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    जिस मामले को आपराधिक रंग दिया गया उसे रद्द करने को लेकर संकोच नहीं- सुप्रीम कोर्ट | #NayaSaberaNetwork



    नया सबेरा नेटवर्क
     नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट को इस बात की जांच करनी चाहिए कि जिस अपराध के बारे में शिकायत की गई है उसमें आपराधिक तत्व मौजूद हैं या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा कि मौजूदा केस में क्रिमिनल केस याचिकाकर्ता को प्रताड़ित करने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया। शीर्ष अदालत ने कहा कि सिविल नेचर के विवाद को आपराधिक केस का रंग दिया गया या नहीं यह हाई कोर्ट को देखना होगा।
     सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस इंदिरा बनर्जी की अगुवाई वाली बेंच के सामने याची रंधीर सिंह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 15 दिसंबर 2020 के फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने याची की अर्जी खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता एक संपत्ति का खरीददार था और उसकी पावर ऑफ एटर्नी के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज किया गया था जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने अर्जी दाखिल की थी। याची के खिलाफ गोरखपुर स्थित एक थाने में धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था और वहां की निचली अदालत में केस पेंडिंग था।
     याची ने क्रिमिनल केस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने याची के खिलाफ शुरू की गई क्रिमिनल कार्रवाई को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में हाई कोर्ट को देखना चाहिए था कि क्या सिविल नेचर के मामले को आपराधिक रंग दिया गया है? हाई कोर्ट को ऐसे मामले में क्रिमिनल केस रद्द करने को लेकर संकोच नहीं करना चाहिए था।
     ऐसे मामले में जब हाई कोर्ट के सामने सीआरपीसी की धारा-482 के तहत केस अपील में आता है तो यह प्रावधान इसलिए बनाया गया है कि हाई कोर्ट को इस बात का परीक्षण करे कि क्या आपराधिक कार्यवाही का इस्तेमाल हथियार के तौर पर किसी को प्रताड़ित करने के लिए तो नहीं किया गया है? देखा जाए तो सीआरपीसी का यह प्रावधान यह कहता है कि हाई कोर्ट अपने जूरिडिक्शन का इस्तेमाल कर इस बात की जांच करे कि आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के लिए तो शिकायत में आपराधिक आरोप नहीं लगाए गए हैं? साथ ही न्याय पाने का जो सिद्धांत है उसको सुनिश्चित करना ध्येय होना चाहिए।
     शिकायत में क्रिमिनल नेचर के अपराध हुआ है या नहीं यह देखना जरूरी है साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि अपराध का तत्व मौजूद है या नहीं है। यह सब आरोप के नेचर पर निर्भर करता है। मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ जो एफआईआर दर्ज किया गया है वह मामला चार्जशीट में नहीं बनता है और ऐसे में याचिकाकर्ता की अपील स्वीकार की जाती है और क्रिमिनल केस खारिज किया जाता है।

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