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    कहानी-पुराना पीपल | #NayaSaberaNetwork

    कहानी-पुराना पीपल  | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    कोविड का नया स्वरूप कितना खतरनाक है। पिछले स्ट्रेन में इसने शहर को ही अपने आगोश में लिया था परंतु इस बार गांवों को लील लेने वाली इसकी मंशा भयावह हो चली है। नये स्ट्रेन के आगमन के साथ ही रोजमर्रा के कामगार शहर छोड़ गांवों में आ गये हैं। सुरक्षा की उम्मीद लिये आये इन कामगारों को क्या पता कि इस बार गांवों में भी कोविड का तांडव चल रहा है। चारपाई पर लेटा मैं अपने आप से ही फुसफुसा रहा था। चन्द्रमा की शीतल छाया मानो मुझ पर वज्रपात कर रही हो। कोस दो कोस तक के हर गांव में कोरोना मरीजों की बाढ़ आ चुकी है। मेरे गांव में भी संक्रमित लोगों की संख्या में काफी इजाफा हो गया है। पिछले 15 दिनों में मौतों का आंकड़ा 20 हो चुका है। प्रवीण की मां के निधन ने तो मानवता को भी शर्मशार कर दिया। आक्सीजन के कमी से उनकी मौत होने पर हास्पिटल वालों ने उन्हें आनन-फानन में डिस्चार्ज कर दिया। प्रवीण इसकी सूचना जब पड़ोसियों को देना चाहा तो अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने के डर से लोगों ने फोन ही नहीं उठाया। इसे संवेदनहीनता कहूं या संक्रमण का खौफ, समझ नहीं आ रहा। करवटें बदलने पर भी मेरी बेचैनी कम नही हो रही थी।
    नवजवानों की मौत से पूरे गांव में मातम छाया है। राधेश्याम के छोटे बेटे को ही देखूं तो बांका-छरहरा नवजवान कितने जल्दी ईश्वर को प्यारा हो गया। पिछले महीने ही उसे बेटी हुयी थी, घर में आयी लक्ष्मी की एक झलक पाने के लिये वह जैसे तैसे दिल्ली से गांव आया था। उसे क्या पता था कि मौत भी उसके साथ कदमताल कर गांव आ चुकी थी। घर आने के दो ही दिन बाद उसमें कोविड के सिम्पटम (लक्षण) आ गये, आक्सीजन लेवल घटने पर उसे हास्पिटलाइज किया गया और दो ही दिन बाद फेफड़े में संक्रमण बढ़ने से उसकी इह लीला समाप्त हो गयी। आंखों  में यही उधेड़ बुन लिये मैं अधीर हुआ जा रहा था। महादेव भी हम पर कृपा नहीं कर रहे। पात्रों और कुपात्रों में भेद रखने वाले रुद्र आखिर हमपर इतने रौद्र क्यूं हो गयें......? देर रात तक मुझे सिर्फ यह अफसोस होता रहा कि प्रकृति की एक-एक सर्वसुलभ चीजों के लिये आज कितना मशक्कत करना पड़ रहा है। पहले पानी बिकी और अब हवा। यह सच है कि हमने प्रकृति के साथ दुर्व्यवहार किया है। बेवजह भूजल दोहन किया है। पेड़ों को काटकर पर्यावरण को प्रभावित किया है। सारी रात मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो यही सोचता रहा कि वृक्ष हमारे जीवन के लिये कितना जरूरी है। हर मुहल्ले में पीपल, नीम व बरगद इत्यादि के पेड़ होने चाहिए।
    मेरे मुहल्ले में भी तो था पुराना पीपल का पेड़। बचपन में मैं मां के साथ जाया करता था जल चढ़ाने। कितना हरा-भरा था तब वह। मेरी जवानी और पीपल के उम्र का ढलान दोनों साथ हुआ। अब तो डालियां गिर चुकी हैं। लोग जल देना भी बंद कर दिये हैं। टूटे चबूतरे पर स्थित 25-30 फीट ऊंचे उस बूढ़े पीपल में किसी को आस्था न रही। घास और कंटीले झाड़ियों के बीच अब वहां सिर्फ जहरीले जंतुओं का ही रहवास है। कोरोना के खौफ ने अकारण ही मेरे अंदर उस वृक्ष के प्रति प्रेम पैदा कर दिया। मैं मन ही मन सोचने लगा कि मेहनतकश किसानों के लिये आक्सीजन प्लांट क्या है? सिलेंडरों में भरें आक्सीजन हममें से कुछ को जीवन दे सकते हैं परंतु उन सिलेंडरों के रीफिलिंग के लिये तो हमें प्रकृति से ही आक्सीजन लेना पड़ेगा। उसी प्रकृति से जिसे हम जोर-शोर से नष्ट कर रहे हैं। वृक्ष कितने महत्वपूर्ण हैं, मुझे यह समझ आने लगा। मैंने मन ही मन संकल्प किया कि सुबह उठकर उस पुराने पीपल को बचाने का प्रयत्न करूंगा। साथ ही अभियान चलाकर प्रकृति को बचाने और पेड़ लगाने का आवाहन करूंगा। बताऊंगा कि कैसे हम इन छोटी-छोटी कड़ियों से कोरोना व इसके जैसी अन्य खतरनाक बीमारियों से बच सकते हैं।
