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    बचपन,बस,पर्यटन और देशाटन | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    बचपन,बस,पर्यटन और देशाटन

    बचपन में....! 
    हम गाँव वाले बच्चों को
    बड़े ही नसीब से बसों की
    लंबी यात्रा करने को मिलती थी
    अमूमन जब किसी रिश्तेदारी में
    शादी विवाह का अवसर होता

    या फिर मन्नत पूरी होने पर
    देवस्थान पर दर्शन पूजा के लिए
    जाने का अवसर होता...
    इस यात्रा के दौरान 
    बस का कंडक्टर 
    सदा ही कौतूहल का विषय होता
    प्राइवेट बसों में....! 
    किराया कम कराते समय में
    और सरकारी बसों में
    हम बच्चों का 
    हाफ टिकट बनाने हेतु
    उम्र का निर्धारण करते समय भी
    हमारी निगाहें उसकी तरफ़
    जरूर होती थीं.....!
    जहाँ तक मुझे याद है....
    इस हाफ टिकट पर
    हमें सीट पर बैठने की
    मनाही भी होती थी... 
    हम बच्चों के लिए
    इसके बाद का आकर्षण होता
    यात्रा के दौरान मिलने वाला
    टाइमपास (चिनियाबदाम) या
    सीजन के मुताबिक....!
    जामुन,अमरूद या मकई भुट्टा
    जो पूरी यात्रा के दौरान 
    एक-आध बार 
    जरूर ही मिल जाता था
    इसके बाद का आनन्द होता
    नदी पुल पार करते समय
    मां-पिताजी द्वारा 
    हमारे सर के चारों तरफ घुमाकर..
    "ओइञ्छ कर" नदी में डालने को
    दिए गए सिक्के का.... जो,
    कभी-कभार ही नदी तक
    पहुँच पाता और अक्सर
    सड़क पर ही रह जाता जाता था
    मित्रों...!यह सिक्का उन दिनों 
    तमाम मनौतियों का 
    वाहक होता था और 
    बुरी नजरों से हमारी
    रक्षा करता था.... 
    यात्रा के दौरान का 
    विशेष आकर्षण होती थी 
    बंद क्रोसिंग से 
    गुजरती हुई रेलगाड़ी
    जिसे देखकर.....! 
    हम चहक-चहक जाते थे
    और रोते हुए छोटे बच्चे 
    भौचक चुप हो जाते थे... 
    इस फाटक का भी.... 
    एक अलग आकर्षण था 
    बंद गेट के दोनों तरफ खड़ी
    गाड़ियां ऐसा प्रतीत होती कि
    लाइन आफ कंट्रोल के दोनों तरफ
    युद्ध के लिए सेनाएं खड़ी हो
    यह निश्चय ही बड़ा कौतूहल होता
    पूरी यात्रा का सबसे बड़ा आनन्द  
    खिड़की के किनारे वाली 
    सीट का मिलना होता था  
    इससे आनन्द द्विगुणित हो जाता
    खिड़की के पास बैठने के लिए....
    हम झूठ बोलने से भी, 
    परहेज नही किया करते थे 
    कोई ना कोई झूठ बोलकर हम..!
    खिड़की के पास पहुँच ही जाते थे      
    इस दौरान हमें हिदायत/ नसीहतें
    बहुत दी जाती थी...
    पर,जो आनंद आता 
    उसकी कल्पना आज भी 
    मन को विह्वल कर देती है
    खिड़की के पास सीट मिलने पर
    हम आत्ममुग्ध हो जाते थे
    और मुस्कुराते हुए पूरी यात्रा कर
    घर वापस आ जाते थे....
    सच कहूँ तो मित्रों....! उन दिनों...
    इस प्रकार की लम्बी यात्रा ही
    देशाटन भी थी..और पर्यटन भी.. 


    रचनाकार...
    जितेन्द्र कुमार दुबे
    क्षेत्राधिकारी नगर
    जनपद...जौनपुर


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