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    पद्मश्री भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि पर हुआ राष्ट्रीय कवि सम्मेलन | #NayaSaberaNetwork

    पद्मश्री भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि पर हुआ राष्ट्रीय कवि सम्मेलन   | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    मुंबई। भोजपुरिया माटी और अस्मिता के प्रतीक स्व.भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है। अपनी जमीन, उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं तथा राग-विराग की जितनी समझ भिखारी ठाकुर को थी, उतनी किसी अन्य भोजपुरी कवि-लेखक में दुर्लभ है। आज के भोजपुरी लेखक जहां हिंदी और अंग्रेजी में सोचते और भोजपुरी में लिखते हैं, वे उन विरले लोगों में हैं जिनका अन्तर से कलेवर तक भोजपुरी माटी से निर्मित था।भिखारी ठाकुर का जन्म बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर गांव के एक गरीब नाई परिवार में 18 दिसम्बर 1887 में हुआ और उनकी मृत्यु 10 जुलाई 1971 को हुई,जिनकी 50 वीं पुण्यतिथि, श्रद्धांजलि सभा देश के कोने- कोने में रखी गयी।ठीक उसी श्रृंखला में कोविड-19 का पालन करते हुए विनय शर्मा दीप ने वर्चुअल जूम ऐप पर शनिवार दिनांक 10जुलाई  2021 को श्रद्धांजलि सभा के साथ भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया।उक्त समारोह की अध्यक्षता लखनऊ से वरिष्ठ साहित्यकार अनिल वर्मा 'कौशल' ने की,मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डाॅक्टर डंडा लखनवी(लखनऊ), विशेष अतिथि पवन कछवाहा (रोहतक)थे।उक्त समारोह के मार्गदर्शक वरिष्ठ साहित्यकार पवन कुमार पवन(शामली), संयोजक व सूत्रधार विनय शर्मा दीप (मुंबई) एवं सलाहकार वरिष्ठ साहित्यकार माथुरकर जबलपुरी 'अनजान दास' (जबलपुर) थे।
    स्व• भिखारी ठाकुर के स्मृति दिवस पर जौनपुर उत्तर प्रदेश से गीतकार रविन्द्र कुमार शर्मा 'दीप' ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पण कर मोमबत्ती जलाकर उन्हें याद करते हुए समारोह का शुभारंभ किया।भिखारी ठाकुर की जीवनी पर वक्तव्य देते हुए पवन कछवाहा तथा डंडा लखनवी ने कहा भिखारी ठाकुर को नाम मात्र की स्कूली शिक्षा मिली थी। किशोरावस्था में ही रोजगार की तलाश में वे खडगपुर और पुरी गए जहां साथियों के बीच गायकी का चस्का लगा। चस्का ऐसा कि सब छोड़-छाड़कर घर लौटे और गांव में दोस्तों के साथ रामलीला मंडली बना ली। रामलीला में सफलता मिली तो खुद नाटक और गीत लिखने और उन्हें मंचित करने लगे। नाटकों में सीधी-सादी लोकभाषा में गांव-गंवई की सामाजिक और पारिवारिक समस्याएं होती थीं जिनसे लोग सरलता से जुड़ जाते थे। लोक संगीत उन नाटकों की जान हुआ करती थी। फूहड़ता का कहीं नामोनिशान नहीं। 