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    गाँवों में कैसे सफ़ल होगी ऑनलाइन शिक्षा? पर हुई चर्चा | #NayaSaberaNetwork

    देवकृष्ण गुप्ता
    डिजिटल डेस्क। आज 'अंतर्राष्ट्रीय छात्र-दिवस' के अवसर पर 'पथगामिनी' साहित्यिक पटल पर 'मंजुला श्रीवास्तवा' (संचालिका एवं संस्थापिका, 'पथगामिनी')  द्वारा एक वेबिनार का आयोजन किया गया। विषय था गाँवों में कैसे सफ़ल होगी ऑनलाइन शिक्षा? जिसमें सम्मानित अतिथिगण डॉ. लवीना सिंह, शिवांक श्रीवास्तव इंदौर से गेस्ट टीचर मनोविज्ञान, उत्कर्ष गुप्ता छात्र एवं समाजसेवी, साक्षी पाण्डेय छात्र एवं स्माइल वेलफेयर फाउंडेशन से एवं अभिषेक दूबे ने अपने क्रांतिकारी विचारों से सभी श्रोताओं का मार्गदर्शन किया‌।
    सर्वप्रथम वेबिनार की शुरुआत अभिवादन के शिष्टाचार से हुई इसके बाद शिवांक श्रीवास्तव ने अपने विचार रखते हुए कहा कि गैजेट्स और दूसरी महंँगी चीजों के साथ ज्वलंत प्रश्न यह है कि निरंतरता के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत आपूर्ति को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा ये एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। आपको डेटा पैक हर महीने रिन्यू कराना है ये एक महत्वपूर्ण प्रश्न है पर इसके साथ ही प्रश्न यह भी है कि सबसे पहले विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित की जाए‌।
    इन्हीं बातों को जारी रखते हुए उत्कर्ष गुप्ता ने सुझाव दिया कि कैसे ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रति संवेदनशील युवा सामूहिक प्रयास से कुछ एक डिजिटल लैब और वाई-फाई जोन खोल सकते हैं और आनलाइन शिक्षा की कठिनाईयों को विद्यार्थियों के लिए कम कर सकते हैं। गाँवों की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति का बारीक आंकलन करके आपने इस बात पर जोर दिया कि गवर्मेंट कैसे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष पैकेज में डिजिटल लैब व कंप्यूटर सेंटर एवं वाई-फाई जोन्स के लिए बजट दे सकती है और इसकी जवाबदेही ग्राम प्रधान को तय करनी पड़ेगी ।
    'स्माइल वेलफेयर फाउंडेशन' की सदस्य 'साक्षी पाण्डेय' ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अपने विचारों के माध्यम से बताया कि कैसे जागरुकता की सख़्त ज़रुरत है, जागरुकता के अभाव में बच्चे और बच्चों के अभिभावक संसाधनों के उपलब्ध रहने के बाद भी उनका अनुचित और गैरजरूरी उपयोग कर सकते हैं। कैसे एनजीओ और दूसरी समाजसेवी संस्थाओं एवं ट्रस्ट के माध्यम से हम जागरुकता फैला सकते हैं, संचालिका मैम ने साक्षी जी की बात को बल देते हुए प्रशिक्षण केंद्र के माध्यम से जागरुकता बढ़ाने की बात रखी।
    इंटरनेशनल डिबेट में भी प्रतिभाग करने वाले अभिषेक दुबे ने चर्चा में प्रतिभाग करते हुए सबका ध्यान आनलाइन एजुकेशन सिस्टम और आनलाइन शिक्षा में‌ लैक आफ बांडिंग विद टीचर्स एण्ड लैक आफ प्रैक्टिकल पर खींचा। आनलाइन एजुकेशन को महामारी के वक्त तक का सैल्यूशन समझा जाना चाहिए ना कि इसे एक विकल्प के तौर पर‌।
    डॉ लवीना सिंह ने आनलाइन शिक्षा के मनोवैज्ञानिक चैलेंजेस एवं प्रभाव और उससे जुड़ी सरकारी योजनाओं पर बहुत ही बारीकी सी प्रकाश‌‌ डाला, अपनी बात में आईटी खड़गपुर से लेकर डिजिटल इंडिया और इसरो व अन्य कारपोरेट्स के द्वारा संचालित सभी इनेशिएटिव‌ पर खुलकर बात की और उनके प्रयासों को हम सब के साथ साझा किया। आज के दौर में आनलाइन शिक्षा एक हकीकत है और हम आनलाइन वीडियोज़‌ की एनीटाइम फ्लैक्सिबिलिटी का किस प्रकार अधिक से अधिक फायदा उठा सकते हैं, इन‌सब विचारों से चर्चा को समृद्ध किया ।
    बीच-बीच में संचालिका एक सेतु की तरह अलग-अलग वक्ताओं के अलग-अलग विचारों को एक दूसरे के साथ अपनी स्नेहमय वाणी से संतुलित करती जा रही थी।
    अंत में उपसंहार के रुप में भीम तिल के sos हरमन माइनर स्कूल के प्रिंसिपल के.डी. ने सब  वक्ताओं को साधुवाद धन्यवाद देते हुए उनकी प्रशंसा की, उन्होंने कहा कि ये सच है कि एक सामूहिक प्रयास और पाज़िटिव माइंडसेट की जरुरत है, उन्होंने युवाओं की भागीदारी की अहिमियत को बताते हुए एक जुमला बोला कि 'परिवर्तन की दूल्हन हम  बुजुर्गों के कंधे पर नहीं आती, वो नौजवानों के कंधे पर ही आती है।' इसलिए परिवर्तन और सकारात्मक सोंच का आगाज़ नौजवानों से ही होगा। "जब आप ले रहे हैं तो उसका कम-से-कम 60% तो समाज और देने वालों को लौटाइए।", इन‌ शब्दों के साथ के.डी. ने शिक्षकों को शिक्षक धर्म याद दिलाते हुए स्वीकार्य और सकारात्मक बने रहने की बात की और कहा कि आप सब एक साथ नैनीताल आएं हम यहांँ पर हैं सबका स्वागत है।
    अंत में आभार के क्रम में संचालिका मंजुला श्रीवास्तवा ने सभी वक्ताओं और श्रोताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि आप सब लगातार एक घंटे से भी अधिक समय से धैर्य के साथ जुड़े रहे इसके लिए आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद। 
    मैं आशा करती हूँ कि ऐसे गौरवपूर्ण, ज्ञानवर्धक और सामाजिक अभिचर्चाएँ आगे भी होती रहेंगी।


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