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    पंचायती तलाक की कानून की दृष्टि में कोई मान्यता नहीं - हिंदू विवाह अधिनियम लागू होने के बाद इसका अस्तित्व समाप्त - हाई कोर्ट | #NayaSaberaNetwork

    पंचायती तलाक की कानून की दृष्टि में कोई मान्यता नहीं - हिंदू विवाह अधिनियम लागू होने के बाद इसका अस्तित्व समाप्त - हाई कोर्ट   | #NayaSaberaNetwork


    नया सबेरा नेटवर्क
    गांवों, ग्राम पंचायतों, शहरी पंचायतों व सामाजिक पंचायतों में तलाक रोकने शासकीय सहयोग से जनजागरण अभियान चलाने की जरूरत - एड किशन भावनानी
    गोंदिया - भारत हर क्षेत्र में बहुत तेजी के साथ उन्नति कर, विकास की राह में तीव्र गति से बढ़ रहा है और आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को वैश्विक स्तर पर दृढ़ता के साथ देखा जा रहा है, जो तारीफ ए काबिल है। वहीं दूसरी ओर देखा जाए तो आज भारत के नागरिकों का जीवन स्तर भी तीव्र गति से सुधर रहा है। नागरिकों की सोच, व्यवहार, काम करने की स्टाइल, इत्यादि सभी आधुनिकता की ओर तीव्र गति से बढ़ रही हैं। परंतु कुछ विचारधाराए सामाजिक स्तर पर ऐसी भी है, जो पौराणिक जमाने की सोच पर आधारित  क्रियाकल्प अभी भी चालू है। जिसमें सबसे प्रमुख है, तलाक का मामला, हालांकि तलाक के संबंध में फैमिली कोर्ट और आगे भी उच्चस्तर कि न्यायपालिका भी हैं और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 एक पूर्ण संहिता है और मुस्लिम धर्म के लिए भी अनेक संहिता बने हैं, उसी प्रकार हर नागरिक के लिए कानूनी विकल्प खुले खुले हुए हैं, फिर भी विवाह तलाक के संबंध में ऐसे बहुतेक केस हैं, जो अलग-अलग धर्म जातियों की पंचायतों के स्तर पर आपसी समझौते, एक सादे कागज पर लिखकर या ₹100 के स्टांप पेपर पर लिख कर या पंचायत के रजिस्टर में लिख कर इत्यादि अनेक तरीकों से तलाक की कार्रवाई पूरी की जाती है, जो विधि विधान विरूद्ध व अमान्य है। यह बात इससे संबंधित नागरिकों व पंचायतों को शासकीय सहयोग से जनजागरण अभियान चालू कर समझाना होगा, यह जनजागृति हर गांव, हर ग्राम पंचायत, शहरी पंचायतों व सामाजिक पंचायत स्तर पर एक अभियान चलाकर जागृति करना होगा। इसमें कई पंचायतों को पंचायती तलाक कानूनी दृष्टि मैं इसकी कोई मान्यता नहीं, यह शायद पता भी नहीं हो? क्योंकि कुछ मामलों से इस प्रकार के केस पारिवारिक न्यायालयों में आने लगे हैं। मैंने खुद व्यक्तिगत रूप से कुछ सामाजिक पंचायतों से भी बात की तो इस प्रकार के पंचायती तलाकों में हामी भरी, परंतु इसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं, इससे वे अनभिज्ञ दिखे।.....इसी प्रकार का एक मामला दिनांक 27 जनवरी 2021 को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए माननीय पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के सिंगल बेंच जज माननीय न्यायमूर्ति अलका सरीन की बेंच के सम्मुख, सीआर रिट पिटिशन क्रमांक 763/2021 o&m याचिकाकर्ता बनाम पंजाब राज्य के रूप में आया जिसमें माननीय बेंच ने अपने चार पृष्ठों के आदेश में कहा, पंचायती तलाक' में कोई कानूनी पवित्रता नहीं, इस तरह के रिवाज हिंदू विवाह अधिनियम के गठन के बाद अस्तित्व में नहीं रहे।