'विदेसिया' आज भी उनका सबसे लोकप्रिय नाटक है जिसमें एक ऐसी पत्नी की विरह-व्यथा है जिसका मजदूर पति रोजी कमाने शहर गया और किसी दूसरी स्त्री के प्रेम में पड़ गया। जिन अन्य नाटकों की उन्होंने रचना की, वे हैं - गबरघिचोर, भाई विरोध, बेटी बेचवा, कलयुग प्रेम, विधवा विलाप, गंगा अस्नान,ननद- भौजाई संवाद,पुत्र-वध,राधेश्याम बहार और द्रौपदी पुकार। उनकी नाटक मंडली का यश पहले बिहार और फिर देश में तथा देश के बाहर उन तमाम जगहों पर पहुंचा जहां बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग बसते थे। उनकी मंडली ने उत्तर भारत के शहरों के अलावा मारीशस,फीजी,केन्या, नेपाल,ब्रिटिश गुयाना,सूरीनाम, यूगांडा, सिंगापुर, म्यांमार, साउथ अफ्रीका,त्रिनिदाद आदि देशों की यात्राएं की और वहां बसे भारतीय मूल के लोगों को उनकी अपनी जड़ों तक जाकर जानकारियां दी।
    उक्त श्रद्धाजंलि सभा के उपरांत भारत के सभी प्रदेशों से उपस्थित साहित्यकारों की उपस्थिति में भव्य कवि सम्मेलन भी हुआ।कवियों में मुख्य रूप से राजेश कुमार नाई(राजस्थान),दलवीर सिंह फूल(हरियाणा),तुलेश्वर कुमार सैन (छत्तीसगढ़),प्रेम कुमार मुफ़लिस (देवरिया),डाॅ चैतन्य चेतन (बरेली),डाॅ जयवीर सिंह जौहर (मंऊ,चित्रकूट),राम अवतार शर्मा पंकज (लखनऊ), रामजीलाल वर्मा(कल्याण,मुंबई), आर पी ठाकुर(लखनऊ),शिकक दीपक शर्मा (जौनपुर उप्र),श्रीमती विजयलक्ष्मी (हरिद्वार),सैन रामपाल व्यास(अमरोहा उप्र),राम बहादुर अधीर 'पिण्डवी' (देवरिया उप्र) एवं अश्विनी कुमार अश्विन (भदोहीं उप्र)उपस्थित थे,जिन्होंने भिखारी ठाकुर पर लिखित काव्यपाठ कर मंत्रमुग्ध कर दिया।उक्त साहित्यकारों के अतिरिक्त कवि, समाजसेवी,श्रोताओं में रोहन ठाकुर,वरिष्ठ हास्य कवि हलचल हरियाणवी,रोहन ठाकुर, एॅड शिवराम सेन,कवि दिनेश याज्ञिक,कवि अंकेश कुमार सैन,रघुनंदन सैन,दीपक शर्मा, कवि राम कंवर,रचना शर्मा, रचित शर्मा,राहुल शर्मा, संदीप शर्मा, कवि हरीश कुमार परिहार, संतोष निरंकार शर्मा, कवि प्रवीण सेन,कवि सीताराम,अनुराग शर्मा,दीपक सेन,अश्विनी सेन आदि उपस्थित थे।भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के कुछ चर्चित गीतों की चंद पंक्तियाँ--- (1)
    करिके गवनवा भवनवा में छोडि कर,अपने परईलन पुरूबवा बलमुआ।
    अंखिया से दिन भर गिरे लोर ढर ढर,बटिया जोहत दिन बितेला बलमुआ।
    (2)
    चलनी के चालल दुलहा सूप के फटकारल हे।
    दिअका के लागल बर दुआरे बाजा बाजल हे।।
    (3)
    हमरा बलमु जी के बड़ी-बड़ी अंखिया से,
    चोखे-चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया।
    (4)
    गिरिजा-कुमार!,कर दुखवा हमार पार,
    ढर-ढर ढरकत बा लोर मोर हो बाबूजी।
    इसी तरह इनके बहुत सारे गीतों में विदेशिया गीत भी सुप्रसिद्ध चर्चित हुई।भोजपुरी सिनेमा जगत में पहली फिल्म विदेशिया भिखारी ठाकुर की चर्चित रही।
    अंत में अध्यक्षिय वक्तव्य के साथ वरिष्ठ साहित्यकार पवन कुमार पवन ने सभी की उपस्थिति हेतु धन्यवाद ज्ञापित करते हुए आभार व्यक्त कर समारोह के समापन की घोषणा की।

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