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    जन्मपूर्व लिंग निर्धारण एक गंभीर अपराध - जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ की | #NayaSaberaNetwork

    जन्मपूर्व लिंग निर्धारण एक गंभीर अपराध - जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ की   | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    हमें अपने समाज में बेटे और बेटियों में कोई फर्क नहीं, यह मानसिकता हर नागरिक में लाना जरूरी - एड किशन भावनानी
    गोंदिया - भारत में अगर दशकों पहले की बात करें तो बेटे और बेटियों में फर्क की खाई बहुत बड़ी थी परंतु सरकारों, बुद्धिजीवियों, स्वास्थ्य मंत्रालय, और इस क्षेत्र में सेवाएं देने वाले सभी वर्गों की सतर्कता, कड़े कानून बनाने, कानूनों में संशोधन कर कड़ी धाराएं जोड़ने और जनजागरण अभियान चलाने, की परिणिति हुई कि बहुत हद तक सफलता प्राप्त हुई। परंतु अभी भी पूरी तरह से बेटे बेटियों में समानता वाली मानसिकता नागरिकों में नहीं आ पाई है। 1991 के सेंसेक्स के अनुसार प्रति हजार पुरुषों के पीछे 927 महिलाएं हैंl हालांकि वैश्विक स्तर पर महिला पुरुषों के सेंसेक्स में की खाई कम करने के जोरदार प्रयास चल रहे हैं। परंतु यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब वैश्विक व भारत स्तर पर  नागरिकों की बेटे बेटियों में कोई फर्क नहीं, की मानसिकता जागृत होगी। वर्तमान समय में तकनीकी का बहुत विकास होने के कारण गर्भधारण के शुरुआती दिनों में ही सोनोग्राफी के माध्यम से भ्रूण में ही पता चल जाता है कि लड़का है लड़की, ऐसी मानसिकता वाले भ्रूण हत्या का कदम उठाते हैं, जिसमें तथाकथित कुछ स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कुमानसिकता वाले व्यक्तियों का साथ भी इस प्रक्रिया में रहता है। हालांकि सरकार द्वारा भारतीय दंड संहिता, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 और प्री कॉन्सेप्ट एंड प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (रेगुलेशन एंड प्रिवेंशन ऑफ मिस्यूज) अधिनियम, 1994 के प्रावधानों को बहुत कड़ाई के साथ लागू किया गया है। लेकिन फिर भी किसी न किसी रूप में यह कुप्रथा चालू है। जिसका उदाहरण दिनांक 21 जनवरी 2021 को माननीय सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति मोहन एम.शांतानागौदर, माननीय न्यायमूर्ति विनीत सारण व माननीय न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की बेंच के सम्मुख स्पेशल लीव पिटिशन(क्रिमिनल)क्रमांक 380/ 2021 याचिकाकर्ता बनाम मध्यप्रदेश राज्य के रूप में आया। जो 7 दिसंबर 2020 के मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से एनसीआरसी क्रमांक 48262/2020 से उदय हुई थी। आदेश कॉपी के अनुसार माननीय बेंच ने याचिकाकर्ता की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बेंच ने कहा जिस प्रकार के प्रथम दृष्टया सबूत की उपस्थिति रिकॉर्ड पर हैं, को देखते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को सही पाया है वर्तमान मामले में जांच एजेंसी टीम ने सोनोग्राफी मशीन को जप्त कर लिया है और अनेक परिस्थिति जन्य सबूत मौजूद हैं। हालांकि वोलुआंट्रीहेल्थ एसोसिएशन बनाम पंजाब राज्य में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता के लिए खुला है कि वह ट्रायलकोर्ट में 1 वर्ष के भीतर ट्रायल को पूरा कराने की याचिका दे सकता हैं। माननीय बेंच ने अपने आठ नंबर पॉइंट में कहा कि, हम स्पष्ट करते हैं कि उपलब्ध तथ्यों पर उपरोक्त टिप्पणियां बनाई गई है केवल वर्तमान याचिका का निर्णय करने के लिए, यह मुकदमे को पूरा करने के लिए तथ्य विचारण रास्ते में नहीं आएंगे और मामले का फैसला निचली अदालत द्वारा तय किया जाएगा। बेंच ने आदेश कॉपी में आगे कहा कि जन्मपूर्व लिंग निर्धारण समाज के लिए गंभीर परिणाम के साथ गंभीर अपराध है। बेंच ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कोर्ट ने आरोपी द्वारा दायर अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी थी।बेंच कहा,हमें अपने समाज से कन्या भ्रूण हत्या और बालिकाओं के प्रति अमानवीयता को खत्म करने के लिए सख्त दृष्टिकोण अपनाना होगा। आरोपी पर भारतीय दंड संहिता, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 और प्री कॉन्सेप्ट एंड प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (रेगुलेशन एंड प्रिवेंशन ऑफ मिस्यूज) अधिनियम,1994 के प्रावधानों के तहत कथित तौर पर गैरकानूनी लिंग निर्धारण और सेक्स चयनात्मक गर्भपात चिकित्सा पद्धतियों के संचालन का आरोप लगा था। स्पेशल लीव पिटीशन को खारिज करते हुए,बेंच पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट के विधायी इतिहास का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम भारत में पुरुष बच्चे के लिए वरीयता के एक सांस्कृतिक इतिहास से मजबूर था, जो धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक कारकों के पितृसत्तात्मक क्रम में निहित था। अधिनियम के तहत दायर आपराधिक मामलों के बारे में विभिन्न रिपोर्टों का हवाला देते हुए, बेंच ने कहा कि ये खतरनाक प्रथाएं अभी भी व्याप्त हैं। बेंच ने कहा कि इस अनैतिक प्रथा की निरंतरता, विश्व स्तर पर साझा समझ यह बताती है कि यह महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक रूप है। इसके साथ ही लैंगिग समानता और गरिमा को बनाए रखने की हमारी क्षमता को नुकसान पहुंचाती है, जो हमारे संविधान की आधारशिला है। जन्मपूर्व लिंग निर्धारण एक पूरे के रूप में समाज के लिए गंभीर परिणामों के साथ गंभीर अपराध है। कोर्ट ने उल्लेख किया कि तत्काल मामले में जांच करने वाली टीम ने सोनोग्राफी मशीन को जब्त कर लिया है और आरोपियों के खिलाफ एक मजबूत अपराध का मामला बना है।अदालत ने यह भी कहा कि सामग्री ऑन रिकॉर्ड यह बताती है कि लिंग निर्धारण और सेक्स-चयनात्मक गर्भपात की कथित अवैध चिकित्सा पद्धतियों के संचालन में उनकी सक्रिय भूमिका थी। बेंच ने कहा कि बिना किसी पंजीकरण या लाइसेंस वाली एक अल्ट्रासाउंड मशीन, लिंग-निर्धारण में इस्तेमाल किए जाने वाले लीक्विड और गर्भपात और लिंग-निर्धारण के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले अन्य चिकित्सा उपकरणों को जब्त कर लिया गया था।अपील खारिज करते हुए अदालत ने कहा,इस स्तर पर कोई ढिलाई नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि यह धारणा प्रबल हो सकती है कि पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट केवल एक कागजी शेर है और यह कि क्लीनिक और प्रयोगशालाएं लिंग-निर्धारण और भ्रूण हत्या को अंजाम दिया जा सकता है। यदि हम अपने समाज की बालिकाओं के प्रति कन्या भ्रूण हत्या और कुरीतियों को खत्म करना चाहते हैं तो एक सख्त दृष्टिकोण अपनाना होगा।
    संकलनकर्ता कर विशेषज्ञ एड किशन भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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