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    संवैधानिक संरक्षण के बावजूद मानसिक प्रताड़ना सहने को मजबूर बुजुर्ग | #NayaSaberaNetwork

    संवैधानिक संरक्षण के बावजूद मानसिक प्रताड़ना सहने को मजबूर बुजुर्ग  | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    लखनऊ। अब इसे क्या कहें ?भारत अपने संस्कार भूलता जा रहा है, बुजुर्ग और वृद्ध माता-पिता का हमेशा सम्मान करने के लिए प्रसिद्ध भारत में बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा हो रही है। उनका परित्याग कर उन्हें वृद्धाश्रम तक पहुंचाया जा रहा है। जबकि वरिष्ठ नागरिकों को जिंदगी के इस पड़ाव में भी संविधान के अनुच्छेद२१ में प्रदत्त गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। आज भले ही भारत को युवाओं का भारत कहा जाता है , परन्तु इस समय देश का प्रत्येक १२ वां व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक है। मोटे अनुमान के अनुसार भारत में वरिष्ठ नागरिकों की आबादी करीब १५ करोड़ है निकट भविष्य में और वृद्धि होगी । ऐसी स्थिति में इस श्रेणी में आने वाले देश के वरिष्ठ नागरिको के लिए बेहतर सुविधाओं की आवश्यकता है।कितनी विसंगति है बुजुर्ग और वृद्ध माता-पिता का हमेशा सम्मान करने के लिए प्रसिद्ध हमारे भारत में ही अब बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा हो रही है। उनका परित्याग कर उन्हें वृद्धाश्रम तक पहुंचाया जा रहा है। कोई ऐसा कस्बा शेष नहीं है, जहाँ वृद्धाश्रम जैसी गतिविधि नहीं चल रही हो , कहीं ये वृद्ध आश्रम ठीक चल रहे हैं तो कहीं इनकी दशा दयनीय है | वरिष्ठ नागरिकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के मामले में देश की न्यायपालिका भी हस्तक्षेप कर चुकी है। उसने इस वर्ग के लोगों के लिए विशेष योजना तैयार करने और पहले से मौजूद वृद्धावस्था नीति का सख्ती से पालन करने के निर्देश भी दे रखे हैं, परन्तु राज्य और केंद्र सरकार की प्राथमिकता सूची में वृद्ध कल्याण निचले पायदान पर है । कहने को भारत में वृद्धावस्था नीति भी बनाई गई है परंतु इस पर पूरी गंभीरता से अमल नहीं हो रहा है। परिणाम ६० साल की उम्र का पड़ाव लांघ चुके अनेक वरिष्ठ नागरिकों को आये-दिन तरह-तरह से अपमानित और उपेक्षित होने का अनुभव होता है।
    होना तो यह चाहिए कि वरिष्ठ नागरिकों की इस श्रेणी में आने वाली आबादी के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और सुगम आवागमन की सुविधाएं होनी चाहिए। लेकिन अचानक कोविड-१९ दुष्काल के दौरान वरिष्ठ नागरिकों के लिए रेल यात्रा में मिलने वाली रियायत वापस लेने के बाद अब सरकार इसे बहाल करने में ना-नुकुर कर रही है। अब बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिकों को अपने पैतृक नगर या तीर्थस्थलों और पर्यटक स्थलों पर जाने के लिए रेल यात्रा पर भारी -भरकम राशि खर्च करनी पड़ रही है । सब जानते हैं मार्च, २०२० से पहले रेल से यात्रा करने के मामले में वरिष्ठ नागरिकों को सभी वर्गों में यात्रा करने पर छूट मिलती थी जो महिलाओं के मामले में ५० प्रतिशत और पुरुषों के लिए ४० प्रतिशत थी। इस सुविधा के लिए महिला की आयु ५८ साल और पुरुष की आयु ६० साल निर्धारित थी। सरकारी चिकित्सा सेवाओं के क्षेत्र में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य से संबंधित चिकित्सीय परामर्श के लिए अक्सर काफी लंबा इंतजार करना पड़ता है।निजी अस्पताल के लिए सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं है | वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष प्रबंध की बात तो छोड़िये, निजी अस्पताल बीमा राशि वसूल करने के फेर तक ही सुविधा देते हैं |आज भारत में सामाजिक मूल्यों में तेजी से आ रहे बदलाव के कारण वरिष्ठ नागरिकों को तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कई परिवारों में भी बुजुर्गों को संतान की प्रताड़ना के किस्से आम हो रहे है। बुजुर्गों द्वारा अपनी मेहनत से अर्जित संपत्ति को आज सुरक्षित रखना उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती होती जा रही है।
    कहने को सरकार ने वृद्ध माता-पिता और परिवार के दूसरे बुजुर्ग सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार, उपेक्षा और उनकी संपत्ति हड़पने के लिए घर में ही उन्हें प्रताड़ित करने और उनका परित्याग करने जैसी घटनाओं में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए 2007 में ‘माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण कानून’ बनाया और बुजुर्गों के हितों की रक्षा के मामले में न्यायपालिका ने भी सख्त रुख अपनाया है।आज भी महानगरों और ऐसे ही प्रमुख शहरों से इतर देश के दूरदराज के इलाकों में बुजुर्गों को इस कानून की ज्यादा जानकारी नहीं है। केंद्र के साथ ही राज्य सरकारों को चाहिए कि बड़े स्तर पर इस कानून के प्रति जागरूकता पैदा करने का अभियान चलाएं ताकि संपत्ति के लालच में संतानें बुजुर्गों की जिंदगी नरक नहीं बनायें। बुजुर्गों की स्थिति में सुधार के लिए कुछ बुजुर्ग मित्रों ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।न्यायालय ने भी स्थिति की गंभीरता और महत्व को देखते हुए दिसंबर, २०१८ में केंद्र को व्यापक निर्देश दिये थे। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद २१ में प्रदत्त जीने के अधिकार की व्याख्या करते हुए इस तथ्य को भी रेखांकित किया था कि बुजुर्गों को गरिमा के साथ जीने का अधिकार, आवास का अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार है और राज्यों का यह कर्तव्य है कि इन मौलिक अधिकारों की सिर्फ रक्षा ही नहीं हो बल्कि इन्हें लागू किया जाये। सभी नागरिकों को ये उपलब्ध भी हों।


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