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    प्रकाश झा निर्देशित परीक्षा मूवी रिव्यु (रिलीज डेट 6 अगस्त) | #NayaSaveraNetwork

    सचिन समर
    कोविड—19 महामारी के कारण ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्मों के रिलीज होने का सिलसिला जारी है इसी दौरान 6 अगस्त को जी5 प्लेटफार्म पर प्रकाश झा की फ़िल्म "परीक्षा" स्ट्रीम हुई है। प्रकाश झा ऐसे फिल्मकार हैं, जो फिल्मों के माध्यम से सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की उम्मीदें लेकर हर बार बॉक्स ऑफिस पर हाजिर होते हैं। उनके साहस और प्रयासों की इस मायने में प्रशंसा की जाना चाहिए कि सिनेमा की ताकत का वे सही इस्तेमाल करते हैं। अपनी ‍पहली फिल्म ‘दामुल’ के जरिये गाँव की पंचायत, जमींदारी, स्वर्ण तथा दलित संघर्ष की नब्ज को उन्होंने छुआ है। इसके बाद उन्होंने कई सामाजिक सरोकार से जुड़ी फिल्में बनाईं। प्रकाश झा व्यवहारिक रूप से भ्रष्ट व्यवस्था तथा राजनीति की सड़ांध का अपने स्तर पर विरोध करते हैं। यही विरोध उनकी फिल्मों में जीता-जागता सामने आता है। मृत्युदंड, आरक्षण से लेकर अपहरण तक उनकी फिल्मों को दर्शकों ने दिलचस्पी के साथ देखा और सराहा है। इसी तरह एक और फ़िल्म लेकर हाजिर हुए हैं प्रकाश झा। फ़िल्म में सिस्टम के भ्रष्ट होने से लेकर गरीबों के शोषण को दिखाया गया।
    प्रकाश झा निर्देशित परीक्षा मूवी रिव्यु (रिलीज डेट 6 अगस्त) | #NayaSaveraNetwork
    क्या है कहानी..
    फ़िल्म की कहानी में बुच्ची नामक रिक्शेवाला सफायर इंटरनेशनल स्कूल के बच्चों की सवारी ढ़ोता है। उसकी भी इच्छा है कि वह अपने होनहार बेटे बुलबुल को सरकारी स्कूल से सफायर इंटरनेशनल नामक निजी स्कूल में पढ़ाए, बूच्चु ने स्कूल के रजिस्ट्रार से बात की लेकिन उसने स्कूल की फीस और उसे अशिक्षित होने के नाते साफ मना कर दिया। रिक्शा चलाने के दौरान उसे रिक्शे की सीट पर किसी सवारी का पर्स (बटुआ) मिलता है जिसमें अस्सी हजार रुपए होते हैं। बुच्ची अपनी पत्नी को पूरा घटनाक्रम बताता है फिर पैसा वापस करने के लिए जाता है लेकिन बिना वापस किए लौट आता है। अगले दिन वह सफायर स्कूल के प्रिंसिपल से बुलबुल के दाखिले के लिए अनुरोध करता है, बुलबुल का टेस्ट लेने के बाद उसका एडमिशन सफायर इंटरनेशनल स्कूल में हो जाता है लेकिन फीस आदि के खर्च के बोझ अधिक होने के नाते बुच्ची धीरे-धीरे चोरी करने लगता है और एक दिन घर में चोरी करते हुए पकड़ा जाता है। चोरी के पैसे से वह बुलबुल की स्कूल फीस चुकाता और स्कूल प्रशासन को रिश्वत भी देता है कि उसके बेटे को परीक्षा में मदद की जाए। बुलबुल को रिश्वत की बात की भनक लगती है तो उसे इस बात का बहुत बुरा लगता है। थाने में बुच्ची से जब पुलिसकर्मी पूछताछ करते हैं तो वह इस डर से कुछ नहीं बोलता कि उसके बेटे का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। इसके बाद इस फ़िल्म में आईपीएस बने संजय सूरी की एंट्री होती है, जो बुच्ची पासवान से पूछताछ करते हैं और बाद में उसकी कॉलोनी जाकर बुलबुल