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    विदा के पहले का दृश्‍य



    आंँगन का दरख़्त सूख गया था देखते-देखते
    गौरैया छोड़ गयी थी अपना घोसला
    सकोरे में रखा जल सोख लेती थी धूप
    गऊएँ कान खड़ॆ किए चौंक पड़ती थी यकसाँ


    आस्था का पहाड़ धीरे-धीरे सरक रहा था 
    नदी ने बदल लिया था अपना रास्‍ता
    तुलसी के बिरवै से झर रहे थे तुलसी-दल
    खेत की फसलें झुक गई थी अपने ही भार से
    और मेड़ की विबाई फट रही थी
    सीने पर बोझ लिए गुज़र जाता था दिन-बोझिल

    इधर एक विषाणु  कमजोर कर रहा था स्‍नायुतंत्र
    और उधर शाख पर टिका आखिरी पत्ता 
    हाथ हिला रहा था 'लास्‍ट लीफ' की तरह

    यह दृश्य सुंदर था लेकिन शाम का था
    और तय था  अंधकार भरी रात का आना
    यह विदा के ठीक पहले का दृश्य था, विदा लेता
    कुछ-कुछ मुखर-सा और कुछ-कुछ मौन-सा!

    युवा लेखिका शुचि मिश्रा जौनपुर

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