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    NEP 2020 : बीएचयू के सहायक प्रोफेसर का यह विश्लेषण आपकी समझ को समृद्ध करेगा | #NayaSaveraNetwork

    डॉ विनोद जायसवाल बीएचयू की आर्ट्स फैकल्टी में Ancient Indian History and Culture (AIHC) डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पठन-पाठन का इनका लम्बा अनुभव हमें आपको नई शिक्षा नीति को समझने में जरूर मदद करेगा। पढ़िए यह दार्शनिक लेख...
    NEP 2020 : बीएचयू के सहायक प्रोफेसर का यह विश्लेषण आपकी समझ को समृद्ध करेगा | #NayaSaveraNetwork

    शिक्षा माता के समान पालन-पोषण करती है, पिता के समान उचित मार्गदर्शन द्वारा अपने कार्यों में लगाती है तथा पत्नी की भांति संसारिक चिंताओं से दूर करके प्रसन्नता प्रदान करती है। शिक्षा के द्वारा ही हमारी कीर्ति का प्रकाश चारों दिशाओं में फैलता है तथा शिक्षा ही समस्याओं को सुलझाती है व हमारे जीवन को सुसंस्कृत बनाती है। कल्पलता की भांति शिक्षा हमारे सम्पूर्ण कार्यों को सफलीभूत करती है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश पाकर कमल खिल उठता है तथा सूर्यास्त होने पर कुम्हला जाता है, ठीक उसी प्रकार शिक्षा का प्रकाश पाकर प्रत्येक व्यक्ति कमल की भांति खिल उठता है तथा अशिक्षित रहने पर दरिद्रता, शोक एवं कष्ट के अंधकार में डूबा रहता है लेकिन किसी देश की शिक्षा व्यवस्था व नीतियां उसके राष्ट्राध्यक्ष व सहयोगियों द्वारा राष्ट्र व समाज के अनुरूप निर्मित कर क्रियान्वयन करवाने की भी जिम्मेदारी होती है। इसी पहल के साथ 1947 के बाद तीसरी शिक्षा नीति मोदी सरकार के नेतृत्व में 2.5 लाख ग्राम पंचायतों, 6600 ब्लॉकों व 676 जिलों के अनेक शिक्षाविदों, आचार्यों, जनप्रतिनिधियों, अभिभावकों, छात्रों के द्वारा दिये गए दो लाख से अधिक लोगों के सुझावों द्वारा मन्थनोपरान्त लोक आकांक्षाओं के अनुरूप शिक्षा मंत्रालय के नवीन नाम से तैयार किया गया है। विश्व के विकसित देशों के समकक्ष खड़े होने के लिए शिक्षा में जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च का भी प्रावधान किया गया, जो अब तक सर्वाधिक है। बशर्तें इसका सदुपयोग सही दिशा में हो तब जाकर भारतीय शिक्षा की दशा में आमूलचूल परिवर्तन देखा जा सकता है और समाज के हरेक तबके के विकास व विश्वास को जीता जा सकता है। शिक्षा नीति 2020 में महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा और हर हाथ को काम; विवेकानन्द के राष्ट्रोन्मुखी तथा प्रत्येक बालक को स्व व राष्ट्र के लिए तैयार करना; मालवीय जी के कला, विज्ञान, तकनीकी, धर्म, दर्शन, विधि, कृषि, प्रबन्ध, पर्यावरण जैसी शिक्षाओं का समावेश; टैगोर की आदर्शवादी; जे.कृष्णमूर्ति के भारतीय दर्शन की वर्तमान पीढ़ी द्वारा विश्व को मार्गदर्शन देने की सोच सरीखे अनेक लोगों की पुट दिखायी पड़ती है। जिससे व्यक्ति व राष्ट्र का व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, संज्ञानात्मक, मानसिक व आध्यात्मिक उत्थान हो सके। भाषा अभिव्यक्ति का साधन मात्र है, अतः आरम्भिक अर्थात् पूर्व प्राथमिक व प्राथमिक स्तर पर बालकों को मातृभाषा व स्थानीय तथा क्षेत्रीय भाषाओं में दी जाने वाली शिक्षा मृतप्राय हो रहे भाषाओं जैसे दक्षिण भारतीय व पाली, प्राकृत को सन्जीवनी प्रदान करेगी। भाषाओं को संरक्षण-संवर्धन के लिए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ट्रांसलेशन एंड इन्टरप्रटेशन का सुझाव सराहनीय है, जिससे देवभाषा संस्कृत को बढ़ावा मिलेगा जबकि विदेशी भाषाओं से परिचित उच्चतर माध्यमिक स्तर पर कराया जायेगा। इसके साथ ही बस्ते का बोझ (लर्निंग विदाउट वर्डेन) भी कम किया जायेगा, जिससे अनावश्यक मनोवैज्ञानिक दबाव कम होगा।

