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    शत्रु कोरोना के बहाने



    वह दीखता नहीं
    किंतु हवाओं से
    साँसों से
    प्रवेश करता है धमनियों में
    शिराओं में फैलता है

    ले रहा सारे विश्व को
    अपनी गिरफ्त में

    मित्र को भी वह इस तरह
    अपना बनाता
    कि एक मीटर दूरी रखते परिजन

    साफ-साफ जता रहा है शत्रु
    कि खतरनाक वह है
    जो अदृश्य होते हैं

    अदृश्य हो रहे हैं मूल्य
    रिश्ते-नाते अपनत्व
    विश्‍वास

    एक विनोद भरी भाषा में
    कहता है शत्रु
    अब देखो ना
    तुमने खोया भरोसा
    और खाया धोखा।





    -युवा लेखिका शुचि मिश्रा
    जौनपुर

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