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    भारतवर्ष के दर्शन का आधार चार पुरुषार्थ | #NayaSaberaNetwork

    नया सबेरा नेटवर्क
    वाराणसी। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश काशी महानगर इकाई द्वारा “सुसंवादी विकास पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय की चिंतन दृष्टि”  विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी के द्वितीय दिवस (तृतीय सत्र) पर व्याख्यान माला का सफल आयोजन किया गया। डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने सभी अतिथिओं का परिचय तथा स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूप रेखा पर प्रकाश डाला। रामाशीष जी, संयुक्त क्षेत्र संयोजक प्रज्ञा प्रवाह, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार एवं झारखंड ने स्पष्ट किया कि भारतवर्ष के दर्शन का आधार चार पुरुषार्थ हैं- धर्म पुरुषार्थ, अर्थ पुरुषार्थ, काम पुरुषार्थ एवं मोक्ष पुरुषार्थ।


    उन्होंने बताया कि मोक्ष पुरुषार्थ का अर्थ है- आत्म स्वरूप को जानना। धर्म का अर्थ उपासना ही नहीं है, सामाजिक व्यवहार तथा सभी क्षेत्रों में उचित अनुचित का ज्ञान ही धर्म विवेचना है। प्रोफेसर वोगारी नेगारी, वाइस प्रेसिडेंट, इथोपियन सिविल सर्विसेज यूनिवर्सिटी, अदिस अबाबा इथोपिया (अफ्रीका) ने कहा कि चरित्रवान मनुष्य स्वयं में ईश्वर की एक पूर्ण कृति है। पंडित दीनदयाल जी का एकात्म मानववाद संपूर्ण विश्व के लिए दार्शनिक धरोहर है।


    उन्होंने सच्चरित्र मानवीयता  के संप्रत्यय पर भी प्रकाश डाला। डॉ. बीएन गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर इथोपियन सिविल सर्विसेज यूनिवर्सिटी, अदिस अबाबा इथोपिया (अफ्रीका) ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संपूर्ण जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला एवं यह स्पष्ट किया कि अच्छे सुशासन से सबको समाहित करते हुए विकास के सपने पूरे हो सकते हैं। 


    डॉ. रुद्र नारायण ओझा एसोसिएट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग,  तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय ने बताया कि पंडित दीनदयाल जी का चिंतन भारतीय दर्शन की सनातनी परंपरा पर आधारित है,  यह भारत की जीवना है,  व्यक्ति,  परिवार समाज, मानव एवं संपूर्ण विश्व अन्योन्याश्रित है।

    डॉ. जगन्नाथ गुप्ता,  सीईओ,  जागरण एजुकेशन फाउंडेशन,  कानपुर, उत्तर प्रदेश, ने अर्थथायम का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताया कि ना तो अर्थ का अभाव होना चाहिए और ना ही अर्थ का अधिक प्रभाव होना चाहिए। समाज का आधार शांति, सुख और समृद्धि होता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के सर्वागीण विकास की संकल्पना का आधार प्रकृति के साथ सामंजस्य है। जीवन का  परिमार्जन संस्कार युक्त व्यक्तियों से ही हो सकता है। सुसंवादी सहभागिता युक्त विकास ही इस की कुंजी है।  उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वशासन के अभाव में पंचवर्षीय योजना का लाभ गरीबों को नहीं मिल पाया। प्रोफेसर राम लखन सिंह,  माननीय कुलपति,  नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय, मेदीनगर,  पलामू,  झारखंड ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं पंडित दीनदयाल जी के चिंतन की समानता पर विस्तार से प्रकाश डाला।

    उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति से व्यक्ति निर्माण को बल मिलेगा,  सुदृढ़ मानव से सुदृढ़ भारत की स्थापना होगी प्रोफ़ेसर गुलाब चंद्र राम जायसवाल,  कुलपति,  पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय पटना बिहार ने बताया कि प्रकृति से संवाद खत्म होने के कारण संपूर्ण मानवता को खतरा उत्पन्न हो गया है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास के केंद्र में मानव होना चाहिए यही एकात्म मानववाद का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। साथ ही उन्होंने बताया कि उजाले के लिए हमें स्वयं प्रयास करना होगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि विकास स्वयं हो जाता है परंतु विकास की दिशा उचित होनी चाहिए, शारीरिक,  मानसिक एवं चारित्रिक उन्नति ही विकास है। संचालन डॉ. सपना वर्मा ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अमिताभ मिश्रा ने किया। 

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