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    पिता की विरासत बचाने में फिर कामयाब हुए लकी | #NayaSaberaNetwork

    नया सबेरा नेटवर्क
    यादवों के इस गढ़ में बीजेपी की सभी योजनाएं रह गईं धरी की धरी
    हर बार की तरह इस बार भी धनंजय सिंह ही बने रनर
    जौनपुर। जिले की सबसे हॉट सीट मल्हनी विधानसभा पर सपा ने अपना किला बचाने में न सिर्फ कामयाबी हासिल की बल्कि हार जीत के अंतर को जिले का सबसे बड़ा अंतर बनाने का काम किया। इस सीट पर लकी यादव अपने दम पर पहला चुनाव लड़ने के लिए उतरे थे लेकिन यादव बाहुल इस सीट पर उन्होंने अपने स्व. पिता के जीत के रिकार्ड को भी ध्वस्त करने का काम किया। गौरतलब हो कि 2008 के परिसीमन में रारी की जगह मल्हनी विधानसभा के रूप में एक नई विधानसभा के रूप मंे अस्तित्व में आई थी। जिस पर सपा के स्व. पारसनाथ यादव ने जीत हासिल की थी। तब से यह सीट लगातार सपा के ही खाते में चली आ रही है। पूर्वांचल में स्व.पारसनाथ यादव का एक अलग राजनीतिक रूतबा था। मुलायम सिंह की सरकार से लेकर अखिलेश यादव की सरकार तक वे कई बार मंत्री भी रहे। 2020 में स्व.पारसनाथ यादव का बीमारी के चलते निधन हो गया जिसके बाद उनके वारिस के तौर पर उनके बड़े पुत्र लकी यादव पिता की विरासत संभालने के लिए मैदान में उतरे। हलांकि राजनीति में अनुभवहीन लकी यादव को पिता की सहानुभूति खूब मिली और उपचुनाव में उन्होंने अपने पिता के चिर प्रतिद्वंदी धनंजय सिंह को लगभग पांच हजार वोटों से शिकस्त देने में कामयाबी हासिल की और डेढ़ साल तक उन्होंने विधायक के तौर पर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के साथ ही राजनीतिक दांव पेंच सीखने का भी काम किया और इस बार के विधानसभा चुनाव में सपा के राष्ट्रीय संरक्षक मुलायम सिंह यादव से पिता की दोस्ती काम आई और उन्हीं के निर्देश पर लकी यादव को पुन: मैदान में उतारा गया। यह सीट सपा के लिए कितनी महत्वपूर्ण थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बेटे के बाद पूरे प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अगर किसी सीट पर प्रचार किया तो वो दोस्त के बेटे की मल्हनी सीट थी। इतना ही नहीं लकी की पैत्रिक विरासत बचाने के लिए सपा ने इस सीट को अपनी साख का प्रश्न बना लिया और प्रसपा अध्यक्ष शिवपाल यादव, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव समेत कई सपाई नेताओं ने इस सीट पर ताबड़तोड़ जनसभाएं की। यादव बाहुल यह सीट अस्तित्व में आने के बाद से ही सपा के खाते में है और इस सीट पर अभी तक किसी भी दूसरे दल का खाता नहीं खुल पाया है यह बात दीगर है कि  पूर्व सांसद धनंजय सिंह इस सीट को हासिल करने के लिए जूझते दिखाई पड़ रहे हैं लेकिन अभी तक उन्हें भी कामयाबी नहीं मिली है। जिले की यही एक ऐसी सीट है जिसपर अभी तक न तो कमल खिला और न ही हाथी चला। यहां शुरू से ही साइकिल चली जो आज भी अपनी रफ्तार पकड़े हुए है। बहरहाल इस बार भी इस सीट पर न सिर्फ समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की बल्कि लकी यादव ने यह सीट जीतकर अपने पिता की विरासत को बचाने में कामयाबी हासिल की है।

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