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    पढ़िए डोली उठाने वाले कहारों का दर्द, जब तक खत्म हो गयी परम्परा तो अब क्या कर रहे हैं कहार | #NayaSaberaNetwork

    हाजी जियाउद्दीन
    जौनपुर। कुछ दशक पहले तक शान की सवारी समझी जाने वाली डोली पालकी चौपाल नालकी विकास के युग में  अतीत का हिस्सा बन गई है। दशकों पहले राजा महाराजाओं और जमीदारों के यहां पालकी आदि ढोने के लिए मजदूर हुआ करते थे और जब कभी राजा महाराजाओं के अलावा उनके परिवार वालों को कहीं जाना होता था तो इन्हीं सवारियों पर बैठकर एक जगह से दूसरी जगह जाया करते थे। देश आजाद हुआ तो जमींदारी प्रथा टूट गई और फिर डोली व पालकी का चलन रीति रिवाज के अलावा शादी विवाह के मौके पर पालकी से दुल्हन को ढोने और बहुत से घरों की सवारियों को एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाने का काम शुरू हो गया। यह सिलसिला 80 तक चलता रहा। समय के साथ साथ यह समाप्त हो गया और डोली भारतीय संस्कृत की अतीत का हिस्सा बन गए हैं। नई   पीढ़ियां जहां इस सवारी से अनभिज्ञ हैं वहीं कुछ लोगों के जेहन में पालकी की याद रह गई है।
    पढ़िए डोली उठाने वाले कहारों का दर्द, जब तक खत्म हो गयी परम्परा तो अब क्या कर रहे हैं कहार | #NayaSaberaNetwork
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    खेतासराय क्षेत्र के मनीषा गांव निवासी रामजीत बनवासी उम्र 75 साल बताते हैं कि डोली पालकी हल्की लकड़ी की बना करती थी। जिसमें दूल्हा दुल्हन के बैठने का इंतजाम हुआ करता था। डोली को उठाने के लिए 4, 6, 8 आदमियों की जरूरत हुआ करती थी। सबसे खास बात यह थी कि 2 फीट की दूरी में दो लोग डोली उठाकर चला करते थे लेकिन किसी का पैर किसी से टच नहीं हुआ करता था हम लोग जनपद के अलावा आजमगढ़, बनारस, सुल्तानपुर, फैजाबाद आदि जिलों में विवाह के मौके पर दूल्हे को लेकर जाया करते थे और फिर वहां से दुल्हन की विदाई कराकर दूल्हा और दुल्हन को साथ लाते थे। हम लोग 50 मील से ज्यादा तक की दूरी तक डोली उठाकर जाया करते थे हमें किसी तरह की कोई थकावट नहीं होती थी। रास्ते में अपनी जरूरत के मुताबिक दाना पानी कर लिया करते थे। मजदूरी के तौर पर हमें खाने के लिए राशन और पैसे मिल जाया करते थे जो हम लोग आपस में बांट लेते थे।

    उन्होंने कहा कि एक अंदाजे के मुताबिक डोली दूल्हा को मिला कर 2 कुंटल के आसपास वजन हो जाया करता था  दुल्हन दूल्हा पूर्ण रूप से हम लोगों की सुरक्षा घेरे में हुआ करते थे। खतरा होने पर दुल्हन से जेवर लेकर अपने कमर में बांध लिया करते थे। ताकि जब कोई चोर उचक्का मिले उससे मुकाबला कर दुल्हन की दूल्हे की सुरक्षा की जा सके।

    उन्होंने बताया कि पालकी की बनावट और सजावट में फर्क होता था। पालकी में दोनों तरफ खिड़कियां लगी हुआ करती थी। डोर स्लाइडिंग के होते थे जिसमें तकिया के अलावा बैठने का साजो सामान लगा रहता था। डोली के मुकाबले पालकी सजी रहती थी। कहीं कुआं वगैरह मिलने पर पानी पीकर थोड़ा आराम करते और फिर अपने सफर पर निकल जाया करते थे। उसी गांव के फूलचंद 78 वर्ष ने बताया कि चौपाल खटोली में बांस बांधकर बनाया जाता था। कपड़ा बांधकर ऊपर से पर्दा डाल दिया जाता था। चौपाल को भी चार आदमी ढोया करते थे। फूलचंद के मुताबिक पालकी डोली चौपाल वगैरह को जो लोग उठाकर आगे चलते थे। वह गड्ढा या उबड़ खाबड़ जमीन आने पर कोड वर्ड में बात किया करते थे तो पीछे वाला समझ जाया करता था जैसे जब कहीं चढ़ाना आती थी तो आगे वाला पंजाबल कहता था उसके कहना अनुसार पीछे वाला जोर लगाता था। ढुलान होने पर लटक गई कहने पर पीछे वाला संभल जाता था। इस तरह हम लोग अपने गंतव्य तक पहुंच जाया करते थे हम दूल्हा व दुल्हन को अपनी सुरक्षा में पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध रहा करते थे। हम दुल्हन को अपने घर की इज्जत मानकर हमेशा अपने प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार रह रहा करते थे और प्रतिज्ञा लेते हुए उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाते थे। दूरी के एतबार से हम लोग दूल्हे को उसके घर से उठाते थे ताकि दुल्हन के घर समय से पहुंचकर विवाह की तमाम रीत रिवाज पूरी कराई जा सके। 

    उन्होंने कहा कि हमने से कुछ लोगों के पास अपनी डोली होती थी जिसका हम भाड़ा लेते थे कुछ जमीदारों के पास कुछ उनके पास भी डोली होती थी। कुछ लोग पुण्य समझ कर के डोली दे दिया करते थे तो कुछ लोग भाड़ा लिया करते थे। उन्होंने कहा कि अब डोली ढोने का काम खत्म हो चुका है। अब हम लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। काम खत्म होने से हमारा पुश्तैनी काम खत्म हो चुका है।

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