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    भारत टीके का पावरहाउस - प्रौद्योगिक, स्वास्थ्य, जलवायु, इक्विटी और लैंगिक अवसर भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए चार अहम क्षेत्र हैं | #NayaSaberaNetwork



    देश को पिछले डेढ़ वर्ष के दौरान सीखी गई सबसे अच्छी चीजों को संस्थागत बनाने की ज़रूरत का पीएम का सुझाव सराहनीय - एड किशन भावनानी
    नया सबेरा नेटवर्क
    गोंदिया - भारत ने आज लगभग 103 करोड़ टीकाकरण का आंकड़ा पार कर लिया है इसी सामर्थ्य का ज़ज़बा और संकल्पों की सिद्धि के लिए परिश्रम ज़ज़बे और जांबाज़ी की पराकाष्ठा को देखते हुए सारा विश्व हैरान, अचंभित है कि विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष देश जिसमें अनेकता में एकता, लाखों जातियां, प्रजातियां, अनेक धर्म के लोग बड़ी खूबसूरती से एक साथ, प्यार मोहब्बत से रहते हैं, उस देश ने एक अनूठा कार्य कर दिखाया!!! इतनी जल्दी रणनीतिक रोडमैप बनाकर 103 करोड़ से अधिक कोरोना डोज़ लगाकर भयंकर कोरोना महामारी को पच्छाड़ने में पूरी ताकत झोंक दी है और समानांतर रूप से अपनी अर्थव्यवस्था को भी गति, उसके विकास के अन्य क्षेत्रों प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, जलवायुज इक्विटी और लैंगिक अवसरों का खूबसूरती पूर्वक तालमेल से विकास की भारी गति को चालू रखे हुए हैं!!! साथियों आज सारे विश्व की निगाहें भारत के इस अभूतपूर्व कौशल का पर टिकी है याने अमेरिका जैसे बड़े प्रभावशाली, पावरफुल देश की कंपनी यूएस इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कारपोरेशन (डीएफसी) के प्रमुख ने भी कहा भारत टीके का पावर हाउस है!!! साथियों बात अगर हम अमेरिकी डीएफसी की करें तो उनके प्रमुख के नेतृत्व में उच्चअधिकार प्राप्त प्रतिनिधिमंडल की करें तो वे 24 से 26 अक्टूबर 2021 तक भारत की यात्रा पर हैं और उन्होंने कहा कि भारत डीएफसी को 2.3 अरब डालर से अधिक धनराशि के निवेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा साझेदार है। साथियों बात अगर हम डीएफसी प्रमुख के भारत यात्रा करने के पहले दिए बयान की करें तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अनुसार, डीएफसी के प्रमुख ने भारत की अपनी यात्रा से पहले कहा कि भारत वैक्सीन का पावरहाउस है और वैक्सीन के निर्माण में देश के साथ अमेरिका के काम करने से लोगों की जिंदगियां बच रही हैं। डीएफसी अमेरिका का विकास बैंक है जो दुनियाभर में विकासशील देशों में निवेश करता है। उन्होंने कहा कि भारत वैक्सीन का पावरहाउस है। भारत बड़ी संख्या में वैक्सीन का उत्पादन कर रहा है। महामारी से निपटने के लिए निश्चित तौर पर भारत एक अहम हिस्सा है। उन्होंने कहा कि भारत का एक अरब वैक्सीनेशन का लक्ष्य तय करना असाधारण है। उन्होंने कहा कि डीएफसी का ध्यान खासतौर पर चार क्षेत्रों- जलवायु, स्वास्थ्य, इक्विटी और लैंगिक अवसरों तथा टेक्नोलॉजी पर है। जाहिर तौर पर ये भारत की अर्थव्यवस्था के विकास के लिए चार अहम क्षेत्र हैं। साथियों बात अगर हम डीएफसी के भारत आने की करें तो, कोविड-19 के टीके के विनिर्माण को प्रोत्साहन देने के क्वाड के प्रयासों के तहत अमेरिका के डीएफसी के प्रमुख भारत यात्रा पर हैं। डीएफसी एक सरकारी विकास वित्त संस्थान है, जो निम्न और मध्यम आय वर्ग वाले देशों में विकास परियोजनाओं में निवेश करता है। