरते हुए मानकों पर चिंता जाहिर करते हुए  जनप्रतिनिधियों से अपने राजनीतिक विरोधियों पर व्यक्तिगत हमले करने से बचने का आग्रह किया। उन्होंने महत्वपूर्ण राजनीतिक राष्ट्रीय मामलों पर सभी हितधारकों के साथ आम सहमति बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए युवा और नये राजनेताओं को विभिन्न मुद्दों पर सैद्धांतिक रुख अपनाने की सलाह दी। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की रक्षा करने और उसे मजबूत बनाने के लिए मूल्य-आधारित और नैतिक राजनीति को बढ़ावा देने की जरूरत पर जोर दिया।
    अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि सार्वजनिक जीवन बयानबाजी में गिरते मानकों पर चिंता हैं।सार्वजनिक जीवन राजनीति, बयानबाजी में उच्च मानकों, मूल्यों,नैतिकता और शिष्टाचार को बनाए रखने की ज़रूरत। जनता की सेवा और भलाई में समर्पित मनीषियों को अपनी वाणी, व्यवहार और जीवनशैली में मधुरता की मिठास भरने को रेखांकित करना ज़रूरी हैं। किसी ने खूब ही कहा है कि
    एक बात तुम सुन लो प्यारे,
    शिष्टाचार न आया हमको
    तो कुछ भी न आया है,
    कर लो चाहे जितनी उन्नति,
    फिर भी कुछ न पाया है।
    शिष्ट हो आचार हमारा ऐसा हम विचार करें,
    दे जाये दुनिया को कुछ ऐसा,कि 
    दुनिया हमको युगों-युगो तक याद करें।
    -संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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