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    युगधर्म की प्रखर चेतना को जाग्रत करती 'कस्तूरी अंतर बसै' | #NayaSaberaNetwork

    युगधर्म की प्रखर चेतना को जाग्रत करती 'कस्तूरी अंतर बसै'  | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    मुंबई। "कस्तूरी अंतर बसै"डॉ रोशनी किरण का दोहा संग्रह है जिसमें सात सौ से अधिक दोहे हैं। रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी लाल जी की सतसई बरबस याद आ जाती है इस कृति को देखकर।
    कोई भी रचनाकार युगधर्म का वाचक होता है। समाज की परिस्थितियों का वक्ता होता है।अपने सृजन से युग की पीड़ा,आनन्द,सम्वेदना का बोध कराता है।
    वर्तमान काल की सिद्धहस्त एवं चर्चित कवयित्री डॉ रोशनी किरण जितनी अच्छी दोहा की सर्जना करती हैं उतनी ही सुंदर ग़ज़लकारा भी है। जिव्हा पर साक्षात सरस्वती विराजती हैं।
    'कस्तूरी अंतर बसै' के दोहे भाव पक्ष की  दृष्टि से समृद्ध हैं वही कला सौष्ठव के मानकों पर खरे उतरते हैं। पुस्तक के सोलह खण्डों में विभक्त दोहों में कवयित्री का काव्य कौशल देखने को मिलता है।
    दोहे पर दोहे, में जहाँ दोहे की महत्ता का वर्णन है वही दोहा छंद को भी परिभाषित किया है। नवीन रचनाकारों को दोहा छंद का ज्ञान भी कराएंगे।
    अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा स्वाभाविक है कवयित्री ने गणेश पर दोहे सृजित करके आध्यत्मिक चेतना को स्वर दिया है
    गौरी सुत गणपति सुघर,शिव  नयनों के नूर।
    प्रथम पूज्य हर देव से,करें त्रास हर दूर।
    वीणापाणि के चरणों में भेंट चढाते हुए डॉ रोशनी जी ने लिखा है-
    वीणा तेरी जब बजे,मातु शारदा धाम।
    मन ये झंकृत हो उठे,गाऊँ तेरा  नाम।
    कवयित्री गुरुभक्त हैं कई बार इनसे फोन पर भी वार्ता हुई है। इनके वार्तालाप में गुरु का वर्णन आना स्वाभाविक होता है। उन्ही गुरु को यह ग्रन्थ समर्पित भी किया है। गुरु के प्रति आदर भाव इसी से समझा जा सकता है कि इस विषय पर 121दोहे रचें हैं
    एक उदाहरण दृष्टव्य है-
    श्रीफल ऊपर से कड़ा,अंदर रहता नर्म।
    वैसे ही गुरुवर किरण,समझें सबके मर्म।
    महादेव में प्रति भी आदर भाव इनके दोहों में देखने को मिलता है।
    बेल धतूरा खात हैं, पीते हैं शिव भंग।
    नीलकंठ के कंठ से,लिपटे रहत भुजंग।
    आध्यात्मिक चेतना की कवयित्री ने माता रानी के दोहों में अपनी भक्ति का वर्णन किया है
    पूजा आरति सब करें,और जलाएं धूप।
    पूजें शुभ नवरात्रि को,नवदुर्गा का रूप।
    हिन्दू धर्म की विशेषता है कि हम किसी भी देवी देवता को अपना आराध्य मान कर  पूजा अर्चना कर सकते हैं । फिर कृष्ण तो इस जगत में न केवल प्रेम के देवता हैं बल्कि योगेश्वर हैं जिनकी महिमा को अनेक कवियों ने बांधने की कोशिश की है। डॉ रोशनी किरण ने भी अपनी कलम चलाई है ।
    कान्हा तेरी प्रीति का ,ऐसा चढ़ा बुखार।
    दुनिया भी प्यारी लगे,मन में रहा न खार।
    125 दोहे इस बात का प्रमाण हैं कि अपने आराध्य के प्रति कितना समर्पण है।
    जहां प्रेम है वहाँ विरह भी है। संयोग श्रृंगार के  साथ वियोग श्रृंगार भी रसों में उतना ही महत्व रखता है। विरह वियोग के दोहों में ये वर्णन देखने को मिलता है।
    विरहन जले वियोग में, मन में उठती पीर।
    मोम सरीखी उम्र संग,बाती हुआ शरीर।
    पतित पावनी गंगा के मर्म को भी अपनी लेखनी बनाया है 
    गंगा जीवन दायिनी, है यह नदी महान।
    भवसागर तरणी सदा,जाने सकल जहान।
    इसी के साथ सूर्यदेव के दोहे, तीज त्यौहार पर दोहे,बसन्त ऋतु की मादकता के दोहे ,फाग पर दोहे,रचकर कवयित्री ने ग्रन्थ को पठनीय बना दिया है।
    समसामयिक चित्रण में देश भाषा,नेता एवं जवान पर भी आपकी लेखनी निर्बाध रूप से चली है। एक आदर्शवादी एवं सर्वमान्य नेता भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी को समर्पित एक दोहा-
    पूरा भारत ही करे,जिनका नित गुणगान।
    भीष्म पितामह से अटल,भारत रत्न महान।
    भारत कृषि प्रधान देश है यदि किसान का चित्रण न हो तो अपूर्णता सी रहती है। कृषक की विडंबना का एक चित्र -
    पोषण देता देश को,धरती पुत्र  किसान।
    फिर भी क्यों मिलता नहीं,हलधर को सम्मान।
    कस्तूरी अंतर बसै कृति का समापन प्रेरणा स्रोत दोहों से किया है कवयित्री ने । दो सौ अड़तालीस दोहे उनकी प्रखर लेखनी का प्रमाण हैं।
    बनी अहिल्या श्राप से,पति के कटु पाषाण।
    किंतु राम पग धूलि से,मिला श्राप से त्राण।
    मानवीय मूल्यों के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है-
    आँखों मे पानी नहीं,कान हुए बेजान।
    मानव तेरी हो गयी,ये कैसी पहचान।
    समापन के दोहे का मर्म कुछ इस प्रकार से है-
    उषा निशा से कह रही,कैसी अपनी प्रीत।
    मैंने दिनकर को चुना,तुमने चन्दा मीत।
    इस कृति की भाषा शैली सामान्य पाठक  को ध्यान में रखकर ही अपनायी गयी है। इसीलिए कवयित्री अपने उद्देश्य में सफल हुई हैं। जिस प्रकार से विषयगत संयोजन किया है उससे पाठक  तादाम्य स्थापित करते हुए पूरी कृति की यात्रा सहजता से कर जायेगा। कस्तूरी अंतर बसै को आद्योपांत पढ़ने के उपरांत मन की उर्वर धरती पर ज्ञान का बोधिवृक्ष मिल जाता है जिसकी शीतल छांव हमारे अंतर्मन को शांति प्रदान कर इस भवसागर से तरने  का मार्ग प्रशस्त करता है। 
    डॉ रोशनी किरण का यह ग्रन्थ साहित्य में निश्चित ही एक अलग स्थान बनायेगा। उनकी कलम से अन्य कृतियाँ  भी मां सरस्वती का भंडार भरें ऐसी मंगलकामनाएं  हैं।

    कृति-कस्तूरी अंतर बसै
    रचयिता-डॉ रोशनी किरण
    प्रकाशक- अयन प्रकाशन दिल्ली
    पृष्ठ-160
    मूल्य-350

    समीक्षक-डॉ राजीव कुमार पाण्डेय

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