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    हीमोफीलिया मरीजों के लिए ' भगवान ' से कम नहीं हैं शैलेश | #NayaSaberaNetwork



    नया सबेरा नेटवर्क
    गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के रहने वाले शैलेश गुप्ता की आज खूब मिसाल दी जा रही है। खुद हीमोफीलिया का मरीज होते हुए भी अपने दर्द को भूलकर वह इस लाइलाज बीमारी के जितने भी मरीज हैं, उनकी हर तरह से मदद करते हैं। इसके लिए शैलेश ने वॉट्सऐप पर हिमोफीलिया ग्रुप भी बनाया है, जिसमें पूर्वांचल के कई जिले के मरीजों को खोज-खोजकर इन्होंने जोड़ा है। इसके साथ ही लखनऊ और गोरखपुर के डॉक्टर्स भी इसमे जुड़े हैं।
    ग्रुप में जुड़े मरीजों को जब भी दवा से लेकर डॉक्टरों की जरूरत होती है तो वो इस ग्रुप अपना मैसेज भेज देते हैं। इसके बाद शैलेश उनकी हर तरह से मदद करते हैं। गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज के पास रहने वाले 29 साल के शैलेश गुप्ता जब 5 साल के थे, तभी उन्हें हिमोफीलिया बीमारी हुई थी। इसके बाद से ही लगातार उनका इलाज चल रहा है। इसके बाद से ही वह इस बीमारी के मरीजों की परेशानियों को देखकर भावुक हो जाते थे।
    दूरदराज के मरीजों की मदद के लिए प्राइवेट कंपनी में जॉब करते हुए शैलेश ने साल 2018 में एक वॉट्सऐप ग्रुप बनाया। इस बीमारी के जितने भी मरीज बीआरडी मेडिकल कॉलेज में आते हैं, शैलेश उनकी मदद कर उन्हें ग्रुप में जोड़ लेते हैं। इस समय शैलेश के पास पूर्वांचल के कुशीनगर, भटनी, महारागंज, सरदारनगर और देवरिया के लगभग 350 से अधिक मरीजों का पूरा ब्योरा है। शैलेश गुप्ता हिमोफीलिया जागरूकता का भी काम करते हैं। किसी भी हिमोफीलिया मरीज को दिक्कत होने पर शैलेश गुप्ता खुद मेडिकल कॉलेज जाकर जीवनरक्षक सुई फैक्टर लगवाते हैं और जिसको एडमिट कराने की जरूरत होती है, उन्हें भर्ती भी करवाते हैं।
    मानवता की मिसाल पेश करने वाले शैलेश गुप्ता ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में हिमोफीलिया के लिए एक अलग से विभाग बनाया जाना चाहिए। जहां छोटे बच्चों से लेकर बड़े लोगों का एक ही जगह इलाज संभव हो सके। उन्होंने हिमोफीलिया मरीजों को सरकारी सुविधा मिले इसकी भी सरकार से मांग की है।
    हिमोफीलिया एक आनुवांशिक लाइलाज बीमारी है। इसमें शरीर में कहीं भी हल्का कट लग जाने पर खून बन्द नहीं होता है। जोड़ों के अन्दर भी अपने आप खून बहने लगता है। पैर के जोड़ों में बार-बार रक्तस्त्राव होने से जोड़ खराब हो जाता है। शरीर पर नीले और लाल रंग के चक्कत्ते दिखाई देना भी इसका लक्षण है। जब इस बीमारी के पेशेंट को ऐसी परेशानी होती है तो उन्हें तुरंत जीवनरक्षक दवा फैक्टर 8 और 9 सुई कि जरूरत पड़ती है। जो हर मेडिकल कॉलेज में सरकार मुफ्त देती है। इसका बाहर की दुकानों पर रेट बहुत मंहगा है।


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