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    छुट्टी मनाकर लौटे सपा अध्यक्ष के सामने अब ये है बड़ी चुनौती | #NayaSabera

    नया सबेरा नेटवर्क
    लखनऊ। लंदन से छुट्टियां मनाकर लौटे अखिलेश यादव बुधवार से समाजवादी पार्टी (सपा) के कार्यकर्ताओं संग बैठक करेंगे और आगे की रणनीति पर मंथन करेंगे. हालांकि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से गठबंधन टूटने के बाद अखिलेश यादव अभी तक चुप्पी साधे हुए हैं. उन्होंने बसपा सुप्रीमो मायावती के इल्जामों पर अभी तक कुछ भी नहीं कहा है. जिसके बाद से अखिलेश यादव की आगे की रणनीति को लेकर भी कयास लगाए जा रहे थे. लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त की समीक्षा की जगह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव परिवार संग छुट्टियां मनाने लंदन चले गए. जिस पर सवाल उठे थे.

    अब वापसी के बाद उनके सामने दो बड़ी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं. पहली चुनौती सूबे की 12 विधानसभा सीटों पर होने वाले उप चुनाव हैं. दूसरी चुनौती मायावती के इल्जामों का जवाब देना है. जानकारों की मानें तो अखिलेश यादव के सामने उपचुनाव में खोई प्रतिष्ठा वापस पाने का मौका है साथ ही उपचुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर बसपा के आरोपों का जवाब भी दे सकेंगे.

    बीजेपी के साथ बसपा से भी मिलेगी चुनौती
    अखिलेश यादव के सामने जहां एक ओर सत्तारूढ़ बीजेपी है तो वहीं पहली बार बसपा भी उपचुनाव में जोर आजमाइश करती नजर आएगी. यह अखिलेश के लिए दोहरी चुनौती होगी. क्योंकि सपा और बसपा दोनों को अपने-अपने जातीय समीकरण साधते हुए बीजेपी से मुकाबला करना होगा. लेकिन लोकसभा चुनाव में हार के बाद निराश कार्यकर्ताओं और सुस्त पड़े संगठन में जान फूंकने की जिम्मेदारी अखिलेश के कंधों पर होगी.

    वरिष्ठ पत्रकार और यूपी की राजनीति के करीब से जानने वाले रतनमणि लाल कहते हैं, "मायावती की आवाज मायने रखती है, क्योंकि वे जोर-जोर से बोल रही हैं कि अखिलेश दलितों को भी अपने साथ नहीं रख पाए और मुस्लिमों को भी नहीं संभाल पाए तो सपा के साथ जाना बेकार है. लिहाजा अब अखिलेश के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं, जिनसे उन्हें निपटना होगा."

    रतनमणि लाल कहते हैं "अब या तो अखिलेश मायावती के बातों को चैलेंज करें और उसे ख़ारिज करें. उसके बाद अपने लिए जमीन तलाशें. ऐसा करना आसान नहीं है. अखिलेश के सामने बीजेपी का चैलेंज तो था ही अब बसपा और कांग्रेस की चुनौती भी मुंह बाए खड़ी है. साथ ही खुद के लिए जमीन तलाशना सबसे बड़ी चुनौती है. वे कहते हैं कि इसकी मुख्य वजह ये है कि समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को हराने के लिए सभी विकल्प इस्तेमाल कर लिए. अखिलेश ने कांग्रेस से भी गठबंधन किया और बसपाव रालोद से भी. दोनों ही फैसले नाकामयाब रहे. अब अखिलेश की राजनीति किस आधार पर और किस दिशा में जाएगी, ये देखना महत्वपूर्ण है.

    बसपा के इन इल्जामों का देना है जवाब
    यूपी में गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने के बाद भी मन मुताबिक सफलता न मिलने से मायावती ने गठबंधन तोड़ते हुए अखिलेश पर आरोप लगाया कि उनका उनके अपने वोट बैंक पर ही अधिकार नहीं रहा. उनका आरोप था कि पिछड़ों खासकर यादवों का वोट बसपा में ट्रांसफर नहीं हुआ और सपा को भी नहीं मिला. इतना ही नहीं मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि अखिलेश मुस्लिमों को कम टिकट देने का दबाव बना रहे थे. अभी तक अखिलेश इन आरोपों पर चुप्पी साधे हुए हैं. उपचुनाव में अब उन्हें इन आरोपों का भी जवाब देने का मौका मिलेगा.

    बीजेपी और बसपा ने बनाई बढ़त
    अखिलेश यादव को अब जल्द से जल्द उपचुनाव को लेकर अपनी रणनीति पर काम करना होगा. क्योंकि तैयारियों के मुकाबले में बीजेपी और बसपा कहीं आगे चल रही हैं. बसपा ने चुनाव परिणाम के बाद ताबड़तोड़ समीक्षा बैठक कर संगठन में फेरबदल करते हुए जनसंपर्क और भाईचारे अभियान में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं. वहीं बीजेपी ने भी बूथ स्तर से लेकर सदस्यता अभियान में जुट गई है. अगर अखिलेश की बात करें तो वह अभी तक हार की समीक्षा भी नहीं कर पाए हैं. साथ ही उन्हें संगठन में फेरबदल भी करना है. प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के साथ ही सभी फ्रंटल संगठनों के अध्यक्षों की तैनाती भी होनी है. यह सब काम उन्हें जल्द ही करना होगा क्योंकि संभावना जताई जा रही है कि सितंबर तक उपचुनाव होंगे.

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