    "बालभवन" निर्माण जैसे सशक्त कदम से बच्चों के मानसिक स्तर के हिसाब से कला, करियर खेल से जुड़ी गतिविधियाँ लाभकारी होगी। नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल के माध्यम से मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा के लिए धन का लेखा-जोखा व देख-रेख में पारदर्शिता से अपव्यय से बचा जा सकता है। जहाँ पहुँच की दुरुहता है वहां आज के कोरोना महामारी ने मार्गप्रशस्त किया कि ई-लर्निंग अर्थात ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखी जाय यह भी इस शिक्षा नीति में समाहित किया गया है। इसके साथ ही लचीलेपन के साथ गुणवत्तापरक शिक्षानीति में विद्यार्थी किन्ही कारणों से मध्य में पढ़ाई छोड़कर पुनः पूर्ण करना चाहते हैं, तो ड्रॉप आउट की समस्या से राहत मिलेगी और यदि अंकों के सुधार के लिए छात्र पुनः परीक्षा देकर अधिकतम अंक पाना चाहता है तो वह भी समाहित किया गया है। पूर्व प्राथमिक स्तर पर आंगनबाड़ी को मजबूत किया जायेगा। स्कूली शिक्षा सचिव अनीता करवल के अनुसार बच्चों को गणित व कोडिंग जैसी शिक्षा कक्षा छह से ही दी जायेगी तथा इसी अनुरूप पाठ्यक्रम भी तैयार किया जायेगा। अतः यह अभिनव प्रयास दूरगामी लाभकारी होगा। बोर्ड परीक्षाओं को वर्ष में दो बार कराने की बात पिछले 50 सालों की जड़ता को दूर कर बच्चों को तोता बनाने से दूर किया जा सकता है और कोचिंग क्लास की समस्या को कम किया जा सकता है। इस सभी के गुणवत्ता व विश्वसनीयता के लिए राज्यों को स्कूल स्टैन्डर्ड अथॉरिटी जैसी व्यवस्था गली-मुहल्ले में खुले विद्यालयों के सुधार में भी सार्थक प्रयास है। चार स्तरीय ढांचा भी स्वागत योग्य है, जिसमें आरम्भ से ही कला कौशल का विकास, व्यवसायिक शिक्षा का व्यवहारिक व क्षमता निर्माण का विकास, शिक्षा के दौरान धनार्जन व सदुपयोग की सीख आत्मनिर्भर भारत बनने की ओर दिशान्मुखी है अर्थात् रोजगार केन्द्रित शिक्षा जिससे यदि छात्र बारहवीं के बाद घर की जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए आगे की पढ़ाई नहीं करना चाहता है तो दो वर्षीय डिप्लोमा, दीर्घावधि डिग्री कोर्स, एकेडेमिक क्रेडिट बैंक, क्रेडिट स्कोर सहित मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेस (MOOCS) जैसे नवाचारी संसाधनों के उपयोग से विभिन्न प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर मैकेनिक आदि से स्वरोजगार विकसित कर लोगों को रोजगार भी दे सकता है और सक्षम व सशक्त भारत के निर्माण में योगदान देकर खुद को भारत के विकास का गौरवभान कर सकता है तथा अन्य पीढ़ियों को प्रेरित भी कर सकता है। उच्च स्तर पर आएं तो परिपक्व युवाओं की फ़ौज तैयार की जा सकती है, जिससे एक सम्पूर्ण मानव बनाने का मार्ग प्रशस्त होता दिखाई पड़ रहा है क्योंकि अब वाणिज्य, विज्ञान, कृषि, विधि, चिकित्सा, तकनीकी के विद्यार्थी को मानविकी विषय से भी परिचित होने का सुलभ अवसर दिया जा रहा है। मेरा मानना है कि आधुनिक विज्ञान चन्द्रमा व मंगल ग्रह तक पहुँचा सकता है लेकिन पास के मानव के दिलों की गहराई तक पहुँचाने की क्षमता मानविकी विषय में ही संभव है लेकिन दोनों का अद्भुत संगम छात्रों का सर्वांगीण विकास कर मानवता का पाठ पढ़कर चिकित्सा आदि के छात्र सेवा भाव से कार्य करेंगे व धनलोलुपता, दुर्व्यव्यवहार से छुटकारा मिलेगी। अतः वे नवमानव व नवभारत निर्माण में अद्भुत योगदान देंगे। 

