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    मां, जरा तलवार देना, आज तक कितने गिरे हैं | #NayaSabera

    मां, जरा तलवार देना।
    आज तक कितने गिरे हैं,
    आज देखो फिर गिरेंगे,
    भाइयों के खूनियों के
    आज लाखों सिर गिरेंगे,
    जंग खाई सब कटारों
    को तपाकर धार देना।
    मां, जरा तलवार देना।

    ठीक है तेरी अहिंसा,
    बात तेरे शान की है,
    चीख तेरे सुत, हमारे
    भाइयों के जान की है,
    फिर मुझे समझा-बुझाकर
    आज मत इंकार देना।
    मां, जरा तलवार देना।

    घुस गए घर में तुम्हारे
    मौसमी कीडे़-मकोड़े,
    किस तरह चुप बैठ जाएं
    खून उनका बिन निचोडें,
    तुम दिया जम का निकालो
    या मुझे अंगार देना।
    मां, जरा तलवार देना।

    आ गया है वक्त, अब कर
    पार पारावार जाऊँ,
    यह अधम जीवन, सुनयनी
    मातु पर न्यौछार जाऊँ,
    आज वशुधा से तुम्हारे
    बैरियों को मार देना।
    मां, जरा तलवार देना।

    शांति का उपदेश तेरा
    सुन समझ से दूर है अब,
    ढो लिया शव भाइयों का
    और मन मजबूर है अब,
    और कितने दिन पड़ेगा
    दानवों को प्यार देना।
    मां, जरा तलवार देना।
    मां, जरा तलवार देना, आज तक कितने गिरे हैं | #NayaSabera

    गीतकार/रचयिता: छतिश द्विवेदी, कुंठित’
    साहित्यकार, पत्रकार व संपादक,

    प्रेषक व टंकण: हर्षवर्द्धन ममगाई
    पे्रस सूचनाधिकारी व कोषाध्यक्ष
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