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    विकास और आत्मनिर्भर भारत के चमकते जुमले | #NayaSaberaNetwork

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    नया सबेरा नेटवर्क
    मोदी सरकार का सात साल का सफ़र
    मासूमा तलत सिद्दीकी
    हमेशा ये देखा गया है कि जब भी किसी बड़े नेता का कार्यकाल पूरा होता है तो बीते वर्ष उसके द्वारा किये गए अच्छे कामो को डेस्क पे सामने रखा जाता है अखबारों में बड़ी बड़ी हेडिंग में छापा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए-नए किरदारों से भरा सात साल का सफ़र तीस मई को पूरा हो रहा है। कुछ लोग उंगलियों पर गिनकर इन सात सालों को उदास होंगे तो कुछ लोग अंधभक्ति में लीन नज़र आएंगे। साफ़ तौर पे कह सकते हैं कि जिन लोगों ने सूद समेत ऋण चुकाया है इनके साथ सफ़र करने का वो लोग शायद जश्न नहीं मना पाएंगे। कोरोना महामारी के प्रकोप और लगातार हो रही मौतों के शोक में डूबा हुआ हिंदुस्तान भी निश्चित ही इस सालगिरह का जश्न नहीं मना पाएगा। गौर कीजिए न ज़रा सरकार और सत्तारूढ़ दल के पास तो ऐसा कुछ कर पाने के लिए वैसे भी अब बचा क्या है? लोगों ने जो ख़ून के आँसू इस महामारी में रोये हैं उनको देखते हुए कोई नैतिक अधिकार बाकी है क्या? जिसको देखते हुए जश्न की तैयारी की जाए। आये दिन टीवी पर अखबारों में मरने वालों की तादात नदियों में नालों में बिखरी हुई लाशों की तस्वीरों को जो दुनिया भर में दिखाया गया उसने मोदी की लोकप्रियता को काफी हद तक बहुत कम कर दिया है। शर्मसार होते भारत देश के लोग प्रधानमंत्री की लोकप्रियता की अब कोई बात नहीं करना चाहते। 2014 से 2021 तक हर साल इनकी लोकप्रियता के गिरते ग्राफ ने ही आज इनको 37 प्रतिशत के स्तर पर पहुंचा दिया है। इस गिरावट को लेकर आँकड़े अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन इतना तो तय है कि इनकी लोकप्रियता इस समय सात सालों के अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब काफी संख्या में मोदी और बीजेपी समर्थक आंख मूंद कर सपोर्ट करने से पीछे हटते नजर आ रहे हैं।"कांग्रेस मुक्त भारत अभियान" का नतीजा ये हुआ कि भाजपा सत्ता से खुद ही मुक्त होती नज़र आ रही है।
    जैसा कि बताया जा रहा है , केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के सात साल पूरे होने पर आगामी 30 मई को "सेवा ही संगठन है" के नाम से कार्यक्रम चलाया जायेगा। इसके तहत पार्टी कोरोना काल में गांव-गांव तक सोशल डिस्टेंस के तहत मास्क और सेनेटाइजर वितरण का अभियान चलाएगी। पार्टी अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से जिले के हर गांव और घर तक पहुंच कर लोगों को कोरोना वैक्सीन लेने के लिए जागरूक करेगी। साथ ही कोरोना वैक्सीन को लेकर विपक्ष की ओर से फैलाये जा रहे भ्रम को दूर करते हुए अधिकाधिक लोगों को वैक्सीनेशन से जोड़ कर कोरोना मुक्त समाज बनाने की दिशा में सकारात्मक पहल करेगी। शायद 30 मई न आया होता तो ये मेहरबानी भी याद न आई होती। जिन्होंने इनकी लापरवाही से अपनो को सदा के लिए खो दिया क्या उनको भी जिंदा करके घर वितरण किया जाएगा? जो काम पिछले साल ही शुरू करना चाहिए था वो अब क्यों याद आया इतना तो आप भी समझते हैं और हम भी। पिछले साल अक्टूबर नवंबर में भाजपा सरकार सेंट्रल विस्टा पास करवा रही थी उसका शिलान्यास हो रहा था फिर पश्चिम बंगाल में चुनाव की लड़ाई और रैली। इन सब महत्वपूर्ण कामों के बीच किसी ने याद भी तो नही दिलाया कि देश लाशों के ढ़ेर से जल रहा है, कुत्ते लाशों को नोच के खा रहे हैं। देखते- देखते 2024 आ जायेगा और फिर से मोदी जी भगवान बनके बैठ जाएंगे, अंधभक्त जय जय कार करेंगे और ठीकरा