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    धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था के प्रमाण हैं फखरूद्दीन | #NayaSaberaNetwork

    धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था के प्रमाण हैं फखरूद्दीन  | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    अजय पाण्डेय
    फखरुद्दीन अली अहमद (जन्म 13 मई 1905, मृत्यु 11 फरवरी, 1977) भारतवर्ष के पाँचवें राष्ट्रपति के रूप में जाने जाते हैं। इनका राष्ट्रपति चुना जाना भी भारतवर्ष की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था का एक ज्वलंत प्रमाण है। मुस्लिम वर्ग को स्वतंत्र भारत में सम्मान नहीं प्राप्त हो सकेगा। इस कल्पित आधार के कारण भारत का विभाजन किया गया था। मुस्लिम लीग सहित उसके नेताओं ने सत्ता लोलुपता के कारण परस्पर सौहार्द्र को भी भारी क्षति पहुंचाई थी लेकिन फखरुद्दीन अली अहमद के रूप में जब दूसरा मुस्लिम व्यक्ति भारत का राष्ट्रपति बना तो यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का विश्व में कोई सानी नहीं है।
    फखरुद्दीन अली अहमद राजनैतिक सफरः-
    फखरुद्दीन अहमद 1925 में इंग्लैंड में जवाहर लाल नेहरु से मिले। वे उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुए तभी से उन्होंने भारत की राजनीती से जुड़ने का फैसला कर लिया था। फखरुद्दीन अहमद नेहरू जी को अपना मेंटर मानते थे। इनके बीच में मित्रता भी अच्छी थी। फखरुद्दीन अहमद के राजनैतिक सफर की शुरुआत 1928 में भारत वापस आने के बाद तब हुई जब वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बने और थोड़े ही समय में वे नेहरू जी, सुभाष चंद्र बोस सहित अन्य कांग्रेस नेताओं के करीबी हो गए। इसके साथ ही वे स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े। 1935 में फखरुद्दीन अहमद असम प्रदेश कांग्रेस कमिटी के मुखिया के रूप में नियुक्त हुए। इसके बाद 1937 में वे असम लेजिस्लेटिव असेम्बली में मुस्लिम सीट से निर्वाचित हुए। वित्त और राजस्व मंत्री भी बने। इन्हें असम राज्य की बड़ी जिम्मेदारियां दी गई। कई बार उन्हें जेल यातनाएं भी सहन करनी पड़ीं। 1940 में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के साथ सत्याग्रह आन्दोलन में इन्होंने हिस्सा लिया जिसके लिए इन्हें जेल भी हुई।
    स्वतंत्रता के बाद फखरूद्दीन अहमद का राजनैतिक सफरः-
    आजादी के बाद 1952 में फखरुद्दीन अहमद राज्यसभा के सदस्य बन गए। इसके साथ ही उन्होंने असम के एडवोकेट जनरल का पदभार संभाला। जिस पद पर वे कुछ समय तक रहे। 1957 में उन्होंने यू.एन.ओ में भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व किया। इसके साथ ही नेहरु जी ने इन्हें कैबिनेट मंत्रिमंडल से जुड़ने को बोला। 1962 में वे फिर से असम विधानसभा के सदस्य बने। इस दौरान उन्होंने वित्त, कानून और पंचायत विभागों को संभाला। 1964 से 1974 तक वे कांग्रेस कार्य समिति और केन्द्रीय संसदीय बोर्ड में रहे। जनवरी 1966 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने केबिनेट में शामिल किया और उनको सिंचाई, शिक्षा, औद्योगिक विकास, कृषि एवं ऊर्जा मंत्रालय का कार्यभार दिया गया। इसके बाद असम उन्हें राज्यसभा की सीट मिल गई और वे संसद पहुँच गये। इन्होंने शिक्षा मंत्री के रूप में 14 नवम्बर 1966 से 12 मार्च 1967 तक कार्य किया। 1971 में बारपेटा निर्वाचन क्षेत्र से खरुद्दीन अहमद को लोकसभा सीट मिल गई और वे खाद्य मंत्री के रूप में नियुक्त हुये। 1974 तक उन्होंने इस पद पर कम किया।
    फखरुद्दीन अली अहमद सम्मानः-
    फखरुद्दीन अली अहमद की स्मृति में भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया गया। उन्हें कभी किसी एक भाषा को अहमियत देना सही नहीं लगा। उनके हिसाब से सरकार द्वारा किसी एक भाषा को तवज्जो देना गलत है। उनका कहना था कि जनता को यह निर्णय लेना चाहिए कि वह कौन सी भाषा बोलना चाहती है। भाषाओं को जबरन थोपना ठीक नहीं है। धर्मनिरपेक्ष नीति के लिए फखरुद्दीन अली अहमद को हमेशा याद किया जाएगा।

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