समेत कई गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके बाद मीडिया और नेता समेत सभी लोगों की निगाहें आईपीएस कैलाश आनंद पर जाती है और अमीर लोग उन पर उनके बच्चों को पढ़ाने का दबाव बनाते हैं, लेकिन कैलाश आनंद राजी नहीं होते चूंकि बुलबुल का बोर्ड एग्जाम नजदीक होता है, इसलिए आईपीएस कैलाश उसे पढ़ाने के साथ ही प्रोत्साहित भी करते हैं। इस बीच बुच्ची पासवान की चोरी के बारे में सबको पता चल जाता है और उसकी काफी बदनामी होती है। बुलबुल को स्कूल से निकालने तक की बात होने लगती है। बुलबुल के पिता के चोर होने के नाते स्कूल में पढ़ने वाले अन्य छात्रों के रईस अभिभावकों ने बुलबुल को एडमिट कार्ड न देने का दबाव बनाते हैं लेकिन बुलबुल के निवेदन पर नेकदिल प्रिंसिपल पिघल जाती हैं और उसे परीक्षा में बैठने का मौका दिया जाता है और बुलबुल हाईस्कूल की परीक्षा में टॉप करता है।
    प्रकाश झा निर्देशित परीक्षा मूवी रिव्यु (रिलीज डेट 6 अगस्त) | #NayaSaveraNetwork
    निर्देशन और अदाकारी..
    आदिल हुसैन बुच्ची पासवान बनकर एक असहाय और मजबूर रिक्शा वाले की भूमिका के साथ न्याय करते हैं। आंखों में सपनों के साथ ही जब आंसू दिखते हैं तो उस समय आदिल हुसैन की अदाकारी देख दुनिया कहती है एक्टर हो तो ऐसा। वहीं प्रियंका बोस बुच्ची पासवान की पत्नी की भूमिका में सटीक लगती हैं। प्रियंका और आदिल, दोनों ही मंझे हुए कलाकार है और प्रकाश झा की उम्मीदों पर ये दोनों खड़े उतरे हैं। इस फ़िल्म में संजय सूरी आईपीएस कैलाश आनंद की भूमिका में परफेक्ट रही है। इस फ़िल्म की सबसे खास बात है बुलबुल। बुलबुल के किरदार में चाइल्ड आर्टिस्ट शुभम झा की जितनी तारीफ की जाए, वह कम है। एक गरीब और होनहार स्टूडेंट के रूप में इमोशन और एक्सप्रेशन के मामले में शुभम झा का अभिनय आपके दिल को टच करेगा। प्रकाश झा के निर्देशन के बारे में दुनिया जानती है कि वह हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के उन चंद निर्देशकों में हैं, जो अपनी फिल्मों में जादू करते हैं और उस जादू के साये में दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

    देखें या नहीं..
    परीक्षा सच्ची घटना से प्रेरित कहानी है, जिसमें गरीब-अमीर के बीच की खाई भी दिखाई गई है और एक पिता के संघर्ष को दिखाया गया है कि कैसे वह अपने बेटे को पढ़ाने के लिए गलत काम करने से भी खुद को नहीं रोक पाता और पाई-पाई जोड़कर बच्चे को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहता है। इसके साथ ही परीक्षा में नेताओं और पुलिस अधिकारियों के बीच द्वंद को भी प्रकाश झा ने दिखाने की कोशिश की है। परीक्षा एक अच्छी और सच्ची फ़िल्म है, जिसमें एक खूबसूरत इमोशन है, जिससे आप जुड़ेंगे। बाकी प्रकाश झा जब इस तरह की फिल्म बनाते हैं तो आपको बेहतर अंदाजा हो जाता है कि इसकी कहानी कुछ खास होगी। सुपर 30 के बाद बिहार-झारखंड की शिक्षा व्यवस्था की दशा बताती एक अच्छी और देखने लायक फ़िल्म है- परीक्षा।

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