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    शीर्षक "कोरोना एक-प्रश्न अनेक" : डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला

    डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला
    दुनिया मैं उथल-पुथल का वातावरण कायम कर कोरोना जैसी भयंकर संक्रामक बीमारी ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण को भी बदलने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दिया है। प्राकृतिक प्रकोप समझने की भूल करने वाले देश इसकी लाइलाज आक्रामकता से हैरत में पड़े हुए हैं। मैं राजनीति विज्ञान से जुड़ा होने तथा शोध प्रवृत्ति के जाग्रत होने की प्रक्रिया में कुछ अहम सवाल (प्रश्न) जो केवल मेरे ही मन में नहीं वरन जनसामान्य के मन में भी उमड़-घुमड़ रहा होगा। 
    जो इस प्रकार है:- 
    प्रथम यह कि "कोरोना प्राकृतिक आपदा है या प्रायोजित युद्ध" जैसा कि वुहान के बायोरालॉजिकल लैब से निकलने की बात की जा रही है।
    द्वितीय यह कि 2003 एवं 2012 का संक्रामक सार्स (कोरोना) इतने वर्षों के बाद "कैसे हो गया इतना खतरनाक जानलेवा"। जिस के इलाज से लेकर संक्रमण तक अभी रहस्य बना हुआ है।
    तृतीय यह कि 17 नवंबर 2019 को चीन के हुबेई में शुरू हुआ संक्रमण 27 दिसंबर तक हजारों लोगों को संक्रमित तथाकथित 180 की जान ले चुका था फिर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन को समय रहते जानकारी क्यों नहीं दी गई। यह जानकारी 31 दिसंबर को दी गई। वह कौन सी परिस्थितियां थी कि इतने दिनों तक इस घातक संक्रमण को छिपाए रखा गया?
    चतुर्थ यह कि जनवरी मध्य तक भ्रम की स्थिति में पूरा विश्व था क्योंकि 14 जनवरी को डब्ल्यूएचओ ने कहा कि यह संक्रमण इंसान से इंसान में नहीं होता। तथा यह भी कहा कि यह जैविक हथियार है यह भ्रम कहां से और किन परिस्थितियों में दुनिया के सामने आई?
    पंचम यह कि चीन ने ऐसा क्या किया कि 13 मार्च तक संक्रमण पर नियंत्रण कर लेने का दावा प्रस्तुत करते हुए अपने व्यापारिक गतिविधियां प्रारंभ कर दिया?
    षष्टम यह कि चीन ने पूर्ण नियंत्रण के लिए अस्पताल तैयार कर लिया तथा संक्रमण रोग प्रतिरोधक सामग्री तैयार ही नहीं किया बल्कि निर्यात करना भी प्रारंभ कर दिया, क्या पहले से ही ऐसी सम्भावना/तैयारी थी?
    सप्तम यह कि चीन के वुहान को छोड़कर अन्य महत्वपूर्ण शहर एवं महत्वपूर्ण व्यक्ति संक्रमण से बिल्कुल सुरक्षित रहे - जबकि विश्व के खासकर यूरोप के सभी बड़े शहर तथा कई महत्वपूर्ण लोग संक्रमित होने से नहीं बच सके। जिसको लेकर भी संदेह होना स्वाभाविक है।
    अष्टम यह कि संक्रमित शोकाकुल देशों में कोरोना रक्षक सामग्री सप्लाई करने में चीन घटिया सामग्री क्यों भेज रहा है? जैसा कि स्पेन, इटली, इंग्लैंड सहित पाकिस्तान से भी ऐसी खबरें आ रही हैं।
    नवम व अंतिम महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कोरोना से जुड़े समाचारों को मीडिया से दूर/प्रतिबंधित क्यों रखा जा रहा है? क्यों नहीं उन महत्वपूर्ण चिकित्सा वैज्ञानिकों की जानकारी दी जा रही है- जो मौन हैं या फिर नहीं रहे? यह मानवाधिकार से जुड़े प्रश्न है! जिसका जवाब आज नहीं तो कल अंतरराष्ट्रीय मंच पर मुखरित होगा और चीन को इसका  उत्तर देना भी पड़ेगा।
    चीन में कोरोना संक्रमण प्रारंभ हुआ तो भारतीय नेतृत्व (प्रधानमंत्री) ने चीन को सहयोग का आश्वासन ही नहीं दिया बल्कि जो संभव था किया भी। यह है भारत की विश्व शांति-सहयोग-सद्भाव की नीति। भारत को यह अपेक्षा है कि विश्व के देश पीड़ित अंतरराष्ट्रीय जगत से व्यापार के साथ-साथ माननीय व्यवहार का आचरण करें।

    "जय हिंद : जय विश्व"
    डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला
    विभागाध्यक्ष
    राजनीति विज्ञान विभाग
    राजा श्रीकृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय जौनपुर, उत्तर प्रदेश 222002
    मो. 9451336363

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