• Breaking News

    क्यों बांटते हो मौत आखिर, जब खुशनुमा मेरा शहर | #NayaSabera

    अब तो सब सूनसान है, क्या हो गया मेरा शहर।
    कौन जाए, कैसे आये, खोया कहां मेरा शहर।।
    एक दिन जब उसने पूछा, कौन है तेरा शहर।
    बरबस ही आँखे रो पड़ी, कि कहा गया मेरा शहर।।
    बेखौफ अब चलने लगी है, कातिलों की टोलियां।
    उनसे भला कैसे कहू, खामोश है मेरा शहर।।
    क्यों बांटते हो मौत आखिर, जब खुशनुमा मेरा शहर। 
    ऐ कातिलों अब दूर हो जा, ये हिन्द है मेरा शहर।।
    होश में रहना तू जरा, ये हस्तियों का देश है।
    बजती यहाँ पर बाँसुरी, दिनरात शंख घण्टा नाद है।।
    तू रह न पायेगा कभी, इस धरा का अभिशाप है।
    कातिलों को क्षत्र छाया, मिलता नहीं यह श्राप है।।
    अब तो तू जान ले, वीरों का है मेरा शहर।
    जब नर्तन करेगी गंग धारा, तांडव होगा महाकाल का।।
    शत्रुओं के वक्ष पर जब, पाँव हो यमराज का। 
    कातिलों फिर सोच ले, कैसे अपना बचाव कर।।
    भ्रामरी के संग अब तो कालिका भी चल पड़ी।
    भाग जा अब भाग जा तू छोड़ कर मेरा शहर।।
    जो कभी करता नहीं था, कल तलक वो आज कर।
    छू ले जा उनके चरण, कर जोड़कर प्रणाम कर।।
    जिधर भी देखेगा तनिक, वह राम का ही गांव है ।
    जरा भी गर पश्चिम बढ़ा, वहां मोहन का गोकुल धाम है।।
    कोरोना, पाँव तू पूरब तरफ, वह भूतभावन का नगर।
    यह हिन्द है, यहां खेलती रणचंडी का मेरे शहर।।
    कहीं भूल करके भी कभी, छूना न मेरे शेरो को।
    अंशकाल में जल जाएगा, शमसान में है, मेरा शहर।।
    अब तो सब सूनसान है, क्या हो गया मेरा शहर।
    कौन जाए, कौन आये, खोया कहां मेरा शहर।।


    — अजय पाण्डेय
    जिला संवाददाता
    राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक 'तेजस टूडे', जौनपुर



    No comments