    सुबह उठकर मैंने ऐसा ही किया, गांव के व्हाट्सऐप ग्रुप में अपना विचार साझा किया। इसके बाद शुरू हुआ सवाल जवाब का सिलसिला। पर्यावरण से कोरोना का क्या कनेक्शन.....? विशाल का कौतुहल भरा प्रश्न। मैंने धैर्यपूर्वक जवाब दिया। कोरोना एक ऐसा वायरस है जिसका नया म्यूटेंट व्यक्ति के इम्यूनिटी सिस्टम और आक्सीजन लेवल को प्रभावित कर रहा है। इससे बचने के लिये देश और विदेश के तमाम डाक्टरों ने प्राकृतिक चीजों यथा गिलोय इत्यादि के सेवन का आह्वान किया और बताया कि यही चीजें हमारे इम्यून सिस्टम को बूस्ट कर सकती है। ........तो मतलब पेड़ लगाकर हम कोरोना से बच सकते है? उसने मानो चुटकी लेते हुए मुझसे यह प्रश्न किया हो। मेरा जवाब था- अगर आप कोरोना संक्रमित होते हैं तो प्रीकाशन ही आपको बचा सकता है। कोरोना की अभी तक कोई दवा नहीं आई है परंतु हां पेड़ और प्राकृतिक वातावरण हमें एक सकारात्मक ऊर्जा देगी जिससे हमारा इम्यून सिस्टम कमजोर नहीं पड़ेगा और हम धैर्य के साथ संक्रमित होने के बाद भी कोरोना से लड़कर स्वस्थ हो सकते हैं। क्योंकि सकारात्मक विचार भी दवा के जैसा होता है। अगर हम अंत समय तक यह मानें कि हम कोरोना से लड़कर जंग जीत जायेंगे तो निश्चित रूप से ऐसा ही होगा। यह काम तो सरकार को करना चाहिए?
    यह समय सरकार और सरकारी तंत्र पर दोष मढ़ने का नहीं है। जिस तरह हमें अपने अधिकारों का ज्ञान होता है, उसी तरह हमें अपने कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए। इस बहस के अगले कुछ घंटों बाद जब मैं उस पुराने पीपल के पास पहुंचा तो पाया कि गांव के कुछ नवजवान मुंह पर मास्क, हांथों में ग्लब्स और फावड़ा लिये पेड़ के आस-पास सफाई में जुटे थे। मैंने पहुंचकर सबकों सोशल डिस्टेंसिंग के साथ श्रमदान करने को प्रेरित किया। देखते ही देखते वह जगह गुलजार हो गया। हम सबने आपस में पैसे इकट्ठा कर वहां समर्सिबल पंप लगवाया और बचे हुए पैसों से और पेड़ लाकर आस-पास लगाया। हमारा यह अभियान गांव से होता हुआ क्षेत्र और फिर जिले तक फैल गया। बात मीडिया तक पहुंची, विभिन्न पत्रकारों ने प्रमुखता से इस खबर को स्थान दिया जिसके बाद लोगों ने भी बढ़-चढ़कर इस अभियान में साथ दिया। शायद कोरोना के खौफ से डरे लोग इस काम में हाथ बंटाकर आत्मसंतोष महसूस कर रहे थे। संभवतः उन्हें, ईश्वर और प्रकृति दोनों को खुश करने का एक माध्यम मिल चुका था। हमारे इस अभियान ने शायद महादेव को पिघला दिया। सरकार के सक्रिय कदमों से कोविड के ताजा आंकड़ों में कमी होना शुरू हो गया। मौतों का आंकड़ा कम होने लगा। मरीजों के रिकवरी रेट में तेजी से वृद्धि होने लगा। हमारे गांव में भी अब गिने-चुने लोग संक्रमित रह गये। कुछ का इलाज अस्पताल में तो कुछ का होम आइसोलेशन में चल रहा था। हमारे इस अभियान की खबरें और फोटो उन मरीजों तक व्हाट्सऐप के जरिए भेजा गया। गांव के लोगों का उत्साह देख संक्रमित मरीजों की जिजीविषा उन्हें कोरोना से लड़ने और उसे हराने का साहस दे रही थी।
    प्रतीक पाण्डेय
    हरिहरपुर, डोभी, जौनपुर।

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