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि हैदराबाद में यह प्रतिनिधिमंडल भारतीय टीका विनिर्माता बायोलॉजिकल-ई के कार्यालय भी जाएगा। साथियों इधर बात अगर हम पीएम के घरेलू टीका निर्माताओं के साथ बातचीत की करें तो दिनांक 23 अक्टूबर 2021 की पीआईबी की विज्ञप्ति के अनुसार पीएम ने टीका निर्माताओं के प्रयासों की प्रशंसा की, जिसके परिणाम स्वरूप देश ने 100 करोड़ टीकाकरण का मील का पत्थर पार कर लिया है और कहा कि उन्होंने भारत की सफलता की कहानी में एक बड़ी भूमिका निभाई है। उन्होंने महामारी के दौरान उनकी कड़ी मेहनत और उनके द्वारा दिए गए भरोसे की सराहना की। पीएम ने कहा कि देश को पिछले डेढ़ वर्षों के दौरान सीखी गई सबसे अच्छी चीजों को संस्थागत बनाने की जरूरत है और कहा कि यह वैश्विक मानकों के अनुरूप हमारी चीजों को बेहतर करने का एक अवसर है। उन्होंने कहा कि टीकाकरण अभियान की सफलता को देखते हुए पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने हेतु तैयार रहने के लिए टीका निर्माताओं कोलगातार मिलकर काम करना चाहिए। घरेलू टीका निर्माताओं ने टीकों के विकास की दिशा में निरंतर मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करने में पीएम की दूरदर्शिता और गतिशील नेतृत्व की सराहना की। उन्होंने सरकार और उद्योग के बीच अभूतपूर्व सहयोग भावना व समन्वय की भी प्रशंसा की, जो पहले कभी नहीं देखे गए थे। टीके का उत्पादन करनेवाली कंपनियों ने इस पूरे प्रयास में सरकार द्वारा किए गए नियामकीय सुधारों, सरलीकृत प्रक्रियाओं, समय पर मंजूरी देने के साथ ही सरकार के दृष्टिकोण और सहायक प्रकृति की सराहना की। उन्होंने कहा किया कि अगर देश पुराने मानदंडों का पालन कर रहा होता, तो काफी देरी हो जाती और हम अब तक टीकाकरण के इस स्तर तक नहीं पहुंच पाते। साथियों बात अगर हम स्वास्थ्य क्षेत्र में और एक बड़े कदम की करें तो दिनांक 25 अक्टूबर 2021 को पीएम आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना (पीएमएएसबीवाई) के शुभारंभ की करें तो, पीआईबी की विज्ञप्ति के अनुसार, यह पीएमएएसबीवाई पूरे भारत की स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना को मज़बूत करने संबंधी देश की सबसे बड़ी योजनाओं में एक होगी। यह योजना,राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अतिरिक्त होगी। पीएमएएसबीवाई का उद्देश्य शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में विशेषकर गहन चिकित्सा (क्रिटिकल केयर) सुविधाओं तथा प्राथमिक देखभाल संबंधी सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना में मौजूद कमियों को दूर करना है। यह योजना विशेष रूप से चिन्हित 10 राज्यों के 17,788 ग्रामीण स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों को समर्थन प्रदान करेगी। इसके अलावा, सभी राज्यों में 11,024 शहरी स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र स्थापित किए जाएंगे। 5 लाखसे अधिक आबादी वाले देश के सभी जिलों में एक्सक्लूसिव क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक के माध्यम से गहन चिकित्सा (क्रिटिकल केयर) सेवाएँ उपलब्ध होंगी, जबकि शेष जिलों को रेफरल सेवाओं के माध्यम से कवर किया जाएगा। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारत टीके का पावरहाउस है। प्रौद्योगिक, स्वास्थ्य, जलवायु, इक्विटी और लैंगिक अवसर भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के चार अहम क्षेत्र हैं। देश को पिछले डेढ़ वर्ष के दौरान सीखी गई सबसे अच्छी चीजों को संस्थागत बनाने की ज़रूरत का पीएम का सुझाव सराहनीय है।