    स्नातक स्तर पर यह व्यवस्था यूरोप व अमेरिका में बहुत पहले से ही है। मल्टी एन्ट्री व मल्टी एग्जिट जैसे अटल मार्ग से समय,श्रम व धन की अपव्ययता से भी बचा जा सकता है। स्नातक की उपाधि चार साल के साथ एक साल का परास्नातक व तुरंत पीएचडी की उपाधि से समय बचत व तुरन्त रोजगार के अवसर के सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे जिसका उदाहरण पूर्व में अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे देशों ने लागू करके दिखाया है। नवीन शिक्षा नीति 2020 में सरकारी व गैरसरकारी संस्थानों में प्राथमिक से लेकर उच्च सभी शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित, गिरिवासी, वनवासी, मातृशक्ति (लड़कियों), दिव्यांगों, गरीबों, वंचितों सबके लिए एक विशेष प्रावधान छात्रवृति के साथ आया है व इनके मनमानी शूल्क वसूली के रोकथाम के लिए कैपिंग का प्रावधान किया गया है जिसमें सामाजिक बहिष्करण एवं समावेशी शिक्षा नीति का पालन किया गया है। सन् 2035 तक विश्वविद्यालय से अनेकों कॉलेजों की सम्बद्धता व मान्यता से मुक्त कर स्वायत्तता प्रदान करके खरीद-फ़रोख़्त, धनों के बंदरबाँट, अनावश्यक रूप से परेशान कारने वाले कारकों से मोक्ष मिल जायेगा और विश्वविद्यालय को भी परीक्षाओं के भार से मुक्ति मिल जायेगी। अनुशासनात्मक व समर्थ विश्वविद्यालयों व कॉलेजों का विकास होगा जिसमें मूलभूत सुविधाओं से छात्र समय रहते डिग्रियों, अंकपत्रों की अनियमितताओं आदि से अधिक लाभान्वित होंगे लेकिन कॉलेजों को भी बेलगाम नहीं छोड़ा जा रहा है इनके लिए भी "हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ़ इण्डिया" को सुनिश्चित किया गया है जो समय-दर-समय चार अलग-अलग इकाइयाँ गुणवत्ता, नियमन, अनुदान व मान्यता को ऑनलाइन फ़ेसलेस पर्यवेक्षण के द्वारा किया जायेगा। भारत विश्व में सबसे अधिक युवाओं का देश है। इसे ध्यान में रखते हुए युवाओं को सकारात्मक व अधिकतम उपयोग के लिए उच्च शिक्षा के विभिन्न पाठ्यक्रमों में 3.5 करोड़ अधिक सीटों को बढ़ाकर 2035 तक 50 फ़ीसदी सकल नामांकन का लक्ष्य निर्धारित हुआ है, जो अभी 27 प्रतिशत ही है। 

