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    लाखों लोगों की आजीविका के स्रोत होते हैं भारतीय मेले | #NayaSaberaNetwork

    हाजी जियाउद्दीन
    जौनपुर।
    देश के अधिकांश भागों में प्राचीन काल से आयोजित होने वाले मेले जहाँ वे भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। वहीं इन मेलों को गंगा-जमुनी परंपराओं का प्रतीक माना जाता है। क्षेत्र में लगने वाले मेलों में शामिल होने वालों में सभी धर्मों के लोगों की संख्याएं अधिक हुआ करती हैं जो विभिन्न मज़ारों पर जाकर मिन्नतें-मुरादें माँगते हैं। मेला लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत होते हैं। कुछ मेलों से क्षेत्रों की पहचान होती है। कुछ क्षेत्रों में लगने वाले मेलों का अपना एक इतिहास और परंपरा रही है। 

    लाखों लोगों की आजीविका के स्रोत होते हैं भारतीय मेले | #NayaSaberaNetwork

    मेला का शब्दार्थ एक दूसरे से मिलन है। कुछ दशक पहले तक हिंदी सिनेमा में मेलों में अभिनेता अभिनेत्रियों का मिलन होता था तो किसी सिनेमा में मेले में डाकू विस्फोट करते थे तो कुछ सिनेमा में मेलों में अभिनेता अभिनेत्रियों का प्रेम परवान चढ़ता था। मेलों का अपना इतिहास और परंपराएं होती हैं। कहा जाता है कि कजगांव और राजेपुर के लोग दोनों गांवों की सीमाओं पर मिलकर एक-दूसरे के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं जिसको कजरी मेला कहा जाता है। तो वहीं मनेक्षा गांव स्थित गाज़ी मियां के मेले में आल्हा, पचरा व कजरी गाकर उत्साहित होते हैं जिसमें सभी धर्मों के लोग उपस्थित रहते हैं।

    मज़ार से सटे तालाब में कुष्ठ रोगी ठीक होने के लिए स्नान करते हैं। कुछ मेलों में जहाँ दर्शक पहलवानों के शरीर को देखकर उत्साहित हो जाते थे और अपनी क्षमता से बढ़कर पुरस्कार देते थे तो वहीं कुछ मेलों में जानवर, खेती के उपकरण, सर्कस, झूला, सौंदर्य प्रसाधन व बच्चों के खिलौनों के सिवा खाने-पीने की दुकानें खूब सजा करती हैं। मेला का नाम लेते ही बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता था हालांकि अधिकतर मेला  को समाप्त कराने के लिए मेला प्रशासन को पुलिस प्रशासन की सहायता लेनी पड़ती है।

    विकास के इस युग में शहरी क्षेत्रों में लगने वाले मेलों में लोगों की रु चि कम हुई है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ गांव में लगने वाले मेले लुप्त होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ गांवों में लगने वाले मेलों में आज के युग में भी अतिथियों की बड़ी संख्या होती है और अतिथि मेला को देखने के लिए पहुंचते हैं लेकिन कुछ मेलों में कुश्ती प्रतियोगिताओं और कबड्डी, आल्हा, पचरा, कजरी, बिरहा गायन की परम्पराएं समाप्त होती जा रही हैं। जबकि इन सभी कलाओं का पूर्वांचल क्षेत्र में अपना एक अलग स्थान था। शासन की ओर से अगर इन कलाकारों पर ध्यान न दिया गया तो ये अतीत का हिस्सा बन जाएंगे।
    फखरु द्दीन
    फखरु द्दीन 

    खेतासराय थाना क्षेत्र के गांव सय्यद गोरारी निवासी फखरु द्दीन ने बताया कि मेरे गांव के दर्जनों लोग मेलों में दुकान लगाते हैं और बाक़ी समय में मेहनत-मज़दूरी करते हैं। यही हमारे लिए आजीविका का स्रोत है। फखरु द्दीन ने बताया कि हर मेला का अपना इतिहास और परंपरा होती है। क्षेत्र में दर्जनों मेले लगते हैं। जिनमें सय्यद सालार मसूद ग़ाज़ी मियां का मेला, शिव रत्रि का मेला, दशहरा का मेला, गौस पीर का मेला शामिल है। ईंद और बक़रा ईद के अलावा दर्जनों क्षेत्रों में मेला का मौसम महीनों तक चलता रहता है। इसके अलावा सरायख्वाजा में भादो छठ मेला जिसमें किसानों के उपकरण आदि अधिक खरीदे जाते हैं।

    उन्होंने कहा कि आजमगढ़, सुल्तानपुर, अंबेडकर नगर ज़िलों में बच्चों के खिलौने और महिलाओं के सामानों की दुकान मेलों में लगाता हूं। मेला की तैयारी के लिये बनारस मंडी से माल की खरीदारी होती है। मैं 20 साल से अधिक समय से इसी पेशे में हूं। जब मेलों में नहीं जाता तो अपने घर के एक कोने में दुकान रखकर चलाता हूं। किसी तरह से जीवन यापन करता हूं। खेती-किसानी का कोई साधन नहीं है। कोरोना महामारी ने सब कुछ छीन लिया है अब सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं। कोरोना कब समाप्त होगा, आजीविका कैसे चलेगी? अब इसी बात की चिंता लगी रहती है।

    मोहम्मद असलम
    मोहम्मद असलम

    इसी गाँव के 65 वर्षीय मोहम्मद असलम बताते हैं कि बचपन से ही मेलों में बांसुरी और हार की एक दुकान लगाता हूं। उनके अनुसार मेलों का मौसम तो पूरे साल रहता है। ग़ाज़ी मियां के मेले में मनेक्षा गांव से होते हुए बहराइच तक हर साल पैदल मेलों में बांसुरी और सामान बेचते हुए जाता हूं। जिसमें 10 से 15 दिन लग जाते हैं। इसके अलावा मनकापुर, बहराइच, अजगरा, प्रतापगढ़, बेलवाई, फैजाबाद, गोसाईगंज आदि स्थानों पर भी मेला लगता है। इन मेलों में जाकर अपना व्यवसाय करता हूं। अपनी कमाई के बारे में कहा कि मुक़द्दर की रोज़ी मिल जाती है। मेलों में घूम-घूम कर बांसुरी बजाकर अपना व्यवसाय करता हूं। 6 बच्चों के अलावा मेरा पूरा परिवार है। खाली समय में गाँव में एक चाय की दुकान चलाता हूँ। खेती-बाड़ी का कोई साधन नहीं है। मेलों में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं होती है प्रत्येक क्षेत्र में मेला लगाने वाले एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं और एक दूसरे से मेलों की दिन-तिथि की जानकारी मिल जाती है। कोरोना ने सब कुछ छीन लिया है। लगभग छह महीने से घर पर हूं। कुछ दिनों से अनलॉक में चाय की दुकान खुल रही है लेकिन गांव के अधिकांश लोग लगने वाले मेलों में दुकान लगाकर या अन्य माध्यमों से प्रतिदिन कुएं खोदकर प्रतिदिन पानी पी रहे थे। इस समय सभी काम धंधा बिल्कुल ठप हो चुका है।

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