    सिनेमा में मनोरंजन के अलावा ज्ञान, कौशलता प्रदान करने की शक्ति - फिल्म को सामाजिक, नैतिक मूल्य और नीतिपरक संदेशों का वाहक होना चाहिए 

    दर्शकों सहित फिल्म निर्माण क्षेत्र के हर किरदार को फिल्मों में हिंसा, अपराध, अश्लीलता और निर्लज्ज़ता का चित्रण के खिलाफ़ एकजुटता ज़रूरी - एड किशन भावनानी

    गोंदिया - भारत में अक्सर हम प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से पढ़ते व सुनते हैं कि, पूरी घटना फिल्मी अंदाज में घटी, फिल्मी अंदाज में डकैती, फिल्मी अंदाज में फिरौती को अंजाम दिया गया वगैरा-वगैरा, साथियों मेरा मानना है कि इस प्रकार की हेडलाइंस देने का कारण भी पाठकों, पाठन में रुचि रखने वालों और आम जनता को आकर्षित करने के लिए ही इस फिल्मी अंदाज का सहारा लिया जाता है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि आज कुछ अपवादों को अगर हम छोड़ दें तो जनता का एक बड़ा हिस्सा आज फिल्मों की तरफ आकर्षित है और हो भी क्यों ना ? आज भारत की जनसंख्या का 65 फ़ीसदी हिस्सा युवा है। फिल्में मनोरंजन का साधन है, युवाओं की दिलचस्पी है और इसमें बुराई भी नहीं है। बस!!! ज़रूरत है इस मनोरंजन के माध्यम को और अंदाज को कुछ बदलने की !!! साथियों बात अगर हम दशकों पहले की करें तो, जय संतोषी मां, क्रांति, मां अनेक प्रेरक फिल्में का युग भी हमने देखा, जिसमें लोगों को बहुत प्रेरणा मिली। परंतु आज़ बदलते परिवेश और पाश्चात्य सोच ने माहौल बदल दिया है, इस बदलते माहौल, बदलते किरदारों का दोष भी किसी एक व्यक्ति, समूह, क्षेत्र का नहीं है दे सकते!! इसमें भी हमारी सामूहिक सोच है, जिसे फ़िर सामूहिक सोच के बल पर ही बदला जा सकता है और सामाजिक बुराइयों से आम जनता को बचाया जा सकता है!! साथियों आज हम सब देखते हैं कि प्रिंट मीडिया, उनको उपलब्ध पुष्ठों के आधार पर फिल्मी जानकारी के लिए एक या अधिक पुष्ठ दिए जाते हैं क्योंकि पाठकों की रुचि होती है। याने हम सटीक अंदाज लगा सकते हैं कि आम नागरिकों को प्रभावित करने का सिनेमा एक बहुत बड़ा माध्यम है!! तो हम सबको सकारात्मकता से इस सिनेमा क्षेत्र के कौशलता का सामाजिक, नैतिक मूल्य, नीतिपरक संदेशों का वाहक बनाना होगा!! सिनेमा को आत्मनिर्भर भारत बनाने के तौर तरीके बताने का माध्यम और फिल्मी क्षेत्र वोकल फॉर लोकल के लिए प्रोत्साहित करने के लिए एक बहुत बड़ा प्लेटफार्म है हमारे पास!!! साथियों बात अगर हम उपरोक्त सभी बातों को धरातल पर हकीक़त में उतारने की करें तो यह किसी एक व्यक्तिज हीरो हीरोइन, निर्माता या फिल्म निर्माण के क्षेत्र के किसी एक किरदार का नहीं यह काम हर उस नागरिक और युवा साथी का है जो फिल्मी चित्र में रुचि रखता है। सिनेमा लाइन के हर किरदार का है यदि उपरोक्त बातों को लेकर सामूहिक सोचका क्रियान्वयन हो तो फिल्मों में हिंसा, घोर अपराध, अश्लीलता निर्लज्ज़ता का रोल बंदहो जाएगा और प्रेरक फिल्मों का प्रचलन बढ़ेगा!! साथियों बात अगर हम दिनांक 25 अक्टूबर 2021 को 67 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह की करें, जिसमें दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी दिया गया तो पीआईबी की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, भारत के उपराष्ट्रपति ने भी अपने संबोधन में, आज फिल्म निर्माताओं से अपनी फिल्मों में हिंसा, घोर अश्लीलता और निर्लज्‍जता का चित्रण करने से दूर रहने का आह्वान किया। यह देखते हुए कि एक अच्छी फिल्म में लोगों के दिल और दिमाग को छूने की शक्ति होती है। सिनेमा दुनिया में मनोरंजन का सबसे सस्‍ता साधन है। उन्होंने फिल्म निर्माताओं और कलाकारों से आग्रह किया कि वे इसका जनता, समाज और राष्ट्र की बेहतरी में उपयोग करें। उपराष्ट्रपति ने सिनेमा उद्योग को सलाह दी कि वह ऐसा कोई भी काम न करे जो हमारी सर्वोच्‍च सभ्‍यता की महान संस्कृति, परंपराओं, मूल्यों और लोकाचार को कमजोर करता हो। भारतीय फिल्में दुनिया पूरी दुनिया के दर्शकों को महत्वपूर्ण संदेश देती हैं। फिल्‍मों को बाहरी दुनिया के लिए भारतीयता का एक स्नैपशॉट प्रस्‍तुत करना चाहिए। उन्‍होंने इस बात पर भी जोर दिया कि फिल्‍मों को सांस्कृतिक कूटनीति की दुनिया में प्रभावी राजदूत बनने की ज़रूरत है। लोकप्रिय अभिनेता श्री रजनीकांत को प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और विभिन्न भाषाओं की फिल्मों के अभिनेताओं को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करनेके बाद अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि फिल्मों को एक उच्च उद्देश्य वाला एक सार्थक वाहक होना चाहिए। फिल्मों को सामाजिक, नैतिक संदेश का वाहक होना चाहिए। उन्होंने कहा, इसके अलावा, फिल्मों को हिंसा को अधिक दिखाने से बचना चाहिए और सामाजिक बुराइयों की अस्वीकृति को आवाज देनी चाहिए। सकारात्मकता और खुशी लाने के लिए सिनेमा की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, अनुभव हमें बताता है कि संदेश देने वाली फिल्मों में मजबूत अपील होती है। उन्होंने कहा कि सिनेमा में मनोरंजन के अलावा ज्ञान प्रदान करने कीशक्ति भी है। उन्होंने कहा कि एक फिल्म को अच्‍छे उद्देश्य के साथ सामाजिक, नैतिक और नीतिपरक संदेशों का वाहक होना चाहिए। इसके अलावा फिल्मों को हिंसा को उजागर करने से दूर रहना चाहिए। फिल्‍म को सामाजिक बुराई के बारे में समाजकी अस्वीकृति की आवाज़ भी होनी चाहिए। दुनिया में फिल्मों के सबसे बड़े निर्माता के रूप में भारत की सॉफ्ट पावर काउल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी फिल्में पूरी दुनिया- जापान, मिस्र, चीन, अमेरिका, रूस, मध्य पूर्व, ऑस्ट्रेलिया और अन्‍य मेजबान देशों में देखी और सराही जाती हैं। उन्होंने कहा कि फिल्में हमारा एक सबसे प्रमुख सांस्कृतिक निर्यात हैं जो वैश्‍विक भारतीय समुदाय को उनके भारत में बिताए गए जीवन की लय से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में भी काम करती हैं। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि, सिनेमा में मनोरंजन के अलावा ज्ञान कौशल प्रदान करने की शक्ति होती है उनको सामाजिक, नैतिक मूल्य और नीतिपरक संदेशों का वाहक होना चाहिए तथा दर्शकों सहित फिल्म निर्माण क्षेत्र के हर किरदार को फिल्मों में हिंसा और अपराध अश्लीलता और निर्लज्ज़ता का चित्रण के खिलाफ एकजुटता ज़रूरी है। 

    -संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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