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    "लोककला में प्रमुख योगदान है पद्मश्री गोदावरी दत्ता का " | #NayaSaberaNetwork













    नया सबेरा नेटवर्क
    लोककला के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत हैं गोदावरी दत्ता
    लखनऊ। मिथिला पेंटिंग की चित्रकार पद्मश्री गोदावरी दत्ता का नाम कला की दुनिया मे बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। मिथिला कला को दुनिया के कोने कोने में पहुचाने वाले विशेष कलाकारों में से गोदावरी दत्ता भी एक हैं जिन्हें भी श्रेय दिया जाता है। हजारों की संख्या में लोगों को इस विधा से प्रशिक्षित भी किया है और तमाम लोगों को जीविकोपार्जन का माध्यम बन गया यह कला। 
    रविवार को अस्थाना आर्ट फ़ोरम के ऑनलाइन मंच पर इनदिनों चल रहे कला वार्ता और कार्यशाला अवलोकन की कड़ी में पांचवे संस्करण में मिथिला कला की विश्वविख्यात महिला कलाकार पद्मश्री गोदावरी दत्ता आमंत्रित कलाकार के रूप में शामिल हुईं उन्होंने अपने लंबी कलायात्रा को साझा किया।  साथ इस कार्यक्रम में देश विदेशों से लोगों ने गूगलमीट के माध्यम से इस विशेष कार्यक्रम आनंद लिया।
    क्यूरेटर भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि मिथिला चित्रकला की महादेवी 93 वर्ष की पद्मश्री गोदावरी दत्ता आज भी सक्रिय हैं यह कला जगत के लिए बड़ी खुशी की बात है । विश्व भर में चर्चित मिथिला लोककला का आज बाजार बहुत अच्छा है। विदेशी पर्यटक गूगल पर मिथिला के गांव ढूंढते हुए सीधे इनके घरों में पहुंच जाते हैं इसके बावजूद वे बहुत कम चित्र बनाती हैं पर जो बनाती हैं वो ऐतिहासिक कलाकृति हो जाती है । दो दर्जन पुरस्कारों से सम्मानित कलाकार को 2019 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया । अधिकतर मिथिला चित्रकारों की तरह ही इनका भी व्यक्तिगत जीवन बहुत ही कष्ट्रप्रद रहा है। पद्मश्री गोदावरी दत्ता बिहार , मधुबनी जिले की रांटी गाँव की निवासी हैं। मिथिला पेंटिंग के शुरूआती दौर के कलाकारों में से एक हैं l इनका जन्म बिहार के दरभंगा जिले के बहादुरपुर गांव में 7 नवंबर 1930 को हुआ था l गोदावरी दत्ता की औपचारिक शिक्षा सिर्फ नवीं कक्षा तक हुई। अपनी मां सुभद्रा देवी से इन्होने कला की पारम्परिक  शिक्षा पायी l  2018 में इन्होने 12  फ़ीट लम्बा और 18 फ़ीट चौड़ा कोहबर बनाया जो इन दिनों पटना के बिहार म्यूजियम , पटना में विद्युत बोर्ड की आर्ट गैलरी के लिए 6’×6’ साइज की एक पेंटिंग बनाई है प्रदर्शित है l जापानी कलाप्रेमी द्वारा संग्रहित इनकी कलाकृतियां जापान के मिथिला म्यूजियम में प्रदर्शित है l
      सन् 1989 से 1995 के बीच गोदावरी दत्ता ने 7 बार जापान की यात्रा की। श्रीमती दत्ता अब तक हजारों चित्रों की रचना कर चुकी हैं। लेकिन उन्हें सबसे अधिक प्रसिद्धि समुद्र मंथन, त्रिशूल, कोहबर, कृष्ण, डमरू, चक्र, बासुकीनाग, अर्द्धनारीश्वर और बोधिवृक्ष ने दिलायी है। श्रीमती दत्ता को शिव का त्रिशूल बेहद पसंद है, जो समूचे विश्व को सुरक्षित रखने या उसे नष्ट करने की अपरिमित क्षमता रखता है। इनके द्वारा बनाया गया 18 फीट लम्बा और 5 फीट चैड़ा त्रिशूल जापान के मिथिला म्यूजियम में प्रदर्शित है। श्रीमती दत्ता अब तक देश-विदेश के अनगिनत कला-सस्थानों द्वारा सम्मानित हो चुकी है। उन्हें बिहार सरकार का लाईफ टाईम एचीवमेंट पुरस्कार (2014), शिल्प गुरु (2006), राष्ट्रीय पुरस्कार (1980), राज्य पुरस्कार (1973) सहित लगभग चार दर्जन पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। 16 मार्च, 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इन्हें पदमश्री सम्मान से सम्मानित किया। गोदावरी दत्ता को पदमश्री सम्मान दिया जाना उस कलाकार का सम्मान है, जिसने पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग को बढ़ावा देने, उभरते कलाकारों को प्रशिक्षित करने और मार्गदर्शन देने में अपने सात रचनात्मक दशक लगा दिए।
    इस कार्यक्रम में कलाकार और कला लेखक रविंद्र दास के साथ उनसे सीधी बातचीत  की गई। साथ में मुख्य अतिथि मिथिला कला और उसके बाजार को भी करीब से जानने वाली कलाकार और वास्तुविद मनीषा झा ने भी उनके काम की बारीकियां एवम उनके कलाकृतियों के महत्व पर प्रकाश डाला । मनीषा झा एक चर्चित वास्तुशिल्पी हैं जिन्होंने अब मिथिला पेंटिंग चित्रकार के रूप में अपनी नई पहचान बनाई है । ये राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत स्वप्रसिक्षित कलाकार हैं l राघोपुर सहरसा बिहार में इनका जन्म हुआ इनके पिता भी एक चर्चित वास्तुशिल्पी हैं । अपनी दादी माता मंजू देवी को पेंटिंग बनाते देखकर बचपन से ही प्रेरित हुई । मिथिला कला का बेहतर बाजार बने इसके लिए इन्होंने दिल्ली में मधुबनी आर्ट सेंटर की स्थापना की । देश विदेश में इनकी पेंटिंग प्रदर्शित हो चुकी हैं ।अब तक इनकी कई पुस्तकें भी आ चुकी हैं । 
    मधुबनी शैली में बहुत ही बारीक रेखाओं से चित्र तैयार किये जाते हैं। पहले दीवारों पर अब समयानुसार बदलाव होने से कागज़ और कैनवास पर काम किये जाने लगे हैं। चटख जीवंत रंगों का प्रयोग और दृश्यों को बहुत ही सहज और सरल ढंग से रेखांकन इस शैली की प्रमुख विशेषता है। मिथिलांचल में शादी विवाह अन्य शुभ अवसरों पर महिलाएं मधुबनी चित्रों को बनाती हैं जिसमे देवी देवताओं,प्राकृतिक दृश्य, पेड़ पौधे, जीव जंतुओं मछलियां आदि की चित्रकारी करना इसका पारंपरिक रिवाज है।
     इस कार्यक्रम के जरिए गोदावरी दत्ता के कार्यशैली, उनके जीवन और मिथिला कला के बाजार को भी जानने का मौका मिला ।
    - भूपेंद्र कुमार अस्थाना 
    आर्टिस्ट, क्यूरेटर 
    अस्थाना आर्ट फ़ोरम, लखनऊ
    7011181273, 9452128267

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