यह देखते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 एक पूर्ण संहिता है और विवाह की शर्तों के साथ-साथ तलाक की प्रक्रिया भी प्रदान करता है, बेंच ने स्पष्ट किया कि 'पंचायती' तलाक की कानून दृष्टि में कोई मान्यता नहीं है। माननीय बेंच ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 4 के मद्देनजर सभी रिवाज जैसे 'पंचायती' तलाक और इससे संबंधित प्रचलन का प्रभाव समाप्त हो गया है। न्यायालय के समक्ष मामला अदालत एक आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें याचिकाकर्ताओं (दोनों बालिग) के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिवादी नंबर 2 से 4 को निर्देश देने की मांग की गई थी ताकि उन्हें पुलिस सहायता प्रदान की जा सके। आगे यह भी आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता नंबर 2 के रिश्तेदार याचिकाकर्ताओं के रिश्ते के खिलाफ हैं और याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उनको अपने जीवन और स्वतंत्रता के लिए खतरा महसूस हो रहा है।याचिकाकर्ताओं ने 21 जनवरी 2021 को सिख संस्कार और सेरमोनी के अनुसार गुरुद्वारा दशमेश पीता, खार में शादी कर ली थी। यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता नंबर 1 की शादी पहले एक अन्य से हुई थी और उसने 19 जून 2017 को एक पंचायती तलाक ले लिया था, जबकि याचिकाकर्ता नंबर 2 ने पहले एक अन्य से शादी की थी और उसने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 बी के तहत तलाक ले लिया था,इस संबंध में अदालत ने 14 जुलाई 2000 को एक डिक्री पारित की थी। न्यायालय का अवलोकन जब याचिकाकर्ता नंबर 1, की वैवाहिक स्थिति के बारे में याचिकाकर्ताओं के लिए वकील से प्रश्न पूछा गया तो उसने बताया कि उसे पंचायती तलाक मिला है। इस पर कोर्ट ने कहा, अजीब बात है, वकील एक पंचायती तलाक पर भरोसा कर रहा है जिसकी कानून की नजर में कोई मान्यता नहीं है। सक्षम न्यायालय द्वारा याचिकाकर्ता नंबर 1 की शादी को भंग करने का कोई निर्णय नहीं दिया गया है और उसकी पहली शादी कानून की नजर में अभी कायम है। कोर्ट ने आगे कहा - याचिकाकर्ताओं का वकील यह दिखाने मेंभी सक्षम नहीं है कि यह अदालत याचिकाकर्ताओं को एक जोड़े के रूप में सुरक्षा कैसे प्रदान कर सकती है,जब याचिकाकर्ता नंबर 1 ने कानूनी रूप से अपनी पहली पत्नी को तलाक नहीं दिया है। बताया गया है कि याचिकाकर्ता नंबर 1 और 2 ने कथित तौर पर शादी कर ली है,जबकि याचिकाकर्ता नंबर 1 के अपनी पहली पत्नी से कानूनी रूप से वैध तलाक नहीं लिया है। कोर्ट का आदेश यह देखते हुए कि याचिकाकर्ताओं ने अपने जीवन की सुरक्षा और एक दंपति के रूप में जीवन जीने की स्वतंत्रता के लिए इस न्यायालय से संपर्क किया है, जिसे वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में नहीं माना जा सकता है,न्यायालय ने कहा, हालांकि याचिकाकर्ताओं को एक व्यक्ति के रूप में, अगर अपने जीवन या स्वतंत्रता के लिए खतरा महसूस होता है तो वे अपने जीवन और स्वतंत्रता के खतरों के बारे में अपनी आशंकाओं के निवारण के लिए पुलिस से संपर्क करने के हकदार होंगे। इस प्रकार याचिकाकर्ताओं की तरफ से दायर याचिका अनुरक्षणीय नहीं है क्योंकि याचिकाकर्ता नंबर 1 द्वारा वैध तलाक लिए बिना ही याचिकाकर्ताओं ने शादी कर ली है। यह मानते हुए कोर्ट ने कहा कि, याचिकाकर्ता, व्यक्तियों के रूप में, हमेशा अपने जीवन और स्वतंत्रता के खतरों के बारे में अपनी आशंकाओं के निवारण के लिए संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से संपर्क करने के लिए स्वतंत्रता में होंगे। अंत में, न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को कानून के अनुसार उनके प्रतिनिधित्व (अगर प्रतिनिधित्व सौंपा जाता है) पर विचार करने का निर्देश दिया है।
    संकलनकर्ता कर विशेषज्ञ एड किशन भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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