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    बचपन,किताबें और जुगाड़ | #NayaSaberaNetwork



    नया सबेरा नेटवर्क
    बचपन,किताबें और जुगाड़


    बचपन में पढ़ाई के दौरान 
    अगली कक्षा में 
    प्रोन्नत होने से पहले ही 
    शुरू हो जाता था
    अगली कक्षा की किताबें 
    पाने के लिए जुगाड़.....! 
    कभी अपने सीनियर्स से 
    तो कभी अपने रिश्तेदारों से
    हम किताबें माँग लिया करते थे
    और तो और 
    हमसे ज्यादा प्रयास 
    माँ-बाप या गार्जियन 
    खुद भी किया करते थे
    कंपटीशन उनके लेवल पर भी था
    कुछ पुस्तकें गुरुजन भी 
    इकट्ठा कर लेते थे....
    गरीब और मेधावी छात्रों की
    मदद के लिए 
    इस दौरान 
    कुछ सीनियर्स या रिश्तेदार
    बड़े ही खुश मिजाज होते 
    जो प्रसन्न भाव से 
    किताबें दान कर देते थे 
    कुछ तो इतने मायावी होते कि
    कवर पर कौन कहे...! 
    स्केच पेन से किताब पर 
    इस तरह अपना नाम लिख डालते
    कि पन्ना-पन्ना गवाही देने के लिए
    तैयार रहता था,यह बताने को 
    कि किताब किसकी थी... 
    कुछ सीनियर्स या फिर रिश्तेदार
    दुर्भाग्य से ऐसे भी होते 
    जो खुद ही 
    संशय की स्थिति में रहते कि
    इस बार प्रोन्नत होंगे या नहीं...? 
    ऐसे सीनियर्स या रिश्तेदार से
    किताबों की अपेक्षा करना
    नाइंसाफी ही था...
    उनकी खुशकिस्मती होती जो
    अगले साल उनकी किताबों की
    माँग शुरू होती थी 
    इधर हम भी न...! 
    उन दिनों, 
    कम होशियारी नहीं दिखाते थे
    किताबें मिलते ही...
    जिद कर माँ-बाप से 
    बांस कागज अथवा अखबार का
    कवर चढ़वाकर...
    किताबों को नया बनाया करते थे,
    सीनियर्स या रिश्तेदारों के नाम पर
    दूधिया या चाक रगड़कर
    अपना नाम लिख दिया करते थे
    बन्धुओं उन दिनों....! 
    हर साल किताबें 
    नहीं बदली जाती थी 
    आज तो किताबें 
    हर साल बदल दी जा रही हैं
    प्रकाशक और लेखक तक का
    प्रबंध तंत्र से पारदर्शी 
    हिसाब-किताब करके....
    जाहिर है गरीब हो या अमीर
    या एक ही परिवार के छोटे-बड़े
    किसी के काम की,नहीं रह जातीं
    पिछले साल की किताबें... 
    किताबों के लेन-देन के चक्कर में
    कभी-कभी मित्रों एवं रिश्तेदारों से
    पर्याप्त अनबन भी,
    हो जाया करती थी....
    पर बंधुओं जरा विचार करिए
    उन दिनों क्या किताबें
    अनमोल हुआ करती थी...? 
    निश्चित तौर पर नहीं, पर ....
    आपसी रिश्ते..... 
    जरूर अनमोल हुआ करते थे
    आपसी रिश्ते.......
    जरूर अनमोल हुआ करते थे
    सच कहूँ तो बातें 
    केवल किताबों के लेन-देन की
    नहीं होती थी,
    गौर से देखें तो इससे समाज में
    आपस की "बॉन्डिंग"
    और मजबूत होती थी
    साथ ही आज की तरह
    एक दूसरे के परिचय के लिए
    "रैंगिंग" की कोई आवश्यकता
    नहीं होती थी.....
    "रैंगिंग" की कोई आवश्यकता 
    नहीं होती थी.…..…


    रचनाकार
    जितेन्द्र कुमार दुबे
    क्षेत्राधिकारी नगर 
    जनपद.. जौनपुर

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