आसानी से विपक्ष पर फूट जाएगा। मोदी जी ,जब एक दशक से अधिक समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे थे तब भी उन सवालों के जवाब कभी नहीं मिले जो बतौर मुख्यमंत्री उन्हें देने चहिए थे। आज भी ये अहम सवाल है कि असली मोदी कौन है और क्या हैं ? ये प्रधानमंत्री पद पर किसके लिए बैठे हैं? मोदी अपने आपको किस देश का नेतृत्व करते हुए पाते हैं ? भारत का या किसी हिंदू भारत का ? मोदी भारत में प्रजातंत्र की रक्षा कर रहे हैं या उसका नाश कर रहे हैं ? क्या मोदी, जैसा कि वे अपने आपको एक सच्चा आर्थिक नवोन्मेषी बताते हैं, वैसे ही हैं या फिर  कट्टरपंथी धार्मिक राष्ट्रवादी, जो आधुनिकीकरण को अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने का हथियार बनाकर अपने प्रस्तावित सुधारों का लाभ एक वर्ग विशेष को पहुंचाना चाहता है? इन सब सवालों का जवाब क्या? क्या विपक्ष के लोगों को तैयारी करनी चाहिए ऐसे सवालों के जवाबों के लिए या वो जनता जो जल रही है राजनीति की ज्वाला में उसको ये जवाब देने होंगे। एक-एक सांस का हिसाब 30 मई को मोदी जी को देना होगा क्योकि वो ख़ुद को ऑक्सीजन सिलेंडर ही समझते हैं। देखा जाय तो हालात वो हो गये हैं कि समूची शासन व्यवस्था पर कब्जा जमा लेने के बाद लोगों के जीवन-मरण के लिए मोदी ऑक्सिजन की तरह काम कर रहे हैं। कोरोना तो 2 सालों से आया है उससे पहले हिन्दू राष्ट्र के नाम पर मॉब लीचिंग होना, जय श्री राम के नाम पर तबरेज़ जैसे कई लोगों की मौत, कश्मीर में 8 साल की आशिफा की रेप से मौत, गाय के नाम पर लोगों को काट देने की नई प्रथा की शुरुआत। क्या इन सब कत्लेआम का कोई हिसाब नहीं है? कोई जवाब नहीं है? या प्रधानमंत्री का ये काम ही नही है? ऐसा आत्मनिर्भर भारत बनाया की लोग अपनी पसंद न पसंद लोगों को चुन चुन कर मार रहे हैं। विकास के नाम पर हिंदुस्तान की बड़ी बड़ी इमारतों को बेचना, प्राइवेट करना, शहरों के नाम बदलना, अयोध्या में राम मंदिर बनवाना और हिन्दू मुसलमान को लड़ाना ये काम हुए हैं इन सात सालों में। सिर्फ़ कोरोना काल का नही बीते सारे साल का हिसाब आपको देना चाहिए मोदी जी। 
    सबसे बड़ी और प्रभावी भागीदारी बड़े औद्योगिक घराने, मीडिया प्रतिष्ठानों, मंत्रियों और अधिकारियों का साथ आपके लिए तो है ही लेकिन ज़रा सोच के बताइये कि वर्तमान व्यवस्था को किसी भी कीमत सभी तरफ़ से नाराज़ जनता के कोप से आख़िर कैसे बचाएंगे। जिन लोगों के बाज़ू अपनो की लाशों को ढोते-ढोते टूटने के कगार पर पहुँच गए क्या वो अब आपकी जयकार के लिए उठेंगे? क्या लोग हिंसक अराजकता और रक्तहीन एकदलीय तानाशाही के बीच आने वाले वक़्त में आपको दुबारा चुनना पसंद करेंगे? आज भारत के प्रधानमंत्री को अपने सात साल के सफ़र के बाद अगर किसी एक बात को लेकर चिंतित होना चाहिए कि हरेक नागरिक कोरोना से उपजने वाली प्रत्येक परेशानी और जलाई जाने वाली हरेक लाश के साथ उनके ही बारे में क्यों सोच रहा है ? ऐसा क्यों हो रहा है? सातवें साल का जश्न आपके सामने 700 सवाल खड़ा करता है। अब विपक्ष को कुछ कहने सुनने की ज़रूरत नही रही महामारी ने और बीते साल की तानाशाही ने जनता को ही विपक्ष में रुप मे बदल दिया है। प्रधानमंत्री चाहें भी  जनता को बोलने से रोक नहीं सकते उनका दल-बदल नहीं करवा सकते।  भावुक होकर मंच पर लोगों के सामने आंसू बहा कर दिखना कोई असरदार काम नही कर सकता। मौका मिलते आंसू बहा देने से गलतियां नहीं धुल सकती। लोगों के उस यक़ीन को वापस लाने के लिए सोचिए जो शुरू में लोग करते थे। जश्न का क्या है वो तो 2024 में सेंट्रल विस्टा बन जाने के बाद भी 10 साल पूरे होने पर मना लिया जाएगा।


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