    1964 कोठारी कमिशन में शिक्षकों के शिक्षण, प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण अध्यापन के विकास को लेकर एक राष्ट्रीय मानक तैयार किया गया। इसी विशेष आग्रह के कारण 1968 की शिक्षा नीति में कुछ झलक तथा 1986 की नीति में कम्प्यूटर आदि द्वारा आधुनिकीकृत करने का प्रयास किया गया लेकिन 34 सालों के बाद वैश्विक परिदृश्य में बदलते तकनीकी व समाज द्वारा उसकी उपयोगिता के मद्देनजर 2020 के शिक्षा नीति में कस्तूरीरंगन कमेटी द्वारा शिक्षकों को अद्यानुतन तकनीकी से सुपरिचित शिक्षण प्रशिक्षण प्रदान कर इनका निर्माण किया जा रहा है ताकि यह आने वाली समस्त पीढ़ियों को और सशक्त ढंग, ज्ञान-विज्ञान देकर समाज को अधिकतम लाभ पहुंचा सके। अतः इसके लिए राष्ट्रीय स्तर का मानक तैयार किया गया है। बारहवीं के बाद चार साल एमए के बाद एक साल के बीएड की व्यवसायिक डिग्री प्रदान कर प्रशिक्षित की जायेगी। एनसीटीई को 2022 तक "नेशनल प्रोफ़ेसनल स्टैन्डर्ड फॉर टीचर्स" के लिए समान मानक तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, जो "जनरल एजुकेशन काउन्सिल" के दिशा-निर्देश में कार्य करेगी और 2030 तक सभी बहुआयामी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पठन—पाठन के पाठ्यक्रम को तद्नुरुप अपग्रेड करना होगा। शिक्षकों के लिए न्यूनतम डिग्री बीएड चार सालों का, चार साल के स्नातक लोगों के लिए दो साल का बीएड जबकि स्नातक सहित परास्नातक की डिग्री लेने वाले छात्र को बीएड की डिग्री एक साल में ही प्राप्त हो जायेगी, जिससे समय की बचत होगी किन्तु इसमें शिक्षण तकनीकी पर ज्यादा जोर दिया गया है जो समय की मांग के अनुकूल भी है। यह एक जैसे शिक्षक व एक जैसी शिक्षा को ध्यान में रखकर कार्य किया गया है। दूसरी बात शिक्षकों को गैरशैक्षणिक कार्यों से मुक्ति। जैसे- पल्स पोलियो अभियान, जनगणना आदि से मुक्त कर अध्यापन कार्य से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के द्वार खोल दिए हैं और सैलरी जहाँ फ़िक्स्ड हो चुकी है उससे नीचे नहीं किया जायेगा, जैसा सराहनीय कार्य शिक्षकों के मनोबल को बढ़ाएगा जो कक्षाओं के लिए उत्तम सिद्ध होगा। किसी राष्ट्र को महाशक्ति बनाने में उस देश की अनुसंधान संस्कृति काफ़ी मायने रखती है, जिसे आज हम अमेरिका, रूस, जर्मनी, चीन, जापान फ्रांस, जैसे विकसित देशों के रूप मे देख रहे हैं। भारत में भी इस शिक्षा नीति में अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए "नेशनल रिसर्च फ़ाउन्डेशन" की स्थापना की गयी है। इसके तहत विद्यार्थी की अभिरुचि, योग्यता व क्षमता के अनुरूप आरम्भ से ही अकादमिक क्षेत्र में शोध कार्य व नवीन खोजों के लिए साइन्स एन्ड टेक्नोलॉजी में ही उसको भेजने के साथ समुचित संसाधनों से पूर्ण कर अपार अवसर व सम्भावनाएं प्रदान की जायेगी। इसके लिए प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए हमारे यहाँ अपने कैम्पस खोलने के दरवाजे खोल दिये गये हैं। उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे के अनुसार प्रत्येक वर्ष साढ़े सात लाख छात्र विदेशों में अध्ययन के लिए जाते थे, जिससे अरबों डॉलर खर्च से बचा जा सकता था। 

    साथ ही बौद्धिक पलायन को रोककर, बौद्धिक सम्पदा को बचाकर राष्ट्र के हित में इनका व इनके द्वारा किए गए खोजों का उपयोग किया जा सकता है, जिससे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम व पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के सपनों को साकार किया जा सकता है। साथ ही गैरजरूरी कामचलाऊ शोध कार्य पर लगाम लगाया जायेगा। आईआईटी व आईआईएम के तर्ज पर "मल्टी डिसीप्लिनरी एजुकेशन एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी" बनायी जायेगी, जो शोध क्षेत्र में मानक सिद्ध होगी और विश्वस्तरीय शोध के लिए मील का पत्थर साबित होगा, जिससे विकसित देशों के समकक्ष खड़े हो सकेंगे। अन्तर्विषयिक शोध भी मानक सिद्ध होंगे, जो प्रधानमंत्री मोदी जी के मेड इन इंडिया व स्टार्टअप इंडिया के सपने को भी साकार करेगी। एक गम्भीर सुझाव सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को क्रियान्वित करने वालों से आग्रह भी रहेगा कि समय के साथ अंकों के खेल प्रतिशत को अब खत्म कर बच्चों में अनावश्यक प्रतिस्पर्धा खत्म कर स्वस्थ मानवमन के पीढ़ियों को तैयार किया जाय। कोइ भी नीति एक दिन में, एक दिन के लिए तथा एक दिन में ही क्रियान्वयन कराके सफ़लीभूत नहीं हो सकती। अतः अनेक खूबियों से युक्त यह नवीन शिक्षा नीति तभी सफ़ल हो पायेगी जब सरकार व सरकारी कर्मचारियों, नौकरशाहों, संस्थानों के मुखिया, समाज व व्यक्ति सभी सहयोग करें तथा सत्ता परिवर्तन के साथ इसके मूल योजना व भावना में परिवर्तन न हो। हाँ, आवश्यकतानुरूप गुणात्मक परिवर्तन सदैव अपेक्षित रहता है। यह शिक्षा नीति 21 वीं सदी के भारत को आवश्यकतानुरूप आवश्यकताओं, चुनौतियों को पूर्ण करने में सक्षम सिद्ध होगी। यह ऐतिहासिक शिक्षा नीति भारत को महाशक्ति बनाने मे उपयोगी होगी।

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    *विज्ञापन : प्राथमिक शिक्षक संघ के जिला संगठन मंत्री अश्वनी सिंह की तरफ से रक्षाबंधन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एवं स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं*
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