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    चित्र बनाकर "एमएफ हुसैन" को दी श्रद्धांजलि | #NayaSabera

    • 10वीं पुण्यतिथि पर हुसैन को किया याद
    • 9 जून 2011 को लन्दन में हुआ था निधन

    डिजि​टल डेस्क। मक़बूल फिदा हुसैन यह एक ऐसा नाम है जिससे आम लोग भी परिचित है। यहाँ तक कि अगर कोई चित्रकार बनने की बात करता है तो आम लोग बोलते हैं कि हुसैन की तरह कलाकार बनोगे। यह कला के क्षेत्र में ऊँचा नाम है। एम एफ हुसैन भारत के चर्चित और सबसे महंगे चित्रकार थे। कई नीलामियों में उनके बहुत से चित्रों ने लाखों डॉलर से अधिक तक की कमाई की है।
    चित्र बनाकर "एमएफ हुसैन" को दी श्रद्धांजलि | #NayaSabera

       आज हुसैन की 10वीं पुण्यतिथि पर कुछ युवा कलाकारों भूपेंद्र कुमार अस्थाना, धीरज यादव, अनिल बोड़वाल, राजेश सिंह और सौम्या अस्थाना ने चित्र बनाकर हुसैन को याद किया और अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। 
    चित्र बनाकर "एमएफ हुसैन" को दी श्रद्धांजलि | #NayaSabera

        हुसैन की पेंटिंग्स और नाम पर कल भी लोग फिदा थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे।  उन्होंने कभी कहा भी था कि ''मैं चित्रकारी शुरू करूं तो आप अपने हाथों से आसमान को थाम लीजिए क्योंकि अपने कैनवस के विस्तार का खुद मुझे भी कुछ पता नहीं.''।
    चित्र बनाकर "एमएफ हुसैन" को दी श्रद्धांजलि | #NayaSabera

        चर्चित कलाकार मक़बूल फिदा हुसैन (17 सितंबर 1915 - 9 जून 2011) को भले ही इस दुनिया से विदा हुए आज 10 वर्ष हो रहे हैं। लेकिन  कभी भी ऐसा महसूस नही होता कि हुसैन हमारे बीच नहीं हैं। उनका कलात्मक प्रभाव, उनका व्यक्तित्व उनके चित्र आज भी उनके होने का एहसास कराती हैं। वैसे भी कलाकार कभी मरते नहीं वे हमेशा अपने कला के माध्यम से जीवित रहते हैं। हुसैन कला के क्षेत्र में बहुत से कलाकारों के आदर्श रहे हैं। 
    चित्र बनाकर "एमएफ हुसैन" को दी श्रद्धांजलि | #NayaSabera

         एम.एफ. हुसैन का जन्म 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ था और 1940 के दशक में वह एक प्रसिद्ध कलाकार बन गए। 1947 में वह फ्रांसिस न्यूटन सूजा द्वारा स्थापित किए गए ‘द प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’, में शामिल हो गए। इस समूह में युवा कलाकारों को शामिल किया गया था, जो बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी परंपराओं को तोड़ना चाहते थे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीयों को प्रोत्साहित करना चाहते थे।
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       एम.एफ. हुसैन निश्चित रूप से दुनिया के सबसे प्रशंसित चित्रकारों में से एक रहे हैं और कला और पेंटिंग के क्षेत्र में दुनिया के नक्शे पर भारत को एक अलग पहचान दिलाने में कामयाब रहे। हुसैन को  'पद्मश्री' (1955), 'पद्मभूषण' (1973), 'पद्म विभूषण' (1991) से भी सम्मानित किया गया था। हुसैन की पहली एकल प्रदर्शनी ज्यूरिख में प्रदर्शित हुई और अगले कुछ वर्षों में उनकी चित्रकारी यूरोप और अमेरिका में बहुत लोकप्रिय हो गई। भारत सरकार ने हुसैन को 1955 में प्रतिष्ठित पदम श्री से सम्मानित किया और फोर्ब्स पत्रिका ने एम.एफ. हुसैन को “भारत का पिकासो” कहा है। चित्रकार होने के अलावा, हुसैन एक फिल्म निर्माता भी थे उन्होंने “मीनाक्षीः अ टेल ऑफ थ्री सिटीज” और थ्रू द आइस ऑफ ए पेंटर” जैसी कई प्रसंशित फिल्मों को भी बानाया है, इन फिल्मों ने इनको बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर अवार्ड का विजेता बना दिया। महंगी और समाज में संभ्रांत (एलीट) होने के बाद भी हुसैन की पेटिंग्स, स्केच्स (रेखाचित्र) और कला के लिए किये गये कार्य की काफी मांग रही।

    हुसैन को उनके समय के प्रगतिशील कलाकारों से जो चीज अलग साबित करती है वह है गहरी जड़ें जमाए 'भारतीयपन' और भारतीय जीवन तथा जनमानस का जश्न।उनके समवर्ती दूसरे चित्रकार जब अपने काम में बाइजेंटियम से लेकर और आगे के लोगों की यूरोपीय कला को समाहित करने में लगे थे, तो उस वक्त हुसैन मंदिरों के वास्तुशिल्प (मथुरा और खजुराहो), पहाड़ी लघुचित्रशैली और भारतीय लोककला से प्रेरणा ले रहे थे।

         विशेष योगदान उन्होंने रामायण, गीता, महाभारत आदि ग्रंथों में उल्लिखित सूक्ष्म पहलुओं को अपने चित्रों के माध्यम से जीवंत बनाया है।

        भारत के सबसे प्रसिद्ध आधुनिक चित्रकार एम.एफ. हुसैन का गुरुवार, 9 जून 2011 को लंदन में निधन हो गया था। वह 95 वर्ष के थे। माना जाता है कि प्रसिद्ध चित्रकार को दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ने के कारण लंदन के रॉयल ब्रॉम्पटन अस्पताल में निधन हो गया। हिंदू देवताओं के चित्रों को नग्नवास्था में दर्शाने के बाद उन्हें लोगों द्वारा धमकियाँ मिलीं, इसलिए हुसैन अपनी स्वेच्छा से लंदन और फिर दुबई में रहने के लिए चले गये थे।

    - भूपेंद्र कुमार अस्थाना

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